शिवपुरी। आज 8 मार्च हैं महिला दिवस हैं,शिवपुरी के केंद्रीय विद्यालय आईटीबीपी शिवपुरी पुस्तकालय अध्यक्ष निशु उपाध्याय ने एक सुंदर रचना को जन्म दिया हैं। महिला दिवस पर यह कविता रूपी रचना महिलाओं को समर्पित है,पढिए पूरी कविता
आओ सखी एक कदम आगे तो आओ
सखी तुम क्यूँ डरती हो आने से आगे
क्योंकि मात्र तुम एक नारी हो,
नहीं सखी अब और नहीं डरना,
अपनी प्रतिभा को यूं अपने अंदर नहीं और है मारना ,
आगे आकर अपनी ताकत का एहसास हमें सबको है कराना l
नहीं है सखी अब अपना जीवन घर की चारदीवारी तक,
नहीं है सखी अपना जीवन सीमित एक जननी बनने तक l
जीवनदायिनी हम सृष्टि की अनुपम कृति हैं,
क्यों सखी फिर सबसे डर के हमने अपने सपनों को है दफनाया l
क्या हमें अपने सपनों को पूरा करने का हक नही,
जिसने इस धरती पर पुरुषों को जन्म दिया उन पुरुषों से डरकर क्यों उसने अपने को है सीमित किया l
नहीं सखी अब और नहीं हमको घर की चारदीवारी में है रहना ,
आओ सखी अब हाथ से हाथ मिलाए एक कदम आगे और बढ़ाएं
आर्थिक ,सामाजिक , तकनीकी,राजनैतिक सभी क्षेत्रों में अपनी भागीदारी बढ़ाएं l
सखी अपने सपनों को प्रतिभाशाली पंखों के सहारे इतना ऊंचाई तक हमें है ले जाना,
पुरुष प्रधान समाज को अपनी प्रगति से स्त्री सम्मान का एहसास है करवा जाना l
पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर अब हमें आगे है चलना
आओ सखी एक कदम आगे तो आओ
अपनी नारी शक्ति का परचम दुनिया में लहराओ
एक नजर निशु उपाध्याय के जीवन परिचय पर
निशु उपाध्याय वर्तमान में केंद्रीय विद्यालय आइटीबीपी शिवपुरी में पुस्तकालय अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं। मूलतः आगरा की रहने वाली हैं,पिताजी श्री कृष्ण मोहन उपाध्याय रेलवे से सेवानिवृत्त हैं। श्री कृष्ण उपाध्याय की 4 बेटिया हैं जिनमें निशु उपाध्याय सबसे छोटी है।
पिता ने अपनी बडी सम्पत्ति हमे शिक्षा के रूप में दी। शिक्षा से संबंधित किसी भी क्षेत्र में हम बहनो ने जो भी करना चाहा पिता ने कभी नही रोका और सहयोग किया इस कारण ही हम चारो बहने आज सफल है। पिता ने कभी कभी भी हमें ऐसा एहसास नहीं कराया कि लड़कियां किसी से कम होती हैं। उनको हमेशा ही अपनी बेटियों पर गर्व रहा हैं।
मेरी सबसे बड़ी बहन रेलवे में स्टेशन मास्टर के पद पर कार्यरत हैं दूसरे नंबर की बहन एक कुशल ग्रहणी है तीसरे नंबर की बहन सामाजिक कार्यकर्ता हैं।मैं भी एक बेटी की माँ हूं जिसकी उम्र अभी तेरह साल है। मैने अपने पिता को अपने साथ हमेशा जोडे रखने के लिए अपना सरनेम नही बदला और उपाध्याय ही रखा।
क्योंकि मैं चाहती थी कि मैं एक बेटे की भाँति ही अपने पापा का सरनेम लेकर ही अपने जीवन में आगे बढूं वर्ष 2007 में मेरा चयन पुस्तकालय अध्यक्ष के पद पर एयर फोर्स स्कूल आगरा में हुआ किंतु उस समय मुझे एयर फोर्स स्कूल से एयर फोर्स स्टेशन की लाइब्रेरी में अटैच कर दिया गया l वहां मैंने 2007 से 2012 जनवरी तक कार्य किया l नौकरी करते वक्त ही मैंने केंद्रीय विद्यालय संगठन की भी परीक्षा पास कर ली और मार्च 2012 को मैंने केंद्रीय विद्यालय आइटीबीपी शिवपुरी में पुस्तकालय अध्यक्ष के पद पर ज्वाइन कर लिया। भविष्य में मैं समाज की महिलाओं के लिए कार्य करना चाहती हूं। इस ओर यह मेरी नई शुरुआत है और यह मेरी रचना महिलाओ के लिए समर्तित है।