काजल सिकरवार @शिवपुरी। शिवपुरी शहर के छत्री रोड पर स्थित विष्णु मंदिर में देश की एकमात्र प्रतिमा है जो सृष्टि के सृजन चक्र हो दर्शाता है। इस मंदिर में भगवान श्रीमन नारायण शयन मुद्रा में हैं,और उनकी नाभि से कमल का उदय होते हुए श्री ब्रह्मा जी विराजमान है और वही श्रीहरि के श्रीचरणों को दबा रही है। सृष्टि के सृजन चक्र को इसलिए यह दर्शाती है कि हमारे पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने ही इस सृष्टि की रचना की है।
शिवपुरी के इस विष्णु मंदिर में विराजमान विष्णु भगवान की प्रतिमा शैषयायी मुद्रा में है। यह चारों प्रतिमा एकाशिला है अर्थात एक शिला से प्रतिमा को उकेरा गया है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत से लगभग 8 दशक पूर्व लाई गई थी। इस मंदिर की पूजा पाठ की व्यवस्था शुरुआत से शिवपुरी शहर में निवास करने वाले भार्गव परिवार के मुखिया स्व:श्री राम गोपाल भार्गव ने की थी,उनके देहावसान के बाद यह जिम्मेदारी सुशील कुमार उर्फ सनत कुमार भार्गव महाराज जी संभाल रहे है।
इस मंदिर का निर्माण स्व:श्री सुरेन्द्र लाल दिवान कत्था मिल वालो ने करवाया था,अब इस मंदिर की व्यवस्था कि जिम्मेदारी अरविंद लाल दिवान और उनके पुत्र अर्जुन दिवान संभाल रहे हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी श्री सुशील कुमार महाराज का कहना है कि इस सृष्टि के पालनहार श्री हरि यह शेष शय्या पर शयन मुद्रा में है,इस प्रतिमा में इस पृथ्वी का भार उठाने वाले शेषनाग के पांच फन के स्पष्ट दर्शन होते है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों के प्रतिमाओ जैसी काले पत्थर से निर्मित है। भगवान यहां दक्षिणमुखी होकर विराजमान है।
सत्यनारायण भगवान की इस प्रतिमा की ऊंचाई की लगभग साढ़े पांच फुट है और लंबाई 10 फुट है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत से शिवपुरी लाई गई थी। इस मंदिर के सबसे बडी यह विशेषता है कि लक्ष्मीपति से जिसने हृदय जो मांगा है वह उसने दिया है,वही मुख्य पुजारी का कहना है कि भक्त अपने आराध्य हो अपने चित्त ओर मन में अनुभव करता है यहां प्रत्येक क्षण श्रीहरि के होने का मुझे अनुभव होता है।
गुरुवार को उमड़ती है भीड़
विष्णु मंदिर पर गुरुवार को सबसे अधिक संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते है। गुरुवार को यहां हजारो भक्त सुबह और शाम को भगवान के दर्शन करने आते है इस कारण हर गुरुवार को यहां उत्सव का माहौल होता है।
पंडित जी ने बताया कि इस मंदिर में सुबह मंगला आरती 7 बजे होती और शाम की संध्या आरती शाम 7 बजे नित्य होती है मंदिर के कपाट पट 9 बजे बंद हो जाते है। इस मंदिर पर विशेष उत्सव देव उठनी एकादशी विशेष पूजा अर्चना कर मनाई जाती है। वही साल भर प्रत्येक पर्व और त्योहारों का आयोजन भी भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस मंदिर पर वर्षो से दर्शन करने आ रहे कई श्रद्धालुओं ने बताया कि हमने जो भगवान से मांगा वह हमें मिला है। यहां दिव्यता और चमत्कारों के अनेको उदाहरण सामने आए है।
देश के प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल) और मध्य प्रदेश के शिवपुरी में भगवान विष्णु की प्रतिमा शयन मुद्रा में है। देश मे भगवान विष्णु के हजारो मंदिर है लेकिन शयन मुद्रा में केवल दो ही मंदिर है।
शयन मुद्रा में भगवान के दर्शन अर्थात कलयुग में मानव को जीने जैसा संदेश
शास्त्रों में भगवान विष्णु का स्वरूप सात्विक यानी शांत, आनंदमयी तथा कोमल बताया गया है। वहीं दूसरी ओर भगवान विष्णु के भयानक तथा कालस्वरूप शेषनाग पर आनंद मुद्रा में शयन करते हुए भी दर्शन किए जा सकते हैं। भगवान विष्णु के इसी स्वरूप के लिए शास्त्रों में लिखा गया है शान्ताकारं भुजगशयनं यानी शांत स्वरूप तथा भुजंग यानी शेषनाग पर शयन करने वाले देवता भगवान विष्णु।
भगवान विष्णु के इस अनूठे स्वरूप पर गौर करें तो यह प्रश्न अथवा तर्क भी मन में आता है कि आखिर काल के साये में रहकर भी क्या कोई बिना किसी बेचैनी के शयन कर सकता हैं। दरअसल, मानव जीवन का प्रत्येक पल कर्तव्य एवं जिम्मेदारियों से जुड़ा होता है। इनमें पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक दायित्व अहम होते हैं।
किंतु इन दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का सिलसिला भी चलता रहता है, जो कालरूपी नाग की तरह भय,बेचैनी एवं चिन्ताएं पैदा करता है। कई मौकों पर व्यक्ति टूटकर बिखर भी जाता है। अतः भगवान विष्णु का शांत स्वरूप ऐसे बुरे वक्त में संयम एवं धीरज के साथ जीवन की सभी मुश्किलों पर काबू पाने की प्रेरणा देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी शांत, स्थिर, निर्भय तथा निश्चित मन एवं मस्तिष्क के साथ अपने धर्म का पालन करना ही भगवान विष्णु के भुजंग अथवा शेषनाग पर शयन का प्रतीक है।
शिवपुरी के इस विष्णु मंदिर में विराजमान विष्णु भगवान की प्रतिमा शैषयायी मुद्रा में है। यह चारों प्रतिमा एकाशिला है अर्थात एक शिला से प्रतिमा को उकेरा गया है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत से लगभग 8 दशक पूर्व लाई गई थी। इस मंदिर की पूजा पाठ की व्यवस्था शुरुआत से शिवपुरी शहर में निवास करने वाले भार्गव परिवार के मुखिया स्व:श्री राम गोपाल भार्गव ने की थी,उनके देहावसान के बाद यह जिम्मेदारी सुशील कुमार उर्फ सनत कुमार भार्गव महाराज जी संभाल रहे है।
इस मंदिर का निर्माण स्व:श्री सुरेन्द्र लाल दिवान कत्था मिल वालो ने करवाया था,अब इस मंदिर की व्यवस्था कि जिम्मेदारी अरविंद लाल दिवान और उनके पुत्र अर्जुन दिवान संभाल रहे हैं। मंदिर के मुख्य पुजारी श्री सुशील कुमार महाराज का कहना है कि इस सृष्टि के पालनहार श्री हरि यह शेष शय्या पर शयन मुद्रा में है,इस प्रतिमा में इस पृथ्वी का भार उठाने वाले शेषनाग के पांच फन के स्पष्ट दर्शन होते है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत के प्रसिद्ध मंदिरों के प्रतिमाओ जैसी काले पत्थर से निर्मित है। भगवान यहां दक्षिणमुखी होकर विराजमान है।
सत्यनारायण भगवान की इस प्रतिमा की ऊंचाई की लगभग साढ़े पांच फुट है और लंबाई 10 फुट है। यह प्रतिमा दक्षिण भारत से शिवपुरी लाई गई थी। इस मंदिर के सबसे बडी यह विशेषता है कि लक्ष्मीपति से जिसने हृदय जो मांगा है वह उसने दिया है,वही मुख्य पुजारी का कहना है कि भक्त अपने आराध्य हो अपने चित्त ओर मन में अनुभव करता है यहां प्रत्येक क्षण श्रीहरि के होने का मुझे अनुभव होता है।
गुरुवार को उमड़ती है भीड़
विष्णु मंदिर पर गुरुवार को सबसे अधिक संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते है। गुरुवार को यहां हजारो भक्त सुबह और शाम को भगवान के दर्शन करने आते है इस कारण हर गुरुवार को यहां उत्सव का माहौल होता है।
पंडित जी ने बताया कि इस मंदिर में सुबह मंगला आरती 7 बजे होती और शाम की संध्या आरती शाम 7 बजे नित्य होती है मंदिर के कपाट पट 9 बजे बंद हो जाते है। इस मंदिर पर विशेष उत्सव देव उठनी एकादशी विशेष पूजा अर्चना कर मनाई जाती है। वही साल भर प्रत्येक पर्व और त्योहारों का आयोजन भी भव्यता के साथ मनाया जाता है। इस मंदिर पर वर्षो से दर्शन करने आ रहे कई श्रद्धालुओं ने बताया कि हमने जो भगवान से मांगा वह हमें मिला है। यहां दिव्यता और चमत्कारों के अनेको उदाहरण सामने आए है।
देश के प्रसिद्ध पद्मनाभस्वामी मंदिर (केरल) और मध्य प्रदेश के शिवपुरी में भगवान विष्णु की प्रतिमा शयन मुद्रा में है। देश मे भगवान विष्णु के हजारो मंदिर है लेकिन शयन मुद्रा में केवल दो ही मंदिर है।
शयन मुद्रा में भगवान के दर्शन अर्थात कलयुग में मानव को जीने जैसा संदेश
शास्त्रों में भगवान विष्णु का स्वरूप सात्विक यानी शांत, आनंदमयी तथा कोमल बताया गया है। वहीं दूसरी ओर भगवान विष्णु के भयानक तथा कालस्वरूप शेषनाग पर आनंद मुद्रा में शयन करते हुए भी दर्शन किए जा सकते हैं। भगवान विष्णु के इसी स्वरूप के लिए शास्त्रों में लिखा गया है शान्ताकारं भुजगशयनं यानी शांत स्वरूप तथा भुजंग यानी शेषनाग पर शयन करने वाले देवता भगवान विष्णु।
भगवान विष्णु के इस अनूठे स्वरूप पर गौर करें तो यह प्रश्न अथवा तर्क भी मन में आता है कि आखिर काल के साये में रहकर भी क्या कोई बिना किसी बेचैनी के शयन कर सकता हैं। दरअसल, मानव जीवन का प्रत्येक पल कर्तव्य एवं जिम्मेदारियों से जुड़ा होता है। इनमें पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक दायित्व अहम होते हैं।
किंतु इन दायित्वों को पूरा करने के साथ-साथ अनेक समस्याओं एवं परेशानियों का सिलसिला भी चलता रहता है, जो कालरूपी नाग की तरह भय,बेचैनी एवं चिन्ताएं पैदा करता है। कई मौकों पर व्यक्ति टूटकर बिखर भी जाता है। अतः भगवान विष्णु का शांत स्वरूप ऐसे बुरे वक्त में संयम एवं धीरज के साथ जीवन की सभी मुश्किलों पर काबू पाने की प्रेरणा देता है। विपरीत परिस्थितियों में भी शांत, स्थिर, निर्भय तथा निश्चित मन एवं मस्तिष्क के साथ अपने धर्म का पालन करना ही भगवान विष्णु के भुजंग अथवा शेषनाग पर शयन का प्रतीक है।