शिवपुरी की बलारी माता की कथा- मूर्ति रुप मे नही सशरीर कंकाल रूप मे स्थापित हैं माता - Shivpuri News

शिवपुरी। चैत्र नवरात्रि की धूम पूरे देश में है। दो वर्षो से बंद पड़े धार्मिक आयोजन कोरोना की कमी के बाद पुन: शुरू हो गए हैं। शिवपुरी के ऐतिहासिक मंदिर बलारी माता पर लगने वाला तीन दिवसीय मेला सप्तमी पर नेजे चढऩे के साथ समाप्त हो गया है। इन तीन दिनों में लाखों भक्तों ने मां के तीन रूपों के दर्शन किए और अपना जीवन निहाल किया।

ऐसी मान्यता है कि मां के इस स्वरूप का लाखा बंजारा यहां लेकर आया था और दावा किया जाता है कि मां बलारी की जो प्रतिमा है वह किसी धातु या पत्थर से नहीं बनी है बल्कि मां की प्रतिमा कंकाल से निर्मित है और मां के इस स्वरूप को जाग्रत स्वरूप माना जाता है और इसी स्वरूप की जहां पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां यहां सुबह बाल रूप में, दोपहर युवा रूप में और रात में वृद्ध रूप में दर्शन देती हैं।

धरती चीर कर निकली थीं मां बलारी

मंदिर के पुजारी ने बताया कि मंदिर से 1.5 किलोमीटर दूर झाला (झरना स्वरूप) है जहां मैया रानी प्रकट हुई। एक जमाने में लाखा बंजारा माल ढुलाई के दौरान झाला पर रुकता था। इस दौरान लाखा बंजारा के बच्चों के साथ मां भगवती बाल रूप में खेलने आती थी। लाखा बंजारा की कन्या पर नजर पड़ी लाखा बंजारा बियावान जंगल में कन्या के बारे में जानने के लिए पीछे गया। जिसके बाद माता ने उसे दर्शन दिए ओर उसकी बैल गाड़ी पर बैठकर चलने लगीं।

इस बीच मां भगवती ने लाखा बंजारा से कहा कि पीछे मुड़ कर नहीं देखना, परन्तु लाखा बंजारा ने पीछे मुड़ कर देखा मां बलारी बैलगाड़ी से उतरकर खड़ी की खड़ी रह गईं। उस स्थान पर आज मां का मंदिर बना हुआ है। पुजारी के अनुसार मां सशरीर वहां स्थापित हो गईं और आज भी वह सशरीर वहां मौजूद हैं। मंदिर की जो प्रतिमा है, वह किसी धातु या पत्थर की नहीं है। वह चल शरीर का कंकाल है।

बलारी माता के मंदिर पर डकैत हर वर्ष चढ़ाते थे घंटा

अब तो डकैत समस्या लगभग समाप्त हो गई है। लेकिन जब शिवपुरी जिले में डकैत समस्या विकराल रूप में थी और डकैतों का आतंक छाया हुआ था। उस दौरान सक्रिय प्रत्येक डकैत नवरात्रि में बलारी मां का आर्शीवाद लेने अवश्य आता था और डकैत सरगना माता के मंदिर में हर वर्ष घंटा चढ़ाता था।

यहां के पुजारी बताते हैं कि माता के चमत्कार के अनेक दृष्टांत हैं। भले ही डकैत बलारी माता के दरबार में आकर घंटा चढ़ाते थे। लेकिन मां डकैतों को पसंद नहीं करती थी और जब डकैत किसी पकड़ को मंदिर के आस—पास सुरक्षित स्थान पर रखते थे, तो पकड़ मुक्त हो जाती थी। जिसका लोहा डकैतों ने भी माना और फिर कोई भी डकैत मंदिर के आसपास पकड़ करने के बाद उसे वहां नहीं रखते थे।