स्वामी भक्ति में चरणों में चढाया लोकतंत्र,एक को जनता ने दो बार सिर पर रखा और 2 बार पटक दिया - Shivpuri News

एक्सरे@ ललित मुदगल शिवपुरी।
जिले की जातिवाद से श्रापित पोहरी विधानसभा में इस बार फिर मुददे फैल होते दिख रहे हैं तो वही इस बार जातिवाद भी फैल होता दिख रहा हैंं। जनता पर थोपे गए इस चुनाव में धाकड और ब्राहम्मण समाज के मतदाताओ के मन में ओर कुछ चल रहा हैं। इस उपचुनाव में जनता का क्या मन है स्पष्ट नही कहा जा सकता। सन 2018 के चुनाव में भी चौकाने वाले परिणाम सामने आए थे,इस बार भी समाज के प्रत्याशी अपने अपने समाज को एकत्रित करने में फैल होते दिख रहे है। आईए इस उपचुनाव का एक्सरे करते हैं।

पहले सन 2018 के चुनाव पर एक नजर डालते हैं

सन 2018 के आम चुनाव में कांग्रेस से प्रत्याशी थे सुरेश राठखेडा,भाजपा से प्रत्याशी थे प्रहलाद भारती ओर बसपा से प्रत्याशी से थे कैलाश कुशवाह। जातिवाद की जहर से भरी इस विधानसभा में भाजपा और कांग्रेस ने धाकड समाज के प्रत्याशी मैदान में उतारे। ब्राहम्मण समाज से आने वाले हरिबल्लभ शुक्ला को कांग्रेस ने कमजोर आंक कर सुरेश राठखेडा को अपना प्रत्याशी बनाया।

इसका सीधा लाभ बसपा के प्रत्याशी कैलाश कुशवाह को अघोषित रूप से ब्राहम्मण समाज ने कैलाश का समर्थन कर दिया। एक समय पर ऐसा लग रहा था कि कैलाश कुशवाह चुनाव जीत जाऐंगें। यही हवा थी सन 2018 के चुनावो की लेकिन हवा के विपरित नतीेजे आए।

कांग्रेस के प्रत्याशी सुरेश राठखेडा को जीत मिली,हाथी को हाथ ने रोक दिया कैलाश कुशवाह दुसरे नंबर पर रहे और भाजपा से दो बार के विधायक को जनता ने बुरी तहर से नकार दिया और तीसरे नंबर पर पहुंचा दिया।

इस चुनाव में तीनो परिणाम हैरान करने वाले थे पहला सुरेश राठखेडा को विजयी होना और कैलाश कुशवाह का चुनाव जीतते जीतते हार जाना और भाजपा के प्रत्याशी प्रहलाद भारती का तीसरे नंबर पर पहुंचना। इसको अप्रत्याशित परिणाम ही कह सकते हैं सीधे-सीधे शब्दो में कहे तो जनता को मूड भापने में सभी नकाम रहे।

अब इससे पहले के चुनावो की चर्चा भी करते हैं

पोहरी विधानसभा क्षेत्र प्रदेश के उन गिने चुने विधानसभा क्षेत्रों में है, जहां जातिवाद की तूती बढ़-चढ़कर बोलती है। जातिवाद की राजनीति के कारण ही पोहरी में अभी तक धाकड़ (किरार) और ब्राह्मण उम्मीदवार ही चुनाव जीत पाए हैं। अन्य किसी जाति के उम्मीदवार को चुनाव में सफलता हांसिल नहीं हो पाई है।

1977 से लेकर 1985 तक के तीन चुनावों में ब्राह्मण उम्मीदवार विजयी रहे। 1977 में जहां जनता दल के दामोदर शर्मा चुनाव जीते। वहीं 1980 में कांग्रेस के हरिवल्लभ शुक्ला और 1985 में स्व. हिमांशु शर्मा ने जीत का वरण किया। 1989 और 1993 में जीत का सेहरा धाकड़ उम्मीदवारों के सिर बंधा।

1989 में भाजपा के स्व. जगदीश वर्मा और 1993 में कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी बैजंती वर्मा विजयी हुईं। 1998 में भाजपा के नरेंद्र बिरथरे और 2003 में समानता दल के हरिवल्लभ शुक्ला चुनाव जीते। लेकिन इसके बाद 2008 से 2018 के तीन चुनाव में विजयश्री धाकड़ (किरार) उम्मीदवारों को हांसिल हुई।

2008 और 2013 में भाजपा के प्रहलाद भारती चुनाव जीते और इस जीत के साथ ही उन्होंने एक रिकॉर्ड भी अपने नाम किया। अभी तक पोहरी विधानसभा क्षेत्र में कोई भी विधायक लगातार दो बार चुनाव नहीं जीता। लेकिन प्रहलाद भारती ने इस मिथक को तोड़ा और वह लगातार दो बार जीतने वाले विधायक बने।

आईए अब उपचुनाव की बात करते हैं:स्वामी भक्ति में चढाया लोकतंत्र

यह उपचुनाव हैं इस चुनाव में हवाएं काम काम नही करती हैं इस चुनाव में स्थानीयता के मुददे और प्रत्याशियो के चाल चरित्र और चेहरे काम करते हैंं। यह चुनाव जनता पर थौपा गया हैं दल बदलने के कारण यह चुनाव हो रहा हैं। कांग्रेस के विधायक सुरेश राठखेडा ने इस्तीफा दिया इस इस कारण चुनाव हो रहा हैं।

सीधा-सीधा लिखे तो एक विधायक की हठधर्मिता स्वामीभक्ति के कारण यह चुनाव हुआ है। स्वामी भक्ति वह मंच से भी बोल चुके हैं,स्वामी भक्ति में उन्हें मंत्री पद मिला लेकिन जनता को क्या मिला। चुनाव में एक अनुमान लगाया जाता हैं कि एक विधानसभा चुनाव में लगभग 2 करोड रूपया सरकारी खर्च होता हैं।

यह पैसा कहां से आता हैं यह आप सब जानते हैं कि आपकी और हमारी जैब से आता हैं,मंत्री जी और स्वामी तो यह पैसा देंगें नही। सरकारी नए टैक्स ठोकेंगी और आपसे ही वसूल करेंगी।

कुल मिलाकर विधायक की स्वामी भक्ति का खामियाजा आपको टैक्स के रूप में चुकाना हेागा। कांग्रेस सीधे-सीधे विधायकों का बिकने का का आरोप लगा रही हैं,लोकतंत्र में धनतंत्र की सरकार चल रही हैंं। विधायक महोदय भी अपने 15 महीने के कार्यकाल में अपने परिवार के कामो और एसडीओपी की वायरल वीडियो से चर्चा में रहे। अपनो को सताने का सबसे बडा आरोप विधायक जी पर है।

विधायक जी को अब अपने दल और अपने जाति पर भरोसा हैं कि वह फिर चुनाव जीतेंगे। लेकिन सूत्र बता रहे हैं कि पिछली बार जैसा इनका समाज संगठित हुआ था वह इस बार नही होगा। इनका समाज की इनको सबक सिखा दे तो कोई बडी बात नही हैं,सबसे बडा उदाहरण एडवोकेट विनोद धाकड का निर्दलीय चुनाव लडना। अब बात करते हैं विधायक और संगठन की। इनका दल बदलना और उसमें फिट बैठना पार्टी के बडे नेताओ को सामज्स्य हैं।

लेकिन स्थानीय स्तर के नेता या आम कार्यकर्ता में यह नही घुल पा रहे हैंं। देखने और दिखाने को संगठन के नेता और कार्यकर्ता साथ हैं लेकिन सच में हैं कैसे कह सकते हैंं। विधायक जी का दल बदलने में सबसे ज्यादा फर्क पडा हैं पूर्व विधायक महोदय को अगर वह पैदल चलचल कर इन्हें चुनाव जीता दे उनका राजनीतिक जीवन पर ताला लग जाऐगा। अब यह कैसे हो सकता हैं कि कोई अपने ही हाथ से अपने राजनैतिक जीवन की आत्महत्या कर ले आप स्वयं समझदार हैं। कार्यकर्ताओ पर पैरासूट से उतारे इन विधायक महोदय कितने सूट हैं यह तो समय ही बताऐगा,लेकिन विधायक जी समझ ले की रास्ते इतने आसान नही हैंं।

दलबदलने के महामंडलेश्वर: महल के लिए बने रहे हैं बारूद हरिबल्लभ शुक्ला 

अब बात करे चारो पार्टियो का तीर्थाटन करके आए कांग्रेस के प्रत्याशी हरिबल्लभ शुक्ला,हरिबल्लभ शुक्ला कांग्रेस के जिले के कददावर नेताओ में एक नाम हैं। सिंधिया के लिए वे अभी भी बारूद बने हुए हैंं। इसी बारूद को कमलनाथ ने इस चुनाव में इस्तेमाल किया है।

हरिबल्लभ शुक्ला पोहरी से दो बार विधायक रह चुके हैं लेकिन यह भी स्पष्ट दो बार जनता ने चुना तो 2 बार जनता उन्है नकार भी चुकी हैं और एक बार उनके कंधे पर चढकर चुनाव लडे उनके स्व:बडे भाई को भी पोहरी की जनता ने अपने लायक नही समझा हैं।

हरिबल्लभ शुक्ला अब पांचवी बार चुनाव मैदान हैंं। हरिबल्लभ शुक्ला जिले के पहले ऐसे नेता हैं जो भाजपा,कांग्रेस,बसपा ओर समनता दल से चुनाव लड चुके हैं चार पार्टियो को तीर्थाटन कर चुके हैंं। इस कारण दल बदलने का मुददा अब पोहरी विधानसभा में हाबी नही हैं। स्थानीय मुददे विकास का कोई विशेष रोड मैप किसी भी प्रत्याशी के पास नही हैं।

अब बात वर्तमान की करते हें इस समय मुकाबला कांटे का हैं इस चुनाव की दशा स्पष्ट किसी के पास नही है लेकिन दिशा दिख रही हैं। जैसा कि बार-बार लिखा जा चुका हैं कि यह जातिवाद की जहरीली विधानसभा हैं,धाकड और ब्राहम्मण आमने सामने हैं,हरिबल्लभ शुक्ला को कांग्रेस के मुल वोटर और अपने ब्राहम्मण समाज के मतदाताओ पर भरोसा हैं लेकिन यह भी स्पष्ट है कि हरिबल्लभ शुक्ला का स्थानीय स्तर पर ब्राहम्मण नेताओ का विरोध अधिक हैं। अगर आंकडे की बात करे तो संख्या में ब्राहम्ण नेता भाजपा में अधिक हैं।

अब वह भी भाजपा के लिए अपने प्रत्याशी कि लिए दम लगाऐंगें और जातिवाद की इस जहरीली विधानसभा में इन भाजपा के इन ब्राहम्मण नेताओ का वर्क भी भाजपा ने समाज के वोटो में सेध लगाने को दिया है। सवाल यह भी बडा हैं कि अगर सभी ब्राहम्मण मतदाता हरिबल्लभ के साथ शतप्रतिशत होते तो वह 2 चुनाव भी क्यों हारते सवाल बडा हैं।

हरिबल्लभ शुक्ला अपनी सभाओं पर भाजपा पर हमला कर रहे हैं लेकिन वह अपने 2 बार के कार्यकाल का जिक्र नही कर रहे है कि वह लडकर और अपने दम पर पोहरी के विधानसभा के लिए क्या लेकर आए.....यह सवाल भी बडा हैं और इसकी हवा भी चल रही हैं।

बसपा के कैलाश कुशवाह,परिणाम में किंगमेकर की भूमिका में 

अब बात करते हैं बसपा के प्रत्याशी कैलाश कुशवाह की,यह भी दलबदलू हैं यह भी भाजपा के कुनबे के सदस्य हैं। सन 2018 के चुनाव में शानदार प्रर्दशन किया था। कैलाश कुशवाह के पास खोने को कुछ नही हैंं,वह पिछले चुनाव से ही पोहरी में सक्रिय हैं और इनका स्थानीय स्तर पर कोई विरोध नही हैं मृदुभाषी और मिलनसार व्यक्तित अपनी ओर खीचता हैंं।

कैलाश कुशवाह से ही तीसरी जाति तीसरा गणित का सूत्र पोहरी विधानसभा में अस्तितव में आया हैं बसपा के मूल वोटर और अपनी जतिगत संख्या के आधार पर चुनाव मैदान में,लेकिन अन्य समाजो में भी वह अपना घर बना रहे हैं। भाजपा कांग्रेस अपने चुनावी गणित में कैलाश कुशवाह का गणित फिट कर अपनी चुनावी रणनीति बना रही हैं। मुकाबला पिछली बार की तरह त्रिकोणीय हैं। कैलाश कोई भी बडा उलटफेर कर सकते हैं।

यूथ जाऐंगा बूथ की ओर:पारम का नारा बुलंद 

चौथे प्रत्यशी निर्दलीय के रूप में पारमसिंह रावत मैदान हैं यूथ जाऐगा पारम के लिए बूथ का नारा पोहरी में जोर—शोर से पकड रहा हैं पारम सिंह रावत सीधे-सीधे पिछले चुनाव के गणित से बात करे तो भाजपा प्रत्याशी के लिए संकट बन रहे हैं पिछली बार रावत समाज ने सुरेश राठखेडा के लिए मेहनत की और संकट मोचन बने लेकिन इस बार संकट बन रहे हैं।

पोहरी की जनता का मूड समझना भी एक ढेरी खीर

पोहरी से प्रहलाद भारती दो बार के विधायक,लगातार विधायक बनाने रिकार्ड तोडा। सरकूला डेम के नायक और पोहरी में सबसे ज्यादा स्कूूल देने वाले विधायक के नाम के रूप मे पहचान,लेकिन पोहरी की जनता ने विधानसभा 2018 में तीसरी नंबर पर पटक दिया....कारण किसी के पास नही हैं क्यो पोहरी की जनता है कुछ भी कर सकती हैं।

यह गणित भाजपा ओर कांग्रेंस दोनो के लिए हैं कि वह समाज की छाती पर चढ कर आंकडे जीत के नही बनाए, क्यों की जनता इस बार बदलाव चहती हैं एक कारण उपचुनाव झेलना पड रहा है। लोकतंत्र को स्वामी भक्ति के चरणो में गिरवी रखने का सबक चुकाना चाहती हैं और एक को दो बार जीता चुकी है और 2 बार हरा चुकी हैंं।