नरवर लोड़ी माता का मंदिर,इस जादू की देवी का यहां हुआ था अंतिम संस्कार,सती की मान्यता - Shivpuri News

Bhopal Samachar

राजेंद्र बाथम @ शिवपुरी। शिवपुरी जिले के प्राचीन नगर नरवर में स्थित  लोड़ी    माता का मंदिर इस क्षेत्र में नहीं पूरे देश में प्रसिद्ध है। लोढी माता पर प्रतिदिन हजारो की संख्या में भक्त आते है। लोढी माता को इस क्षेत्र में जादू की दैवी कहा जाता है। यहां मन्नत पूरी होने बलि देने की परंपरा भी है। शिवपुरी समाचार डॉट काम ने इस मंदिर की यूनिक हिस्ट्री को खोजा है।

इस जादू की देवी जिसे हम लोढी माता के नाम जानते है इनका मूल स्थान नरवर में नहीं है। यह स्थान ग्वालियर जिले में स्थित है,वहां भी इस देवी का मंदिर है और सती के रूप में पूजा की जाती है,इस स्थान पर हिंदू जाति के एक जाति के लोग पूजा करने जाते है इस स्थान के कारण ही उनकी जाति में एक गोत्र रखा गया है। इस मूल स्थान पर जाने से पूर्व आप पहले पढे नरवर के इस मंदिर के विषय में..............

नरवर की लोड़ी माता का मंदिर,जीवंत कथा है देवी लोड़ी की
नरवर नगर में स्थित लोढी माता के मंदिर में विराजमान देवी की जीवंत कथा है। यह कथा कितने सालों पुरानी है इसका सटीक अनुमान किसी को नही है,लेकिन शिवपुरी नगर का नरवर कस्बा इस क्षेत्र का सबसे पुराना नगर कहा जा सकता है क्योंकि शिवपुरी शहर बसने से पूर्व इस क्षेत्र का जिला नरवर ही था।

नरवर नगर का नाम आते है राजा नल की वैभव गाथा हमारे दिमाग में जाती है। राजा नल के एक चर्चित कहानी से ही इस देवी का जन्म हुआ है,कहा जाता है कि नरवर के राजा नल ने बेडनी समाज की एक नृत्यांगना ने शर्त लगाई कि वह नरवर किले से किले के सामने वाली ऊँची पहाडी तक कच्चे धागे पर नाचती हुई जा सकती है। राजा ने शर्त में अपना संपूर्ण राज पाठ लगा दिया। राजा को छूट दी गयी थी कि वह किसी भी धारदार हथियार से धागे को काट सकता है।

नृत्यांगना ने जैसे ही नृत्य करते हुए उस पार जाने की तैयारी की राजा चिंतित हो उठे। बेडनी अपने गंतव्य तक पहुँचने ही वाली थी। तभी राजा ने धारदार हथियार से धागे को काटना चाहा। वह धागा न काट पाया। उसने सारे धारदार हथियार आजमा लिए। मान्यता है कि उस बेडनी ने अपनी मंत्र शक्ति से सभी हथियारों की धार बाँध दी थी। उन्हें नाकाम कर दिया था। किन्तु एक चर्मकार का औजार (रांपी) जूते जोड़ने के कुंडे में डले होने से अशुद्ध होने के कारण मंत्रों के प्रभाव से बच गया। उसकी धार न बाँधी जा सकी। ,,

जब यह जादू की देवी नरवर किले और पहाड़ी के बीच कच्चे सूत पर अपना करतब दिखाते हुए जा रहा थी उसी समय राजा नल ने चर्मकार की उस रांपी से धागा काट दिया। किले की ऊँचाई से नीचे गिरकर बेडनी की मृत्यु हो गयी। जिस जगह गिर कर बेडनी का देहान्त हुआ, संभवतः उसी जगह आज एक मंदिर बना हुआ है। जिसे लोढी माता का मन्दिर कहा जाता है। इस घटना के पश्चात् यह कहावत लोढी माता के संदर्भ में प्रचलित हुई।

अनछुपा सत्य की कहां से आई थी यह जादू वाली नृत्यांगना
ग्वालियर के भितरवार तहसील के ग्राम पंचायत धोवट के ग्राम लोढी मे इस जादू की देवी का मूल स्थान हैं,यहां एक लोढी माता का मंदिर भी बना हुआ है।

लोड़ी  गांव के लोड़ी  माता मंदिर की पूजा करने वाले पुजारी मनीष जी ने शिवपुरी समाचार को बताया कि जो देवी राजा नल के दरबार में अपनी कला का प्रदर्शन करने गई थी उनका नाम जोहरकला था,इस देवी का परिवार और मूल डेरा और स्थान इसी गांव में ही था। धागा टूटने के बाद  धागा टूटने के बाद जिस स्थान पर रानी जौहरकलां गिरी वहां नरवर में लोढ़ी माता मंदिर है लेकिन वहां से नट समुदाय द्वारा रानी जोहर कला,जिसे आज लोढी माता और आम भाषा मे नटनी कहा जाता है उनके मृत शरीर को लोढ़ी ग्राम में लाया गया और दाह संस्कार लोढ़ी ग्राम में किया गया था।

ग्राम लोढी के निवासी हरिपाल कुशवाह ने बताया कि इसी स्थान पर इस देवी का दाह संस्कार किया वहीं उनकी समाधि बनाई गई जिस समय दाह संस्कार हुआ उस समय पास बैठकर जोहारकला के पति जो शेर बन गए थे बैठ कर सब देख रहे थे और प्राण त्याग दिए जिस जगह जौहर कला के पति अथवा लोढ़ी माता के पति ने जिस जगह अपने प्राण त्यागे उसी स्थान पर उनकी समाधि बनाई जो आज ठाकुर बाबा का मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह ठाकुर बाबा का का स्थान ग्राम लोढ़ी में लोढ़ी माता मंदिर के पीछे है।

ग्राम लोढी के मंदिर की मान्यता:कहा जाता है कि यदि माता नरवर में पूजा स्वीकार नहीं करतीं, तो भक्तों को उनकी मूल शरण स्थली ग्राम लोढ़ी ही आना पड़ता है।

केवट/ढीमर समाज और लुढ़्या गोत्र का अनोखा संबंध
ग्राम लोढ़ी के नाम से ही माता का नाम लोढ़ी माता प्रचलित हुआ। प्राचीन समय में यहाँ पार्वती किनारे रहने वाले केवट/ढीमर समाज के लोग पूजा-पाठ कराते थे। सेवा और भक्ति के कारण इस समाज के लोग 'लुढ़्या' कहलाए और यही उनका गोत्र बन गया। आज भी ये लोग शिवपुरी, सतनवाड़ा, ग्राम सेकरा, ग्राम शिल्हा, ग्राम मच्छरैया जिला ग्वालियर और आसपास के क्षेत्रों से अपनी कुलदेवी सती माता जो लोढ़ी ग्राम पार्वती नदी के किनारे पूजन और लोढ़ी माता के दर्शन करने यहां आते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि माता की विशेष कृपा के कारण लुढ़्या वंश के लोगों के लिए पूजन हेतु यहाँ कोई कठिन नियम या बंधन अनिवार्य नहीं हैं।

ठाकुर बाबा मंदिर:अमर प्रेम और त्याग की निशानी
ग्राम लोढ़ी के मंदिर की सबसे भावुक कर देने वाली विशेषता यह है कि माता के मंदिर के ठीक पीछे ठाकुर बाबा का स्थान है। मान्यता है कि जब रानी जोहर कला का दाह संस्कार हो रहा था, तब उनके पति (जो उस समय शेर स्वरूप में थे) शांत भाव से चिता के पास बैठे रहे। पत्नी के वियोग में उन्होंने वहीं अपने प्राण त्याग दिए। जहाँ उन्होंने प्राण त्यागे, वहीं उनकी समाधि बनाई गई, जिन्हें आज ठाकुर बाबा के रूप में पूजा जाता है।

जहाँ नरवर का मंदिर रानी के बलिदान और वीरता का प्रतीक है, वहीं ग्राम लोढ़ी जिला ग्वालियर का मंदिर उनके अंतिम विश्राम और सतीत्व का प्रमाण है। पार्वती नदी के किनारे बसा यह प्राचीन स्थान आज भी भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण कर रहा है,यहां इस देवी का सती माता के रूप में पूजा जाता है।

कैसे पहुंचे मूल लोड़ी के मंदिर
नरवर के मूल मंदिर से भितरवार रोड लगभग 20 किलोमीटर दूरी पर ग्राम लोढी स्थित है। वही भितरवार से भी ग्राम लोडी बस या अपने निजी वाहन से आसानी से आया जा सकता है। शिवपुरी से नरवर 50 किलोमीटर की दूरी पर है और मूल लोढी माता का मंदिर शिवपुरी से मात्र 70 किलोमीटर है।