Shivpuri के इस घर में खुशियां भी रो पड़ीं: माता-पिता दिव्यांग और अब दोनों मासूम बच्चे भी दृष्टिहीन

Bhopal Samachar

शिवपुरी। कहते हैं कि बच्चा जब पैदा होता है, तो वह अपने साथ परिवार के लिए उम्मीदों का उजाला लेकर आता है। लेकिन शिवपुरी के घोसीपुरा में रहने वाले हेमंत जाटव के घर जब तीन दिन पहले किलकारी गूंजी, तो वह खुशी चंद घंटों में ही मातम जैसी खामोशी में बदल गई। नियति का खेल देखिए, जिस मां की खुद की आंखों में रोशनी नहीं है, उसकी कोख से जन्मे दूसरे मासूम की आंखों में भी कुदरत ने जन्म से ही अंधेरा लिख दिया।

दुखों का अंतहीन सिलसिला हेमंत जाटव का जीवन पहले से ही संघर्षों की आग में तप रहा है। खुद एक पैर से दिव्यांग हेमंत दिन भर हाड़तोड़ मजदूरी करते हैं, लेकिन शारीरिक अक्षमता के कारण उन्हें पूरी मजदूरी भी नहीं मिलती। शाम को जब वे 100-200 रुपये लेकर घर लौटते हैं, तो सामने पत्नी सुमित्रा होती है, जो देख नहीं सकतीं। तीन साल पहले जब बड़ी बेटी पैदा हुई, तो उम्मीद थी कि वह माता-पिता की लाठी बनेगी, लेकिन वह भी जन्म से ही दृष्टिहीन निकली।

नवजात की आंखों में भी 'बादल' तीन दिन पहले जिला अस्पताल में जब बेटे का जन्म हुआ, तो पूरे परिवार ने दुआ की थी कि शायद इस बच्चे की आंखों में ईश्वर रोशनी दे दे। लेकिन डॉक्टरों की जांच ने हेमंत की रही-सही हिम्मत भी तोड़ दी। डॉक्टर देवेंद्र कौशिक के मुताबिक, नवजात 'क्लाउडी कॉर्निया' (आंखों में सफेद झिल्ली) के साथ पैदा हुआ है। यह बीमारी मां से बच्चों में आई है। अब पूरा परिवार दिव्यांगता की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है।

सालों से अंधेरे में भटकती उम्मीदें हेमंत का गला रुंध जाता है जब वे बताते हैं कि दिल्ली तक चक्कर काट लिए, लेकिन बेटी की आंखों में चमक नहीं आई। अब बेटे के लिए भी वही लंबा और खर्चीला सफर सामने है। विडंबना देखिए कि जिस देश में करोड़ों के फंड विकास के नाम पर खर्च होते हैं, वहां एक दिव्यांग पिता को आज तक न तो कोई विशेष आर्थिक मदद मिली और न ही इलाज का भरोसा। 100 रुपये की दिहाड़ी में वह खुद का पेट पाले, पत्नी की सेवा करे या दो मासूमों की अंधेरी दुनिया में रोशनी लाने के लिए दवा खरीदे?

प्रशासन से एक गुहार फिलहाल नवजात को राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत पंजीकृत किया गया है। एक महीने बाद ऑपरेशन की उम्मीद है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ऑपरेशन के बाद यह बच्चा दुनिया देख पाएगा? और अगर देख भी लिया, तो क्या समाज और सरकार इस टूट चुके परिवार को सहारा देगी?

ईश्वर का यह कैसा विधान है, जहां एक ही छत के नीचे चार जिंदगियां बिना रोशनी के एक-दूसरे का हाथ थामे सिर्फ सांसें गिन रही हैं? शिवपुरी का यह परिवार आज मदद के लिए समाज के 'संवेदनशील' हाथों की ओर देख रहा है।