शिवपुरी जिले की विधानसभा सीटों पर भाजपा को पहले अपनो से लड़ना होगा- कांग्रेस से बाद में- Shivpuri News

शिवपुरी।
2018 के विधानसभा चुनाव में शिवपुरी जिले में भाजपा की तुलना में कांग्रेस का पलड़ा भारी रहा था। जिले की पांच सीटों में से पोहरी, करैरा और पिछोर में कांग्रेस प्रत्याशी विजयी हुए थे। लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में शामिल होने और उसके बाद पोहरी और करैरा में हुए उपचुनाव में भाजपा की सीटों की संख्या दो से बढ़कर तीन हो गई।

जबकि कांग्रेस की सीटों की संख्या तीन से घटकर दो रह गई। इलाके की राजनीति में सिंधिया परिवार का प्रभाव जनमानस पर रहता है और वर्तमान में इस परिवार के दोनों ध्रुव भाजपा में हैं। इस कारण आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को कांग्रेस की चुनौती का कम और अपने अंतर्द्वंद का अधिक सामना करना पड़ेगा ऐसा प्रतीत हो रहा है।

तीन में से दो विधायकों पीडब्ल्यूडी राज्यमंत्री सुरेश राठखेड़ा जो कि पोहरी से विधायक हैं और कांग्रेस से 5 साल पहले भाजपा में आए कट्टर सिंधिया समर्थक रहे कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी की टिकट प्राप्ति की राह आसान नहीं लग रही है। एक ओर जहां कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी को क्षेत्र में अपने ही कार्यकर्ताओं और नेताओं के विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

वहीं पोहरी विधायक सुरेश राठखेड़ा को अपने ही दल में जबरदस्त चुनौती का सामना करना पड़ रहा है और जनमानस में भी उनकी पकड़ उतनी मजबूत नजर नहीं आ रही है। आगामी विधानसभा चुनाव में जिले के जिन दो विधायकों के टिकट पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं, उनमें पोहरी विधायक और मंत्री सुरेश राठखेड़ा कट्टर सिंधिया समर्थक हैं।

जबकि कोलारस विधायक वीरेंद्र रघुवंशी एक जमाने में भले ही ज्योतिरादित्य सिंधिया के खास रहे हों और उन्हीं के कारण वह शिवपुरी विधानसभा क्षेत्र से 2007 के विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विजयी रहे हों। लेकिन बाद में श्री रघुवंशी सिंधिया से नाराज होकर ही भाजपा में आए हैं।

श्री रघुवंशी भाजपा में सांसद केपी यादव के नजदीकी माने जाते हैं, जिन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में गुना सीट से ज्योतिरादित्य सिंधिया को पराजित किया था। सूत्र बताते हैं कि सिंधिया के भाजपा में आने के बाद वीरेंद्र रघुवंशी की पार्टी में स्थिति कमजोर हुई है।

पार्टी कार्यकर्ताओं का भी वह अपने अक्कड़ स्वभाव के कारण विश्वास जीतने में असफल रहे हैं। सिंधिया के साथ भाजपा में पूर्व विधायक महेंद्र सिंह यादव भी आए हैं। श्री यादव कोलारस विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विजयी रहे थे और उन्होंने भाजपा प्रत्याशी पूर्व विधायक देवेंद्र जैन को पराजित किया था, लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में वह कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में भाजपा प्रत्याशी वीरेंद्र रघुवंशी से 700 मतों से पराजित हो गए थे।

सिंधिया के भाजपा में आने के बाद इलाके में महेंद्र यादव का दबदबा काफी बढ़ा है और उन्हीं के कारण भाजपा में विधायक रघुवंशी को नित्त नई चुनौतियां मिल रही हैं। श्री रघुवंशी को कमजोर करने के लिए पूर्व विधायक देवेंद्र जैन भी महेंद्र यादव के साथ हैं।bइस तरह से भाजपा में एक मजबूत लॉबी निरंतर विधायक रघुवंशी की घेराबंदी में लगी हुई है और कोलारस में टिकट का प्रबल दावेदार सिंधिया समर्थक महेंद्र यादव को माना जा रहा है। पूर्व विधायक देवेंद्र जैन भी अपने आप को टिकट की दौड़ में मानते हैं। उनका कहना है कि कोलारस की जनता ने विधायक रघुवंशी के साथ.साथ महेंद्र यादव और मेरा कार्यकाल देखा है और सर्वे में उन्हें कोई पीछे नहीं छोड़ सकता।

वह भी मानते हैं कि कोलारस में टिकट की दौड़ में महेंद्र यादव वर्तमान में सबसे आगे हैं। जहां तक पोहरी विधानसभा क्षेत्र का सवाल है तो सुरेश राठखेड़ा 2018 से अब तक दो बार यहां से चुनाव जीत चुके हैं। 2018 में वह जहां कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में विजयी हुए थेए वहीं उपचुनाव में भाजपा प्रत्याशी के रूप में वह जीतने में सफल रहे। लेकिन तब से अब तक पोहरी की कूनो और पार्वती नदी में बहुत सारा पानी बह चुका है।

पोहरी के लोग बताते हैं कि उपचुनाव में सुरेश राठखेड़ा की जीत इसलिए हुई क्योंकि वहां कांग्रेस प्रत्याशी हरिवल्लभ शुक्ला का मुखर विरोध था और जातिगत समीकरण भी सुरेश राठखेड़ा के पक्ष में थे। लेकिन भाजपा में सुरेश राठखेड़ा को पूर्व विधायक प्रहलाद भारती से टिकट के लिए जोरदार मुकाबला करना पड़ेगा।

श्री भारती 2008 और 2013 में लगातार 2 बार पोहरी से जीतने में सफल रहे और इस विधानसभा क्षेत्र से लगातार दो चुनाव जीतने वाले वह अकेले विधायक रहे हैं। श्री भारती को यशोधरा राजे सिंधिया समर्थक माना जाता है और इलाके में उनकी छवि भी काफी अच्छी है। वह भी धाकड़ समुदाय से हैं। जिसके इस विधानसभा क्षेत्र में 50 हजार से अधिक वोट हैं।

अपनी स्थिति को पहचान कर श्री राठखेड़ा कभी लोहा पीटा के बीच जाकर हथोड़ा चला रहे हैं तो कभी भक्ति संगीत पर झूम रहे हैं। लेकिन इसके बाद भी 2018 के विधानसभा चुनाव में सिंधिया समर्थक होने के बाद भी उन्हें टिकट मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है।