आजादी से पूर्व ब्रांड थी पोहरी में बनी खादी, गोल्ड मेडल मिला था प्रदर्शनी में,कागज का भी होता हैं उत्पादन - Pohri News

संतोष शर्मा@पोहरी। जब देश में स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु आंदोलन अपने चरम पर था तभी एक दूरदृष्टा मनीषी पोहरी को स्वावलंबी शिक्षा का केंद्र बनाने में जुटा था, अंग्रेजी हुकूमत और उसके अत्याचारों के बावजूद भी उन्होंने अपने साथियों के साथ स्वतंत्रता संग्राम में योगदान देते हुए भी शिक्षा हेतु अपने प्रयासों को सतत रूप से जारी रखा।

जी हां हम बात कर रहे हैं नवीन पोहरी किशनगंज अर्थात कृष्णगंज को मूर्तरूप देने वाले पं गोपाल कृष्ण पुराणिक जी की उन्होंने गुलामी के दिनों में पोहरी को शिक्षा का केंद्र बनाया था अपितु यहां के विद्यार्थियों को स्वावलंबी जीवन जीने की कला भी सिखाई।

प्रथम आदर्श विद्यालय 12 जनवरी 1921 में सर्व समाज के सात विद्यार्थियों के साथ पोहरी के ग्राम भटनागर में स्थापित किया गया था जिसके बाद तत्कालीन अंग्रेजी हुकूमत की ग्वालियर स्टेट ने वर्ष 1929 में गजट नोटिफिकेशन जारी कर पंडित गोपाल कृष्ण पुराणिक जी को रियासत से निष्कासित कर दिया था,

इस आदेश के बाद विद्यालय को वर्ष 1931 में पोहरी स्थानांतरित कर दिया गया था। इसी बीच पोहरी में तत्कालीन जागीरदार श्री मालोजीराव नरसिंहराव शितोळे द्वारा पंडित जी का भरपूर सहयोग किया गया तथा 310 बीघा जमीन दान में दी, जिसमें वर्तमान कृष्णगंज स्थित है। यहां पंडित जी द्वारा खादी, माचिस, कागज एवं शहद उत्पादन का कार्य स्थानीय ग्रामीणों एवं विद्यार्थियों को प्रशिक्षित करने के साथ प्रारंभ कर दिया था।

पंडित जी ने अपने शिष्य रतिराम जो कि बगवासा ग्राम के निवासी थे को 1927 में महात्मा गांधी जी के साबरमती आश्रम में भेजा जहां से वह खादी बनाने का प्रशिक्षण लेकर लौटे, रतिराम जी एक वर्ष में ही खादी बनाने एवं सूत कातने में इतने माहिर हो गये कि उनकी तारीफ करते हुए स्वयं गांधी जी ने यंग इंडिया में लेख लिखा था। 1928 में रतिराम जी पोहरी वापस आये तब वर्तमान कृष्णगंज में खादी भंडार की स्थापना श्री मालोजीराव नरसिंहराव शितोळे जी की सहायता से की गई। यहां खादी के साथ ही, कागज, माचिस एवं शहद का उत्पादन प्रारंभ हो गया था।

पोहरी में बनी सबसे पतली खादी जो कि 70 अंक के सूत से बनाई जाती थी, 1931 में उज्जैन में आयोजित प्रदर्शनी में तत्कालीन ग्वालियर रियासत के महाराज जीवाजीराव सिंधिया को भेंट की गई तो उन्होने भी खूब प्रशंसा की, ग्वालियर कृषि मेला प्रदर्शनी में पोहरी की खादी को स्वर्ण पदक एवं कई पुरस्कार प्राप्त हुए थे।

ग्राम कला मंदिर पोहरी में इतनी बारीक खादी हेतु सूत कातने का कार्य ग्राम खोड निवासी महिला गेंदा बाई ही कर सकती थी जिसे कातने का कार्य विशेष प्रशिक्षित बुनकर नंदोई द्वारा की जाती थी। रंग बिरंगी खादी के उत्पादन को प्रारंभ करने से पूर्व आदर्श सेवा संघ कें सदस्य नारायण दास त्रिवेणी उत्तर प्रदेश में स्वयं प्रशिक्षण लेकर लौटे, इसके बाद रंगीन खादी का निर्माण भी पोहरी में प्रारंभ कर दिया गया।

हाथ कागज निर्माण हेतु परमानंद पुराणिक जी को महाराष्ट्र के वर्धा भेजा गया जहां से प्रशिक्षण लेने के बाद वर्ष 1940 में ग्राम कला मंदिर वर्तमान खादी भंडार में कागज की कतरन, जूट, फटी पुरानी बोरियों, खादी की चिंदियों से हाथ कागज का उत्पादन प्रारंभ कर दिया था, इस कागज की विशेषता थी कि इस पर स्याही फैलती नहीं थी जिससे लिखावट भी सुंदर बनी रहती थी।

माचिस अर्थात दियासलाई का उत्पादन प्रारंभ करने से पूर्व ललित मोहन महाजन को सोदपुर पश्चिम बंगाल भेजा गया जहां से प्रशिक्षण लेने के बाद 1941 में माचिस उत्पादन का कार्य ललितमोहन जी की देखरेख में प्रारंभ किया गया। माचिस की डिब्बियों को पुराने अखबार, कागज के बचे हुए टुकड़ों से बनाया जाता था जबकि तीलियों को स्थानीय जंगल से लाये गये बांस से बनाया जाता था।

परमानंद पुराणिक जी मधुमक्खी पालन में भी प्रशिक्षित थे उन्होंने कुछ पेटियां बाहर से मंगाकर मधुमक्खी पालन का कार्य प्रारंभ कर दिया था, यहां की शहद को प्रदशर्नी एवं मेलों के माध्यम से विक्रय किया जाता था।

लेख में प्रस्तुत सामग्री विभिन्न माध्यमों एवं आदर्श विद्यालय में अध्ययन के समय स्व रामगोपाल गुप्त जी द्वारा वर्ष 1990 से 1994 के दौरान विद्याथियों के साथ प्रार्थना सभा में साक्षा किये गये अनुभवों एवं संवाद पर आधारित है।