शिवपुरी। शिव की पुरी की पावन धरा खनियाधाना इन दिनों भक्ति और वैराग्य के रंग में सराबोर है। मुनि पुंगव 108 श्री सुधासागर जी महाराज एवं मुनि 108 श्री निरापद सागर जी महाराज के पावन सानिध्य में आयोजित पंचकल्याणक प्रतिष्ठा एवं त्रय गजरथ महोत्सव के दौरान शनिवार को 'तप कल्याणक' का दृश्य जीवंत हो उठा। इस अवसर पर मुनि श्री निरापद सागर जी महाराज का ऐतिहासिक पिच्छिका परिवर्तन समारोह भी संपन्न हुआ, जिसने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।
मुनि श्री की अमृतवाणी: संयम ही असली आभूषण
प्रातः काल की बेला में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने विशाल पंडाल में उमड़े जनसैलाब को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में मंगल और अमंगल का भेद हमारे भावों पर टिका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि के बिना आत्म-कल्याण संभव नहीं है। मुनिश्री की ओजस्वी वाणी ने श्रद्धालुओं को संयम और तप के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
वैराग्य पथ पर बढ़े कदम: तप कल्याणक का मंचन
महोत्सव के दौरान 'अयोध्या नगरी' बने पांडाल में बालक तीर्थंकर की भव्य बारात निकाली गई। बैंड-बाजों की मधुर धुनों और इंद्र-इंद्राणियों के नृत्य ने उत्सव में चार चांद लगा दिए। दोपहर में 'तप कल्याणक' की क्रियाएं संपन्न हुईं, जिसमें बालक तीर्थंकर द्वारा राजसी वैभव का त्याग कर दिगंबर दीक्षा ग्रहण करने के दृश्य को दर्शाया गया। सत्येंद्र शर्मा एंड पार्टी के भजनों ने पूरे वातावरण को वैराग्यमय बना दिया।
ऐतिहासिक पिच्छिका परिवर्तन
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण मुनि श्री निरापद सागर जी महाराज का पिच्छिका परिवर्तन रहा। संयम के इस पावन उपकरण (पिच्छिका) को मुनिश्री को भेंट करने का सौभाग्य भगवान के माता-पिता बने श्री कैलाश चंद दादजी (जैन) एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनिश्री द्वारा त्यागी गई पुरानी पिच्छिका प्राप्त करने का गौरव बामौरकलां के ऋषभ जैन एवं उनके परिवार को मिला।
प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश के निर्देशन में सभी मांगलिक क्रियाएं शास्त्रोक्त विधि से संपन्न हो रही हैं। मीडिया प्रभारी संजीव जैन ने बताया कि खनियांधाना का यह महोत्सव क्षेत्र के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो रहा है।
मुनि श्री की अमृतवाणी: संयम ही असली आभूषण
प्रातः काल की बेला में मुनि पुंगव श्री सुधासागर जी महाराज ने विशाल पंडाल में उमड़े जनसैलाब को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में मंगल और अमंगल का भेद हमारे भावों पर टिका है। उन्होंने जोर देकर कहा कि मन, वचन और कर्म की शुद्धि के बिना आत्म-कल्याण संभव नहीं है। मुनिश्री की ओजस्वी वाणी ने श्रद्धालुओं को संयम और तप के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
वैराग्य पथ पर बढ़े कदम: तप कल्याणक का मंचन
महोत्सव के दौरान 'अयोध्या नगरी' बने पांडाल में बालक तीर्थंकर की भव्य बारात निकाली गई। बैंड-बाजों की मधुर धुनों और इंद्र-इंद्राणियों के नृत्य ने उत्सव में चार चांद लगा दिए। दोपहर में 'तप कल्याणक' की क्रियाएं संपन्न हुईं, जिसमें बालक तीर्थंकर द्वारा राजसी वैभव का त्याग कर दिगंबर दीक्षा ग्रहण करने के दृश्य को दर्शाया गया। सत्येंद्र शर्मा एंड पार्टी के भजनों ने पूरे वातावरण को वैराग्यमय बना दिया।
ऐतिहासिक पिच्छिका परिवर्तन
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण मुनि श्री निरापद सागर जी महाराज का पिच्छिका परिवर्तन रहा। संयम के इस पावन उपकरण (पिच्छिका) को मुनिश्री को भेंट करने का सौभाग्य भगवान के माता-पिता बने श्री कैलाश चंद दादजी (जैन) एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनिश्री द्वारा त्यागी गई पुरानी पिच्छिका प्राप्त करने का गौरव बामौरकलां के ऋषभ जैन एवं उनके परिवार को मिला।
प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश के निर्देशन में सभी मांगलिक क्रियाएं शास्त्रोक्त विधि से संपन्न हो रही हैं। मीडिया प्रभारी संजीव जैन ने बताया कि खनियांधाना का यह महोत्सव क्षेत्र के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो रहा है।