कोरोना की दृष्टि से नही बच पाए विघ्नहर्ता:मंच ग्रहण न करने पर 1 करोड का कारोबार चौपट

शिवपुरी। शिवपुरी शान और पहचना कहलाने वाला गणेश चर्तुर्थी का त्यौहार इस बार फिका रहेगा। इस कोरोना काल में कोरोना की दृष्टि से विघ्नहर्ता भी नही बच पा रहे हैं और श्रीगणेश मंच ग्रहण नही करेंगें। इस कारण पडाल भी नही लगेंगें,ओर इससे लगभग 1 करोड रूपए का करोबार चौपट होने का अनुमान लगाया जा रहा हैं।

जैसा कि विदित हैं कि गणेश उत्सव का त्यौहार जो शिवपुरी की पहचना बन चुका हैं कोरोना काल के चलते सार्वजनिक रूप से नही मनाया जा सकता है। सरकारी गाईड लाईन के अनुसार इस बार गणेशी जी महाराज के पडाल नही लग सकते हैं। घर पर ही अपने श्रीगणेश को विराजित करेगें पूजा अर्चना करेंगें।

500 पांडाल सजेते थे जिले भर में,याद आऐंगें टेकरी के राजा
जिले भर में 500 से अधिक पांडाल सजते थे, लेकिन कोरोना के चलते इस बार गली मोहल्लो सहित अन्य स्थानों पर गणेश प्रतिमाओं को विराजमान नहीं किया जाएगा, बल्कि लोगों को घर में ही मिट्टी के गणेश की प्रतिमा विराजमान करने के निर्देश दिए गए हैं। ऐसे में बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं बनाकर उन्हें जिलेभर के अलावा अन्य शहरों में भेजने वाले मूर्तिकारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

मूर्तिकारों का कहना है कि शहर के सभी मूर्तिकारों का कारोबार 50 लाख से अधिक का होता था, लेकिन कोरोना के चलते कारोबार पूरी तरह से चौपट हो गया है। पहले जहां वह जुलाई माह से आर्डर पर मूर्ति तैयार करने में जुट जाते थे, लेकिन इस बार अभी तक कोई भी आर्डर उनके पास नहीं आए हैं। इस बार शहर को याद आऐंगें टेकरी के राजा।

जिले की मुर्तिकार बनाते थे दूसरे जिलो को मुर्तिया
रमेश माहौर, नंदू कुशवाह, सुरेश माहौर आदि मूर्तिकारों का कहना है, कि पहले उन्हें गुना, अशोकनगर, चंदेरी, मुंगावली सहित जिले के पोहरी, भटनावर, बैराड़, नरवर, करैरा, पिछोर, कोलारस और बदरवास जैसे स्थानों से ऑर्डर आते थे। वह 10 से 15 फीट तक की प्रतिमाएं बनाते थे। इसके लिए वह जुलाई माह से ही तैयारियों में जुट जाते थे, लेकिन इस बार अभी तक उनके पास एक भी ऑर्डर नहीं आया है। ऐसे में वह हाथ पर हाथ रखे बैठे हैं।

मूर्ति के काम से चलती है, रोजी रोटी
मूर्तिकारों का कहना है कि उनकी रोजी रोटी का साधन मूर्तियां ही हैं। पहले वह दुर्गा और गणेश प्रतिमाएं बनाकर अपने परिवार की गुजर बसर करते हैं। बड़ी मूर्ति 11 हजार से लेकर 50 हजार रुपये तक की बनती हैं, लेकिन इस बार कोई भी ऑर्डर न आने से वह परेशान हैं। मूर्तिकार महेश माहौर का कहना है कि पहले उनके पास से 8 से 10 बड़ी मूर्तियों के आर्डर आ जाते थे। वह अपना काम शुरू कर देते थे, लेकिन इस बार कोरोना के चलते अब वह छोटी मूर्तियां ही बना रहे हैं।

मिट्टी की ट्रॉली भी हुई महंगी, छोटे गणेश भी 100 रुपये से ऊपर
मूर्तिकारों ने बताया कि लॉकडाउन के चलते महंगाई ने भी उनकी कमर तोड़ दी है। पहले जो मिट्टी की ट्रॉली आती थी, उसके दाम भी दोगुने हो गए हैं। ऐसे में उन्हें परेशानी हो रही है, क्योंकि छोटी मिट्टी की मूर्ति के दाम भी उन्हें बढ़ाने पड़ेंगे, क्योंकि मिट्टी के अलावा अन्य सामान भी महंगा हो गया है। बाहर से आने वाला कुछ सामान भी मिल नहीं रहा है। ऐसे में यहां से खरीदने पर उन्हें सामान महंगा मिल रहा है, जिससे मिट्टी की छोटी प्रतिमाओं के भी दाम बढ़ाने पड़ेंगे।

प्रशासन का आदेश पांडालों में नहीं विराजेंगे गणेश
बात यदि शहर की करें तो शहर में ही अकेले 400 से अधिक गणेश पांडाल लगते थे, जहां गणेश प्रतिमाओं को विराजमान किया जाता था। इसके बाद अनंत चौदस पर कस्टम गेट पर कार्यक्रम का आयोजन होता था। चल झांकियां भी निकाली जाती थीं, लेकिन इस बार गणेश पांडाल नहीं सजेंगे और न ही कोई आयोजन होगा। प्रशासन ने कोरोना की रोकथाम के चलते यह निर्णय लिया है कि इस बार पांडालों में गणेश प्रतिमाओं को विराजमान नहीं किया जाएगा और न ही कोई कार्यक्रम आयोजित होगा।

गौरी गणेश कुंड की बजाय घर पर करें विसर्जन
शहर में गणेश प्रतिमाओं को जाधव सागर के समीप बने गौरी गणेश कुंड में विसर्जित किया जाता था, लेकिन इस बार प्रशासन ने निर्देश दिए हैं कि मिट्टी के गणेश घर में विराजमान किए जाएं। गौरी गणेश कुंड की बजाय उन्हें घर पर ही विसर्जित किया जाए। जिससे कुंडों और नदियों पर भीड़ नहीं होगी और कोरोना के संक्रमण से भी बचाव हो सकेगा।

यह बोले मूर्तिकार
कोरोना ने कारोबार पर संकट खड़ा कर दिया है। पहले जुलाई माह में ही आर्डर मिल जाते थे। काम शुरू हो जाता था, लेकिन इस बार एक भी ऑर्डर अब तक नहीं मिला है। ऐसे में छोटे छोटे गणेश प्रतिमाओं का निर्माण कर रहे हैं। बड़े ऑर्डर से ही लाभ होता है। कोरोना ने कारोबार पूरी तरह से चौपट कर दिया है।

नंदू कुशवाह
11 हजार से लेकर 50 हजार तक की मूर्तियां तैयार करते थे, लेकिन कोरोना के चलते एक भी ऑर्डर नहीं आया है। पहले एक एक जन 10 से 15 बड़ी मूर्तियां बेचता था, लेकिन इस बार कारोबार पूरी तरह से ठप हैं और कोई ऑर्डर भी अब तक नहीं मिल रहे हैं।
रमेश माहौर

इस बार चल अचंल झांकिया भी नही लगेंगी। बैंड भी नही बजेंगें शहर में लाईटिंग भी होंगी और कस्टम गेट पर होने वाला प्रोग्राम भी चौपट हैंं। अनंत चौदहस की रात भी सूनी होगी। 50 लाख की मुर्तियो के अतिरिक्त बैंड बाजा और अनंत चौदहस की रात बटने वाला समान मिलाकर 1 करोड का नुकसान होने का अनुमान हैं।