करवा चौथ व्रत की पूजा में यह है करवा पात्र का महत्व: क्यो है करवे के बिना यह व्रत अधुरा - Shivpuri News

शिवपुरी
। करवा चौथ व्रत हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को रखा जाता है। इस साल यह 4 नवंबर (बुधवार) को किया जाएगा। इस व्रत को सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखती हैं। इस व्रत में करवे पात्र का बडा महत्व हैं,इस पात्र के बिना यह महाव्रत अधुरा हैं। आईए जानते हैं इस पात्र का क्या महत्व हैं इस महाव्रत में और यह मिटटी से ही क्यो बना होता हैं।

करवा चौथ को सुहागिने स्त्रिया पूरे सोलह श्रृंगार करके विधि-विधान से पूजा करती हैं। महिलाए दिन भर  निर्जला व्रत रखती हैं और रात में चंद्र-देव की पूजा कर अर्ध्य देती हैं और अपने पति के हाथो पानी पीकर इस व्रत का समापन करती है। करवा शब्द का अर्थ मिट्टी का बर्तन होता है।  

यह मिट्टी का बना टोंटीदार बर्तन होता है। जैसा कि आप जानते हैं कि मिट्टी को पंच तत्व का प्रतीक माना गया है। करवे को मिट्टी को पानी में गला कर बनाते हैं जो भूमि तत्व और जल तत्व का प्रतीक है। उसे बनाकर धूप और हवा से सुखाया जाता है जो आकाश तत्व और वायु तत्व के प्रतीक हैं फिर आग में तपाकर बनाया जाता है। इस तरह करवा पांच तत्व का प्रतीक माना गया है।

भारतीय संस्कृति में पानी को ही परब्रह्म माना गया है, क्योंकि जल ही सब जीवों की उत्पत्ति का केंद्र है। इस तरह मिट्टी के करवे से पानी पिलाकर पति पत्नी अपने रिश्ते में पंच तत्व और परमात्मा दोनों को साक्षी बनाकर अपने दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाने की कामना करते हैं।

करवे के बिना करवा चौथ अधूरा ही समझों। प्राचीन समय से करवा चौथ में मिट्टी का बर्तन ही प्रयोग होता आया है। पर अब समय में बदलाव के साथ महिलाएं धातु के करवे का भी प्रयोग करने लगी हैं। पर मिट्टी के बर्तन के महत्व को जानते हुए आपको करवा चौथ में मिट्टी के करवे का प्रयोग करना चाहिए। विवाहित महिलाएं इस तरह अपने व्रत को सम्पूर्ण बना सकती हैं।