सिद्धि विनायक अस्पताल की मुश्किलें बढी:नीलू चौहान की लाश के मामले में अधिवक्ता जैन ने भेजा नोटिस- Shivpuri News

शिवपुरी। भू्रण हत्या का वीडियो वायरल होने के मामले में शिकंजे में आए सिद्धी विनायक अस्पताल की मुश्किलें लगातर बढ़ रही हैं। अब दो अभिभाषकों ने कोरोना काल के दौरान एक संक्रमित महिला के शव को घर के बाहर छोडऩे के मामले में अस्पताल प्रबंधन को लीगल नोटिस दिया है।

नोटिस में चिकित्सीय लापरवाही का आरोप भी अस्पताल प्रबंधन पर लगाया गया है। नोटिस मेें प्रमुख सचिव स्वास्थ्य सेवाएं, कलेक्टर शिवपुरी, सीएमएचओ आदि को भी पार्टी बनाया गया है। नोटिस में लिखा है कि 15 दिन के भीतर कार्रवाई नहीं किए जाने पर हाई कोर्ट में याचिका दायर की जाएगी।

यह था मामला
दरअसल, मई में कमलागंज निवासी नीलू चौहान कोरोना पॉजिटिव होने के बाद इलाज के लिए सिद्धि विनायक अस्पताल में भर्ती हुई थी। हालत बिगड़ता देख, महिला को जिला अस्पताल और जिला अस्पताल से मेडिकल कॉलेज रैफर किया गया। लेकिन मेडिकल कॉलेज जाने से पहले ही महिला की मौत हो गई। इसके बाद सिद्धि विनायक अस्पताल की एम्बुलेंस का ड्राइवर महिला की लाश को घर के बाहर छोड़कर भाग आया। शव पूरा एक दिन घर के बाहर पड़ा रहा और उसके छोटे-छोटे बच्चे शव से लिपटे रहे।

जिससे बच्चों की जान भी खतरे में पड़ गई थी। बाद में मामला सुर्खियों में आया तो आनन-फानन मेें नगर पालिका ने महिला का अंतिम संस्कार कराया। महिला के घर पर परिजन के नाम पर सिर्फ 3 छोटे बच्चे हैं। कुछ सालों पहले महिला के पति की भी मौत हो गई थी। मामले की गंभीरता और अस्पताल की लापरवाही देख अधिवक्ता स्वप्निल और अभय ने अब मामले में नोटिस जारी किया है।

क्या हुई लापरवाही

कोविड नियमों के अनुसार अगर किसी की मौत हो जाती है, तो मृतक के शव को परिजनों को न सौंप कर नगर पालिका रीति-रिवाज के साथ मृतक का अंतिम करेगी। वहीं इस मामले में महिला की मौत के बाद एम्बुलेंस चालक महिला के शव को घर के बाहर छोड़ आया। जिस वजह से संक्रमण फैलने का खतरा काफी बढ़ गया था।

लायसेंस निरस्त करने और मृतिका के बच्चों को 15-15 लाख रूपए की एफडी कराने की मांग

सिद्धी विनायक अस्पताल सहित कलेक्टर, सचिव और सीएमएचओ को दिए नोटिस में लिखा है कि15 दिवस के भीतर अस्पताल पर कार्रवाई करते हुए उसका लायसेंस निरस्त किया जाए और इसी समय-सीमा में मृतिका नीलू चौहान के तीनों बच्चों के नाम पर 15-15 लाख रूपए की एफडीआर कराई जाए। अगर ऐसा नहीं होता है तो वह मामले को हाईकोर्ट में ले जाएंगे।