नरेंद्र जैन खनियांधाना। तीर्थोदय तीर्थ गोलाकोट, खनियाधाना में 1 फरवरी 2026, रविवार का दिन स्वर्णिम अक्षरों में लिख गया। माघी पूर्णिमा का यह दिन श्रद्धा और इतिहास के संगम के रूप में हमेशा याद रखा जाएगा, जब पंचकल्याणक प्रतिष्ठा महोत्सव के उपरांत मूलनायक भगवान के प्रथम कलशाभिषेक का सौभाग्य आया और देखते-ही-देखते यह क्षण 251 कलशों तक पहुंच गया, जिसने उपस्थित हर व्यक्ति को अवाक् और भावुक कर दिया।
जैसे ही प्रथम कलशाभिषेक की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, ऐसा प्रतीत हुआ मानो दानदाताओं के हृदय एक साथ धड़क उठे हों, मानो धनकुबेरों के बीच कोई मौन प्रतिस्पर्धा छिड़ गई हो, जहां कोई रुकना नहीं चाहता था, कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था और हर हाथ, हर मन उसी क्षण का हिस्सा बन जाना चाहता था।
इस दृश्य को और भी विलक्षण बना रहा था वह दुर्लभ पल, जब स्वयं गुरुदेव श्री सुधासागर जी महाराज को बोली रोकने का प्रयास करना पड़ा, प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश की घोषणाएं गूंजती रहीं, लेकिन भावनाओं का प्रवाह इतना तीव्र था कि 251 कलश पूरे होने के बाद ही बोली को विराम देना संभव हो सका।
गोलाकोट, जो कभी उपेक्षा और वीरानी के गर्त में पहुंच चुका था, आज गुरुदेव के छूते ही पूरी भव्यता के साथ आकाश की ऊंचाइयों को छूता हुआ दिखाई दे रहा है, मानो इस भूमि ने स्वयं अपने भाग्य को करवट लेते हुए देख लिया हो और श्रद्धा की शक्ति से एक नया रूप धारण कर लिया हो।
यह वही गोलाकोट है, जहां स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ, फिर पंचकल्याणक की बात आई तो सौधर्म ने 1555 कलश की राशि का संकल्प लिया और हर बार ऐसा लगा कि जैसे असंभव शब्द यहां टिक ही नहीं पाता, क्योंकि जब-जब कोई संकल्प सामने आया, वह चुपचाप पूर्णता की ओर बढ़ता चला गया।
जब 100 कमरों के आधुनिक छात्रावास की बात सामने आई, तो अगले ही दिन एक भक्त ने संपूर्ण दायित्व अपने ऊपर ले लिया, जब चौबीसी मंदिरों का प्रसंग उठा, तो एक ही दिन में सभी पुण्यार्जक मिल गए और जब प्रतिमा विराजना की मांग और बढ़ी, तो सहस्त्रकूट जिनालय की घोषणा भी उसी प्रवाह में हो गई।
माघ पूर्णिमा, 1 फरवरी का यह दिन इसलिए भी विशेष बन गया क्योंकि इसी एक दिन में मस्तकाभिषेक संपन्न हुआ, चौबीसी मंदिर का शिलान्यास हुआ, सहस्त्रकूट जिनालय का शिलान्यास हुआ और छात्रावास का शिलान्यास भी हुआ, और यह सब क्षण इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए।
प्रथम कलशाभिषेक का सौभाग्य सतेंद्र जी जैन, राजधानी बेसन परिवार तथा पंचकल्याणक में कुबेर की भूमिका निभाने वाले पीयूष जी, दिल्ली को प्राप्त हुआ, और उस क्षण उपस्थित हर आंख में आभार, हर हृदय में श्रद्धा और हर चेहरे पर एक अनकहा गर्व साफ झलक रहा था।
यह सब किसी एक स्थान की कथा होती तो शायद इतनी गहराई से मन को न छूती, लेकिन यह तो हर उस भूमि की कहानी बनती जा रही है, जहां-जहां गुरुदेव के चरण पड़े हैं, जहां मिट्टी बदलती है, वातावरण बदलता है और लोगों के हृदय किसी अनदेखी खुशी से भर जाते हैं।
मन में बस यही इच्छा जागती है कि जिन-जिन स्थानों को गुरुदेव ने स्पर्श किया है, उस भूमि को मैं भी एक बार छू सकूं, और यदि आपने अभी तक तीर्थोदय तीर्थ गोलाकोट के दर्शन नहीं किए हैं, तो एक बार अवश्य आइए, क्योंकि यहां शांति के साथ साथ जैन होने पर गर्व का अहसास होता है, यहां शब्द नहीं, अनुभूति मिलती है क्योंकि यहां का कण–कण श्रद्धा और आस्था से भरा हुआ है।
जैसे ही प्रथम कलशाभिषेक की प्रक्रिया प्रारंभ हुई, ऐसा प्रतीत हुआ मानो दानदाताओं के हृदय एक साथ धड़क उठे हों, मानो धनकुबेरों के बीच कोई मौन प्रतिस्पर्धा छिड़ गई हो, जहां कोई रुकना नहीं चाहता था, कोई पीछे हटने को तैयार नहीं था और हर हाथ, हर मन उसी क्षण का हिस्सा बन जाना चाहता था।
इस दृश्य को और भी विलक्षण बना रहा था वह दुर्लभ पल, जब स्वयं गुरुदेव श्री सुधासागर जी महाराज को बोली रोकने का प्रयास करना पड़ा, प्रतिष्ठाचार्य बाल ब्रह्मचारी प्रदीप भैया सुयश की घोषणाएं गूंजती रहीं, लेकिन भावनाओं का प्रवाह इतना तीव्र था कि 251 कलश पूरे होने के बाद ही बोली को विराम देना संभव हो सका।
गोलाकोट, जो कभी उपेक्षा और वीरानी के गर्त में पहुंच चुका था, आज गुरुदेव के छूते ही पूरी भव्यता के साथ आकाश की ऊंचाइयों को छूता हुआ दिखाई दे रहा है, मानो इस भूमि ने स्वयं अपने भाग्य को करवट लेते हुए देख लिया हो और श्रद्धा की शक्ति से एक नया रूप धारण कर लिया हो।
यह वही गोलाकोट है, जहां स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ, फिर पंचकल्याणक की बात आई तो सौधर्म ने 1555 कलश की राशि का संकल्प लिया और हर बार ऐसा लगा कि जैसे असंभव शब्द यहां टिक ही नहीं पाता, क्योंकि जब-जब कोई संकल्प सामने आया, वह चुपचाप पूर्णता की ओर बढ़ता चला गया।
जब 100 कमरों के आधुनिक छात्रावास की बात सामने आई, तो अगले ही दिन एक भक्त ने संपूर्ण दायित्व अपने ऊपर ले लिया, जब चौबीसी मंदिरों का प्रसंग उठा, तो एक ही दिन में सभी पुण्यार्जक मिल गए और जब प्रतिमा विराजना की मांग और बढ़ी, तो सहस्त्रकूट जिनालय की घोषणा भी उसी प्रवाह में हो गई।
माघ पूर्णिमा, 1 फरवरी का यह दिन इसलिए भी विशेष बन गया क्योंकि इसी एक दिन में मस्तकाभिषेक संपन्न हुआ, चौबीसी मंदिर का शिलान्यास हुआ, सहस्त्रकूट जिनालय का शिलान्यास हुआ और छात्रावास का शिलान्यास भी हुआ, और यह सब क्षण इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गए।
प्रथम कलशाभिषेक का सौभाग्य सतेंद्र जी जैन, राजधानी बेसन परिवार तथा पंचकल्याणक में कुबेर की भूमिका निभाने वाले पीयूष जी, दिल्ली को प्राप्त हुआ, और उस क्षण उपस्थित हर आंख में आभार, हर हृदय में श्रद्धा और हर चेहरे पर एक अनकहा गर्व साफ झलक रहा था।
यह सब किसी एक स्थान की कथा होती तो शायद इतनी गहराई से मन को न छूती, लेकिन यह तो हर उस भूमि की कहानी बनती जा रही है, जहां-जहां गुरुदेव के चरण पड़े हैं, जहां मिट्टी बदलती है, वातावरण बदलता है और लोगों के हृदय किसी अनदेखी खुशी से भर जाते हैं।
मन में बस यही इच्छा जागती है कि जिन-जिन स्थानों को गुरुदेव ने स्पर्श किया है, उस भूमि को मैं भी एक बार छू सकूं, और यदि आपने अभी तक तीर्थोदय तीर्थ गोलाकोट के दर्शन नहीं किए हैं, तो एक बार अवश्य आइए, क्योंकि यहां शांति के साथ साथ जैन होने पर गर्व का अहसास होता है, यहां शब्द नहीं, अनुभूति मिलती है क्योंकि यहां का कण–कण श्रद्धा और आस्था से भरा हुआ है।