शिवपुरी। जिले का कोई भी सरकारी उपक्रम जिले की ताकत होता हैं,लेकिन शिवपुरी की यह मेडिकल की ताकत शोपीस बन कर रह गई। इसका जनमानस को कोई लाभ नही मिल रहा हैंं,कारण सिर्फ इसके कर्ताधर्ता सिर्फ बातो के बातशे फोड रहे हैं और काम से बचने के लिए कागजी घोडे दौडा रहे हैं या यू कह ले वह अपनी नौकरी के साथ न्याय ना करते हुए सिर्फ अपनी जेबे भरने की जुगाड हैं,ताला मामला जिले की स्वास्थय के क्षेत्र में ताकत बना शिवपुरी मेंडिकल का हैं। अधीक्षक के एक पत्र से भवार्थ निकालकर उक्त पक्तियां ली जा रही है।
बडा सपना: लेकिन सपने जैसा ही रह गया, कृपा रही इनकी
शिवपुरी का मेडिकल एक कागज के टूकडे से अस्तिव से आया है। इसे चुनाव में कागज का टूकडा कहकर निरूपित भी किया था। शिवपुरी मेडिकल कॉलेज को अपने अस्तिव में आने के लिए एक लंबी लडाई लडनी पडी,इसको राजनीति के चक्कर में भगवान भरोसे छोड दिया गया। शिवपुरी समाचार को कृपया इस खबर को धीरे धीरे पढे क्यो कि शिवपुरी शहर सो रहा है शीर्षक से खबरो का प्रकाशन भी करना पडा था।
किसी शहर में मेडिकल कॉलेल खुलना एक सपना होता है,इस सपने को तात्कालिन केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने साकार किया और आज एक चमचमाती बिल्डिंग के रूप में श्रीमंत राजमाता विजयाराजे सिंधिया मेडिकल कॉलेज हमारे शहर में शान से खडा हैं लेनिक खडा हैं वर्तमान में कोई काम का नही हैं।
कहा था: अब मरीज ग्वालियर रैफर नही होगें
कॉलेज खुलने के बाद जिले से किसी मरीज को रैफर नहीं करना पड़ेगा। इतना ही नहीं श्योपुर, गुना आदि के मरीज तक रैफर होकर मेडिकल काॅलेज के अस्पताल में आएंगे। कोरोना की दूसरी लहर में अस्पताल शुरू भी हो गया, लेकिन 8 महीने बाद भी अब तक रैफर टू ग्वालियर का चलन बंद नहीं हो पाया है। पिछले 8 महीने में मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में इमरजेंसी और ट्रॉमा ओटी शुरू नहीं हो पाया है।
प्रबंधन कुछ दिनों में ही इसके शुरू होने, मशीनरी की कमी होने के बहाने कई महीनों से बना रहा है। स्थिती यह है कि मेडिकल कॉलेज पर नियंत्रण रखने वाले अधिकारी ही खुद इसकी वास्तविक िस्थति से वाकिफ नहीं है।
इस पत्राचार ने दिखाई कॉलेज अधीक्षक की मंशा
स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्रीय संचालक के कार्यालय से हुए पत्राचार में इस बात पर मोहर लग गई। क्षेत्रीय संचालक ने शिवपुरी स्वास्थ्य विभाग को पत्र लिखकर निर्देशित किया कि जिला अस्पताल से मरीजों को सीधे ग्वालियर जयारोग्य अस्पताल में रैफर न किया जाए। मरीजों को शिवपुरी मेडिकल कॉलेज रैफर किया जाए और आगामी कार्रवाई वहीं से होगी।
इस पर मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक डॉ. केबी वर्मा ने पत्र लिखकर जबाव दिया कि मुख्य ओटी का कार्य प्रगति पर है इसलिए ट्रॉमा और इमरजेंसी शल्य क्रिया के केस नहीं किए जा रहे हैं। ओटी का कार्य पूर्ण होने पर ही ट्रॉमा और इमरजेंसी केस शुरू किए जाएंगे। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर 8 महीने में अब तक मुख्य ओटी शुरू क्यों नहीं हो पाया।
शिवपुरी टू ग्वालियर रैफर की रफ्तार कब रूकेगी: इस सफर में डेढ लाख
अक्टूबर के महीने में शिवपुरी के मरीज को ग्वालियर रैफर करने के बाद यह पूरा मामला शुरू हुआ था। मरीज राजाराम को शहर के एक निजी अस्पताल से ग्वालियर जेएएच रैफर कर दिया था। जेएएच से उसे निजी अस्पताल रैफर कर दिया जहां उसका एक दिन का बिल डेढ़ लाख रुपये बन गया।
इसकी जानकारी कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी को लगी तो वे ग्वालियर पहुंचे और मरीज को डिस्चार्ज कराकर आगे का इलाज कराया। इसके बाद विधायक ने ग्वालियर कमीश्नर को शिकायती पत्र लिखा। इसके बाद कमीशनर द्वारा जांच कराई गई और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्रीय संचालक को निर्देश दिए कि शिवपुरी जिला अस्पताल से मरीज ग्वालियर के बजाए जीएमसी रैफर करने के लिए आदेशित करें।
पत्राचार से ही उठे सवाल, ओटी में नॉन इमरजेंसी ऑपरेशन, लेकिन इमरजेंसी नहीं
क्षेत्रीय संचालक द्वारा सिविल सर्जन को निर्देश दिए गए कि मरीजों को मेडिकल कॉलेज रैफर करें यानी उन्हें इस बात की जानकारी नहीं कि शिवपुरी मेडिकल कॉलेज का ओटी अब तक शुरू नहीं हो पाया है और वहां पर रैफर मरीजों को लिया ही नहीं जा रहा है। दूसरा सवाल खुद अधीक्षक केबी वर्मा के जबावी पत्र से उठता है। इसमें उन्होंने लिखा है कि इमरजेंसी ओटी में नॉन इमरजेंसी शल्य क्रिया (अस्थि रोग, नाक कान एवं गला रोग एवं सर्जरी विभाग) के केस किए जा रहे हैं। खुद अधीक्षक इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि इमरजेंसी ओटी वर्किंग है और वहां सर्जरी भी हो रही हैं, लेकिन अभी इमरजेंसी सर्जरी संभव नहीं हैं।
शिवपुरी टू ग्वालियर रैफर गाडी में जाते हैं 10 मरीज:रास्ते में टूट सकती हैं सांसे
जिला अस्पताल से हर दिन करीब 10 इमरजेंसी केस ग्वालियर रैफर किए जाते हैं। जुलाई के महीने में 208 केस, अगस्त में 302 केस, सितंबर में 412 केस के साथ अक्टूबर में भी करीब 400 केस रैफर किए गए। इस तरह औसतन यहां से 10 केस हर दिन ग्वालियर रैफर होते हैं।
ग्वालियर रैफर करने, वहां पहुंचने आदि की प्रक्रिया में मरीज को करीब 3 घंटे का समय लग जाता है। चूंकि मरीज पहले ही इमरजेंसी की िस्थति में ऐसे में एक-एक मिनट बहुत कीमती होता है। इस फेर में कई मरीज जान भी गंवा बैठते हैं। यदि मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी सुविधाएं शुरू हो जाएं तो जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज पहुंचने में 15 मिनट का ही समय लगेगा। इससे कई लोगों की जान बचाई जा सकेगी।
जिला अस्पताल के मुकाबले ढ़ाई गुना स्टाफ
मेडिकल काॅलेज में जिला अस्पताल के मुकाबले ढ़ाई गुना से अधिक स्टाफ है। जिला अस्पताल में 50 से भी कम डाॅक्टर हैं जबकि मेडिकल कॉलेज में इनकी संख्या 150 के लगभग है। यहां का अस्पताल भी 300 बेड का है। इतना स्टाफ और उन पर हर महीनों कराेड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी जिलेवासियों को कोई लाभ नहीं मिल पा रहा है। अभी यहां पर सिर्फ ओपीडी संचालित की जा रही है। यदि ओपीडी में कोई मरीज को भर्ती करने की आवश्यकता लगती है तो उसे भर्ती कर दिया जाता है।
जनप्रतिनिधियों के दावे कई, परिणाम शून्य
पिछले दोरे पर जब ज्योतिरादित्य सिंधिया मेडिकल कॉलेज निरीक्षण पर गए थे तो उन्होंने कहा था कि यहां पर विदेशों की अत्याधुनिक मशीनें हैं। किसी भी संसाधन की कमी मेडिकल कॉलेज को नहीं आने दी जाएगी। कोरोना काल में इसके अस्पताल को शुरू कराने में कैबिनेट मंत्री व स्थानीय विधायक यशोधरा राजे सिंधिया की भी महती भूमिका रही थी। यहां के संसाधनों के लिए उन्होंने भी काफी प्रयास किए। लेकिन सभी जनप्रतिनिधियों के यह प्रयास अब तक तो विफल ही साबित होते दिखे हैं क्योंकि शहर में मेडिकल कॉलेज होने के बाद भी मरीज बाहर ही रैफर हो रहे हैं।
इनका कहना है...
जिला अस्पताल से इमरजेंसी के मरीज ही रैफर किए जाते हैं। मेडिकल कॉलेज में इमरजेंसी का मरीज लेते नहीं हैं इसलिए हमें ग्वालियर ही रैफर करने पड़ते हैं।
डॉ. राजकुमार ऋषिश्वर, सिविल सर्जन जिला अस्पताल

