KUNO PARK NEWS- 102 साल पहले अफ्रीका से शेर आए थे, समुद्र के रास्ते माधौ महाराज लाए थे

शिवपुरी। कूनो के जंगल का लगता है विदेशी मेहमानों से कोई कनेक्शन हैं। कुनो की जंगल में फिर 102 साल बाद विदेशी मेहमान नामीबिया से चीता के रूप में आए है, इससे पूर्व सन 1920 में ग्वालियर रियासत के माधौ महाराज (माधवराव सिंधिया प्रथम) अफ्रीका से पानी के रास्ते शेरों को लेकर आए थे कूनो में बसाया था। इन शेरों के लिए बडे-बडे बाडे भी बनाए गए थे जो आज भी कूनो नेशनल पार्क में बने हुए है। कूनो नेशनल पार्क को पूर्व में पालपुर का जंगल कहा जाता था।

यह है कूनो का वर्षों साल पुराना गौरवशाली इतिहास
आज पीएम मोदी चीता प्रोजेक्ट का कूनो नेशनल पार्क में शुंभारंभ कर रहे हैं,चारों ओर कूना की चर्चा हैं,चर्चा में अफ्रीकी चीता है,लेकिन वर्तमान से पूर्व इतिहास की बात होना भी आवश्यक है,इस जंगल का इतिहास गौरवशाली है। 

इससे पहले 1920 में महाराजा माधवराव सिंधिया प्रथम ने अफ्रीका से शेरों को लाकर बसाया था। शेरों के बाड़े आज भी यहां मौजूद है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने जन्मदिन के मौके पर यहां चीता लेकर आ रहे हैं। इससे पूर्व 455 साल पहले (वर्ष 1666 में) चंद्रवंशी राजा बलभद्र सिंह ने यहां अपनी राजधानी बसाई। यहां कूनो नदी के किनारे आलीशान किला है, जो अभी भी बेहतर स्थिति में है। इस भूमि ने कई लड़ाई देखी हैं। यहां पालपुर गढ़ी और आमेठ का किला भी है। ये स्थान डकैतों के लिए भी जाना जाता है।

कूनो अभयारण्य 1981 में अस्तित्व में आया था। कूनो अभ्यारण्य से पूर्व इस क्षेत्र को पालपुर का जंगल कहा जाता था। यह जंगल काफी घना हैं और इस जंगल की जीवनदायिनी नदी कूनो 12 माह बहती हैं।

कूनो नदी एक ऐसी नदी हैं जो घनी आबादी में नही बहती हैं यह अपनी पूरी यात्रा जंगल में ही तय करती हैं इसका पानी पीने के लिए बेहतर हैं इस नदी के पानी में प्रदूषण की मात्रा न के बराबर है। 1950 के दशक में यह पालपुर रियासत का क्षेत्र था फिर यह ग्वालियर स्टेट की शिकारगाह बन गई थी।

1981 में इस क्षेत्र को जंगली जानवरों के लिए अभ्यारण्य घोषित कर दिया जब इसका क्षेत्रफल मात्र 345 वर्ग किलोमीटर था। 2003 में कूनो अभयारण्य हो नेशनल पार्क का दर्जा मिल गया। गुजरात के गिरी के शेरों को यहां लाने का प्रोजेक्ट बनाया गया। इसमें शिवपुरी जिले के कुछ गांव शामिल किए गए टोटल 24 गांवों को विस्थापित किया गया।