जमीन पर पडे मरीज करते एक पुकार, हमें दो उपचार, अस्पताल में इलाज करना जंग से कम नही | Shivpuri News

शिवपुरी। स्वच्छता अभियान में प्रदेश का नंबर 1 अस्पताल ईलाज में प्रदेश में पीछे से नंबर की तरह काम कर रहा हैं। पहले तो प्रबंधन डॉक्टरो की कमी का रोना रोता था लेकिन मेडिकल कालेज के डॉक्टर भी मिल जाने के बाद भी स्थिती वही की वही बनी हुई हैं आज की तारिख में शिवपुरी जिला चिकित्सालय में ईलाज कराना किसी जंग से कम नही है।

मरिज की सबसे पहली जंग हैं अपने निर्धारित समय पर उसको डॉक्टर उपस्थित मिल जाए। बताया गया हैं कि आज डॉक्टर अपने निर्धारित समय से लेट आए और एक जागरूक नागरिक ने जिलाधीश के मोबाईल फोन के व्हाट्सएप ग्रुप पर कुछ छायाचित्रों के साथ अवगत भी करा दिया गया। कलेक्टर ने फोटो को देखकर क्या एक्शन लिया यह तो भगवान जाने लेकिन अस्पताल में मरीज तो भगवान के भरोसे ही डले है।

मेडिकल वार्ड को मेडिकल कालेज के डॉक्टर के भरोस कर दिया गया हैं। मेडीकल कॉलेज के शिक्षा अध्ययन कर रहे एमबीबीएस चिकित्सक इन मरीजों उपचार देने की जगह दर्द देने का काम कर रहे हैं। क्योंकि न तो समय पर आते हैं और आते भी हैं तो सिर्फ और सिर्फ हस्ताक्षर करके विदा ले लेते हैं। रही जिला चिकित्सालय के चिकित्सकों की तो उन्होंने अपनी नर्सिंगहोम संचालित कर रखे हैं इसके कारण जिला अस्पताल के मरीजों पर ध्यान कम अपनी दुकानदारी पर ध्यान ज्यादा दिया जा रहा हैं। इसके कारण जमीन पर पड़े मरीजों की हालत दयनीय बनी हुई हैं। अब आखिर कार इन मरीजों की सुध लेने वाला कौन हैं?

मलेरिया ओपीडी बंद, नहीं हो पा रही मलेरिया की जांच

कहने के लिए चिकित्सकों को भगवान का दूसरा स्वरूप कहा गया हैं लेकिन इन चिकित्सकों की मानवता अब मर चुकी है। क्योंकि जिला अस्पताल इन दिनों मलेरिया से ग्रसित दर्जनों मरीज जिला अस्पताल में चिकित्सकों द्वारा लिखी गई अपनी जांच कराने इधर उधर भटक रहे हैं लेकिन जिला अस्पताल प्रशासन इन मलेरिया ओपीडी को आखिरकार क्यों चालू नहीं कर रहा हैं?

इसके पीछे का कारण क्या हैं? यह समझ से परे हैं। लेकिन हालत इन दिनों जिला अस्पताल के भयाभय बने हुए हैं। मलेरिया की ओपीडी बंद किए जाने से मरीजों की जांच तक नहीं हो पा रही हैं। मरीजों को मजबूरन निजी पैथोलॉजी पर जाकर मलेरिया की जांच कराना पड़ रही हैं।

जिसमें मरीज का धन व समय दोनों ही बर्वाद हो रहे हैं। जबकि शासन द्वारा जिला चिकित्सालय को मलेरिया की सभी सुविधायें उपलब्ध कराई गई हैं। तब सवाल यह उठता हैं कि जिला चिकित्सालय प्रबंधन के समक्ष ऐसी कौन सी मजबूरी आ गई कि उन्हें मलेरिया की ओपीडी बंद करना पड़ गई।


स्टाफ नर्सों का मरीजों के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैया

बदलते मौसम के समय में जिला चिकित्सालय मैं मरीजों की भरमार हैं। जगह-जगह पर जमीन पर रोगी पड़े हुए हैं। इसके बावजूद भी जिला चिकित्सालय में पदस्थ स्टाफ नर्सों का रवैया भी रोगियों के प्रति भावनात्मक न होते हुए उपेक्षा पूर्ण बना हुआ हैं।

जबकि नर्सों को प्रशिक्षण के समय यह बताया जाता हैं कि रोगी के प्रति भावनात्मक रवैया अपनाते हुए व्यवहार रखना चाहिए। लेकिन ऐसा यहां पर कतई नजर नहीं आता। यदि जिला चिकित्सालय में पदस्थ स्टाफ नर्सों का व्यवहार मरीज के साथ भावनात्मक रहता हैं तो रोगी का आधा मर्ज तो वैसे ही ठीक हो जाता हैं।

वार्ड में जाकर चिकित्सक नहीं देखते रोगियों को

जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सकों द्वारा भी रोगियों के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैया रहता हैं। इनके द्वारा रोगियों को गंभीरता से न लेते हुए अपनी मनमानी पूर्ण रवैया अपनाते हुए नियम बना रखे हैं। शासकीय नियमानुसार जिला चिकित्सालय में भर्ती रोगियों को चिकित्सक द्वारा वार्ड में जाकर उनका परीक्षण करना चाहिए। लेकिन यहां पर तो चिकित्सक नर्सिंग स्टाफ रूम में बैठकर रोगियों की लाईन लगवाकर परीक्षण करते हैं।

चिकित्सकों द्वारा वार्ड में जाने की जहमत तक नहीं उठाई जाती। इस दौरान मरीजों को घंटों लाईन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता हैं। घंटों खड़े होने पर किसी भी रोगी की तबियत खराब हो सकती हैं। इतना ही नहीं चिकित्सक द्वारा पर्चे पर दवाईयां लिखने के उपरांत रोगियों को नर्सिंग स्टाफ इंजेक्शन व दवायें लेने के लिए पुन: कतार में खड़ा होना पड़ता हैं। इस प्रकार देखा जाए तो मरीज को लगभग तीन से चार घंटे तक कतार में खड़ा होकर अपना उपचार कराना पड़ रहा हैं।