शिवपुरी। ग्राम भटनावर में जोशी परिवार द्वारा श्री बाबा जी वाले बगीचा में आयोजित श्रीमद् भागवत कथा एवं 108 भागवत के मूल पाठ विद्वान पंडितो द्वारा किये जा रहे है। श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन आचार्य विक्रम महाराज ने श्रोताओं को व्यास गद्दी से बोलते हुए कहा कि जो समय बीत गया वह केबल स्वप्न है। जो आने वाला भविष्य का समय है वह मात्र कल्पना है। सत्य केवल वर्तमान है, और जो व्यक्ति इस क्षण को पूर्णतया से जीता है वही व्यक्ति इस संसार से मुक्त हो जाता है ।
आगे कहा कि व्यक्ति के सकारात्मक एवं पवित्र विचार ही व्यक्ति को सही दिशा और दृष्टि प्रदान करते हैं, व्यक्ति के जीवन की रचना में विचार कि मूल भूमिका है ,अतः मन में शुभ और दिव्य विचारों का जागरण हमें करना चाहिए ।
आचार्य जी ने दृष्टांत देते हुए कहा कि भगवान माखन चुराते हैं, माखन का तात्पर मन से है, माखन में से अगर कर खा निकालो तो मन बनता है, माखन चुराते भगवान अपनी ओर से इशारा कर रहे हैं और गोपियों से कह रहे हैं आप तन किसी को, धन किसी को देना, यौवन किसी को देना ,व संसार के कृत्य को भी किसी को समर्पण करना पर मन संसार वालों को नहीं देना, यह तेरे मन की मन की धज्जियां उड़ा देंगे।
मन केवल भगवान कृष्ण को ही देना। भगवान कृष्ण कहते हैं कि आपके मन को मेरे मुकुट में पंख के समान धारण कर लूंगा, माखन चोरी का अध्यात्मिक दर्शन बड़े सुंदर ढंग से भक्तजनों को समझाया। पूतना उद्धार और गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग और श्री कृष्ण की बाल लीलाओं की कथा सुनाई।
पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए महाराज श्री ने बताया कि पूतना राक्षसी ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान करने लगी। श्री कृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया । माता यशोदा जब भगवान श्री कृष्ण को पूतना के वक्षस्थल से उठाकर लाती है, उसके बाद पंचगव्य गाय के गोबर, गोमूत्र से भगवान को स्नान करती है । सभी को गौ माता की सेवा, गायत्री का जप और गीता का पाठ अवश्य करना चाहिए। गाय की सेवा से 33 करोड़ देवी देवताओं की सेवा हो जाती है।
भगवान श्री कृष्ण बृजरज का सेवन करके यह दिखा रहे है कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें है वे मेरे कितने प्रिय है भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते है। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्री कृष्ण को पुकारा तब श्री कृष्ण पृथ्वी पर आयें है इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते है, ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सके ।
गोपबालकों ने जाकर यशोदा माता से शिकायत कर दी मां तेरे लाला ने माटी खाई है, यशोदा माता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आई। "अच्छा खोल मुख" माता के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण ने अपना मुख खोल दिया, श्री कृष्ण के मुख खोलते ही यशोदा ने देखा कि मुख में चर, अचर, संपूर्ण जगत विद्वान है, आकाश दिशाएं पहाड़ दीप समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु ,अग्नि सूर्य चंद्रमा और तारों के साथ संपूर्ण ज्योति मंडल, जल तेज अर्थात प्रकृति महत्व अहंकार ,देवगण, इंद्रियां, मन सृष्टि, त्रिगुण जीव काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्व भी मूर्त देखने लगें ।पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्मू दीप है उसमें भारतवर्ष है और उसमें यह ब्रज,ब्रज में नंद बाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्री कृष्ण का हाथ पकड़े, बड़ा विस्मय हुआ माता को।
श्री कृष्ण ने देखा कि मैया ने मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है श्री कृष्ण ने सोचा यदि मैया को यह ज्ञान बना रहता है तो हो चुकी बाल लीला। फिर तो वह मेरी नारायण के रूप में पूजा करेगी, न तो अपनी गोद में बैठायेगी ना दूध पिलाएगी न ही मारेगी जिस उद्देश्य के लिए में बालक बना वह तो पूरा होगा ही नहीं, यशोदा माता तुरंत उस घटना को भूल गई।
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज कल की युवा पीढ़ी अपने धर्म, अपने भगवान को नहीं मानती है लेकिन तुम अपने धर्म को जानना चाहते है तो पहले अपने धर्म को जानने के लिए गीता, भागवत, रामायण, पढ़ो तो तुम नहीं तुम्हारी आने वाली पीढ़ी भी संस्कारी हो जाएगी।
ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा छोड़कर गिरिराज जी की पूजा शुरू कर दी तो इंद्र ने कुपित होकर ब्रजवासियों पर मूसलाधार बारिश की तब कृष्ण भगवान ने गिरिराज जी को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की और इंद्र का मान मर्दन किया, तब इंद्र को भगवान की सत्ता का एहसास हुआ और इंद्र ने भगवान से क्षमा मांगी वह कहा कि प्रभु में भूल गया था कि मेरे पास जो कुछ भी है वह है सब कुछ आपका ही दिया है कथा में राधे कृष्ण गोविंद गोपाल राधे राधे भजन गायें और भक्तों ने खूब आनंद उठाया अंत में 56 भोग का सभी भक्तों ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया।
आगे कहा कि व्यक्ति के सकारात्मक एवं पवित्र विचार ही व्यक्ति को सही दिशा और दृष्टि प्रदान करते हैं, व्यक्ति के जीवन की रचना में विचार कि मूल भूमिका है ,अतः मन में शुभ और दिव्य विचारों का जागरण हमें करना चाहिए ।
आचार्य जी ने दृष्टांत देते हुए कहा कि भगवान माखन चुराते हैं, माखन का तात्पर मन से है, माखन में से अगर कर खा निकालो तो मन बनता है, माखन चुराते भगवान अपनी ओर से इशारा कर रहे हैं और गोपियों से कह रहे हैं आप तन किसी को, धन किसी को देना, यौवन किसी को देना ,व संसार के कृत्य को भी किसी को समर्पण करना पर मन संसार वालों को नहीं देना, यह तेरे मन की मन की धज्जियां उड़ा देंगे।
मन केवल भगवान कृष्ण को ही देना। भगवान कृष्ण कहते हैं कि आपके मन को मेरे मुकुट में पंख के समान धारण कर लूंगा, माखन चोरी का अध्यात्मिक दर्शन बड़े सुंदर ढंग से भक्तजनों को समझाया। पूतना उद्धार और गोवर्धन पूजा, छप्पन भोग और श्री कृष्ण की बाल लीलाओं की कथा सुनाई।
पूतना चरित्र का वर्णन करते हुए महाराज श्री ने बताया कि पूतना राक्षसी ने बालकृष्ण को उठा लिया और स्तनपान करने लगी। श्री कृष्ण ने स्तनपान करते-करते ही पुतना का वध कर उसका कल्याण किया । माता यशोदा जब भगवान श्री कृष्ण को पूतना के वक्षस्थल से उठाकर लाती है, उसके बाद पंचगव्य गाय के गोबर, गोमूत्र से भगवान को स्नान करती है । सभी को गौ माता की सेवा, गायत्री का जप और गीता का पाठ अवश्य करना चाहिए। गाय की सेवा से 33 करोड़ देवी देवताओं की सेवा हो जाती है।
भगवान श्री कृष्ण बृजरज का सेवन करके यह दिखा रहे है कि जिन भक्तों ने मुझे अपनी भावनाएं व कर्म समर्पित कर रखें है वे मेरे कितने प्रिय है भगवान स्वयं अपने भक्तों की चरणरज मुख के द्वारा हृदय में धारण करते है। पृथ्वी ने गाय का रूप धारण करके श्री कृष्ण को पुकारा तब श्री कृष्ण पृथ्वी पर आयें है इसलिए वह मिट्टी में नहाते, खेलते और खाते है, ताकि पृथ्वी का उद्धार कर सके ।
गोपबालकों ने जाकर यशोदा माता से शिकायत कर दी मां तेरे लाला ने माटी खाई है, यशोदा माता हाथ में छड़ी लेकर दौड़ी आई। "अच्छा खोल मुख" माता के ऐसा कहने पर श्री कृष्ण ने अपना मुख खोल दिया, श्री कृष्ण के मुख खोलते ही यशोदा ने देखा कि मुख में चर, अचर, संपूर्ण जगत विद्वान है, आकाश दिशाएं पहाड़ दीप समुद्रों के सहित सारी पृथ्वी, बहने वाली वायु ,अग्नि सूर्य चंद्रमा और तारों के साथ संपूर्ण ज्योति मंडल, जल तेज अर्थात प्रकृति महत्व अहंकार ,देवगण, इंद्रियां, मन सृष्टि, त्रिगुण जीव काल, कर्म, प्रारब्ध आदि तत्व भी मूर्त देखने लगें ।पूरा त्रिभुवन है, उसमें जम्मू दीप है उसमें भारतवर्ष है और उसमें यह ब्रज,ब्रज में नंद बाबा का घर, घर में भी यशोदा और वह भी श्री कृष्ण का हाथ पकड़े, बड़ा विस्मय हुआ माता को।
श्री कृष्ण ने देखा कि मैया ने मेरा असली तत्व ही पहचान लिया है श्री कृष्ण ने सोचा यदि मैया को यह ज्ञान बना रहता है तो हो चुकी बाल लीला। फिर तो वह मेरी नारायण के रूप में पूजा करेगी, न तो अपनी गोद में बैठायेगी ना दूध पिलाएगी न ही मारेगी जिस उद्देश्य के लिए में बालक बना वह तो पूरा होगा ही नहीं, यशोदा माता तुरंत उस घटना को भूल गई।
महाराज श्री ने आगे कहा कि आज कल की युवा पीढ़ी अपने धर्म, अपने भगवान को नहीं मानती है लेकिन तुम अपने धर्म को जानना चाहते है तो पहले अपने धर्म को जानने के लिए गीता, भागवत, रामायण, पढ़ो तो तुम नहीं तुम्हारी आने वाली पीढ़ी भी संस्कारी हो जाएगी।
ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा छोड़कर गिरिराज जी की पूजा शुरू कर दी तो इंद्र ने कुपित होकर ब्रजवासियों पर मूसलाधार बारिश की तब कृष्ण भगवान ने गिरिराज जी को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाकर ब्रजवासियों की रक्षा की और इंद्र का मान मर्दन किया, तब इंद्र को भगवान की सत्ता का एहसास हुआ और इंद्र ने भगवान से क्षमा मांगी वह कहा कि प्रभु में भूल गया था कि मेरे पास जो कुछ भी है वह है सब कुछ आपका ही दिया है कथा में राधे कृष्ण गोविंद गोपाल राधे राधे भजन गायें और भक्तों ने खूब आनंद उठाया अंत में 56 भोग का सभी भक्तों ने भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया।
