शिवपुरी, हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी 72 भाषाई शिक्षकों की नियुक्ति अटकी, सालों चक्कर काट रहे पीड़ित

Adhiraj Awasthi

शिवपुरी। आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा शिवपुरी में सीसीडी प्लान के तहत आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में 72 भाषायी शिक्षकों को संविदा नियम 2005 के नियम-7 के तहत वर्ष 2008 में नियुक्ति प्रदान की गई थी। 2015 में सीसीडी प्लान बंद होने के बाद शिक्षकों को स्कूलों से हटा दिया गया। शासन के इस निर्णय के विरूद्ध शिक्षकों ने उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका प्रस्तुत की थी, जिसे न्यायालय द्वारा स्वीकार किया तथा पूर्ववत सेवायें निरन्तर किए जाने के आदेश पारित किए।

उक्त आदेश के क्रम में श्योपुर जिले में शिक्षकों को शाला संविदा वर्ग-3 के पद पर नियमित कर अध्यापक संवर्ग नियम 2008 का फायदा प्रदान करते हुये उन्हें अध्यापक संवर्ग में नियमित कर दिया, किन्तु शिवपुरी में पदस्थ भाषायी शिक्षकों के संबंध में कोई निर्णय नहीं लिया। इस संबंध में शिवपुरी के स्कूलों से हटाए गए भाषायी शिक्षक अब सालों से न्यायालय का आदेश लेकर जिला पंचायत, कलेक्टर, आदिम जाति कल्याण विभाग, शिक्षा विभाग के चक्कर काट रहे हैं, परंतु उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

जिपं सीईओ ने भी कर दिए आदेश
इस मामले में 4 फरवरी 2026 को जिला पंचायत सीईओ विजय राज द्वारा जिला शिक्षा अधिकारी को एक पत्र भेजकर निर्देश दिए हैं कि वीर सिंह पुत्र अमसैया आदिवासी निवासी ग्राम बेदमऊ तहसील बदरवास ने एक आवेदन पत्र प्रस्तुत कर माननीय न्यायालय खंडपीठ ग्वालियर की रिट पिटीशन नं. 901 सन् 2020 का अमल करवाये जाने की मांग की गयी है। अतः आपको निर्देशित किया जाता है कि उपरोक्त के संबंध में नियमानुसार कार्यवाही करना सुनिश्चित करें।


यह दिया था कोर्ट ने आदेश
नियम, 2018 और 1 मई 2019 एवं 31 मई 2018 के आदेशों के आधार पर याचिकाकर्ताओं के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता, जो 23 अक्टूबर 2015 के आदेश द्वारा श्योपुर जिले के समान स्थिति वाले व्यक्तियों को लाभ प्रदान करने के बाद लागू हुए थे। तदनुसार, वर्तमान याचिका का निपटारा निम्नलिखित तरीके से किया जाता है।

-आक्षेपित आदेश अनुलग्नक पी-1 दिनांक 15.11.2019 को एतद् द्वारा निरस्त किया जाता है।

-प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे नियम, 2008 के अनुसार याचिकाकर्ताओं को अध्यापक संवर्ग का लाभ प्रदान करें।

-प्रतिवादियों को निर्देश दिया जाता है कि वे वर्तमान याचिकाकर्ताओं को वही लाभ प्रदान करें, जो श्योपुर जिले के समान स्थिति वाले व्यक्तियों को पहले ही प्रदान किया जा चुका है।

-प्रतिवादियों को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वे इस आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने की अवधि के भीतर याचिकाकर्ताओं को सभी परिणामी लाभ प्रदान करें। हालांकि, याचिकाकर्ता उस अवधि के बकाया वेतन के हकदार नहीं हैं, जिसमें उन्होंने वास्तव में काम नहीं किया है। काम नहीं तो वेतन नहीं के सिद्धांत के आधार पर प्रतिवादियों को यह भी निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ताओं को उनके कर्तव्यों का पालन करने दें और वेतन का भुगतान जारी रखें।

इनका कहना है
-मुझे जिपं सीईओ साहब का पत्र मिला है। चूंकि भाषायी शिक्षक आदिम जाति कल्याण विभाग द्वारा रखे गए थे। मैंने प्रकरण आदिम जाति कल्याण विभाग भिजवाया है। वहां से उचित मार्गदर्शन प्राप्त होने के बाद मामले में जो भी उचित कार्रवाई होगी, वह की जाएगी।
विवेक श्रीवास्तव, डीईओ शिवपुरी

हम सालों से अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, अगर अब भी हमारी सुनवाई नहीं हुई तो हमे न्यायालय के आदेश की अव्हेलना का केस लगाने पर मजबूर होना पड़ेगा।
रोकम आदिवासी
याचिकाकर्ता भाषायी शिक्षक