SHIVPURI की नसों में घुल रहा है जहर: कागजों पर लैब, टंकियों में कीचड़ और नलों से निकलते रोग

Bhopal Samachar

शिवपुरी। इंदौर में दूषित पेयजल से मची तबाही के बाद शिवपुरी का प्रशासन भी नींद से जागा तो है, लेकिन उनकी यह जागृति केवल खानापूर्ति तक सीमित नजर आ रही है। सालों से पेयजल जांच को ठंडे बस्ते में डालने वाला पीएचई विभाग अब अचानक सक्रियता का नाटक कर रहा है। विभाग का दावा है कि उन्होंने 480 सैंपल लिए, जिनमें से सिर्फ दो फेल हुए, जबकि धरातल की हकीकत यह है कि जिले में 50 से अधिक हैंडपंप वर्षों से जहरीला पानी उगल रहे हैं, जिन्हें बंद करने की फुर्सत विभाग के पास नहीं है।

टंकियों में जमा कीचड़ का साम्राज्य
नगर पालिका की लापरवाही का सबसे वीभत्स रूप शहर की पानी की टंकियों में देखने को मिल रहा है। नियम कहते हैं कि हर महीने टंकी की सफाई अनिवार्य है, लेकिन फिजिकल कॉलेज के पास स्थित संपवेल की सफाई पिछले 8 महीनों से नहीं हुई है। कर्मचारियों की मानें तो इस टंकी में एक से दो फीट तक काली कीचड़ जमा है। इसी जहरीली कीचड़ के बीच से होकर पानी शहर के 25 हजार घरों तक पहुँच रहा है। शहर की 15 अन्य टंकियों का हाल भी इससे जुदा नहीं है।

लैब में सन्नाटा, कागजों पर लक्ष्य
शिवपुरी, कोलारस, करैरा और पिछोर में पीएचई की लैब तो स्थापित हैं, लेकिन वहां काम के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई जा रही है। हर महीने 1200 सैंपल जांचने का लक्ष्य दिया गया है, जिसे आज तक किसी भी लैब ने पूरा नहीं किया। सूत्रों का कहना है कि ग्रामीण अंचलों में तो स्थिति और भी भयावह है, जहाँ लोग मटमैला और दूषित पानी पीने को अभिशप्त हैं। नतीजा यह है कि अस्पतालों में पेट संक्रमण, लिवर और किडनी के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

महिलाओं के भरोसे छोड़ी जनता की सुरक्षा
हैरानी की बात यह है कि मड़ीखेड़ा जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट और शहर के बोरवेलों की जांच के लिए नगर पालिका ने सारा जिम्मा स्व-सहायता समूहों की महिलाओं पर डाल दिया है। अधिकारी केवल आदेश देने तक सीमित हैं। जांच में वार्ड नंबर 27 और गौशाला की आदिवासी बस्ती के कुओं का पानी पहले ही अनुपयोगी पाया जा चुका है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या पीएचई और नगर पालिका जैसे बड़े विभागों के पास खुद का इतना तंत्र नहीं है कि वे जनता को शुद्ध पानी सुनिश्चित कर सकें?

अधिकारियों के रटे-रटाए जवाब
नगर पालिका के एई सचिन चौहान का कहना है कि वे टंकियों की सफाई के आदेश दे चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि ये आदेश 8 महीनों तक कहाँ दबे रहे? वहीं पीएचई के कार्यपालन यंत्री शुभम अग्रवाल नियमित जांच का दावा कर रहे हैं, जो जमीनी सच्चाई से कोसों दूर नजर आता है।