नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के व्यक्तित्व एवं कृतित्व से प्रेरणा लेने की आवश्यकता-अजय गौतम

Bhopal Samachar

शिवपुरी। पूर्व छात्र परिषद विद्याभारती मध्यभारत प्रांत द्वारा सरस्वती विद्यापीठ आवासीय विद्यालय में व्याख्यानमाला कार्यक्रम आयोजित किया गया जिसमें मुख्य अतिथि श्री अजय गौतम अधिवक्ता एवं कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री लोकेंद्र सिंह मेवाड़ा प्राचार्य सरस्वती विद्यापीठ आवासीय विद्यालय शिवपुरी द्वारा की गई।

कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं नेताजी सुभाष चंद्र बोस के चित्र पर माल्यार्पण कर दीप प्रज्ज्वलन के साथ सरस्वती वंदना से हुआ। मंचस्थ अतिथियों का तिलक लगाकर एवं श्रीफल भेंट कर स्वागत विद्यालय के आचार्य श्री नंदकिशोर शर्मा एवं श्री अरविंद सविता ने किया।

इस अवसर पर श्री गौतम ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आज हम सभी यहाँ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस व्याख्यान माला के पावन अवसर पर एकत्रित हुए हैं। यह केवल एक व्याख्यान श्रृंखला नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रभक्ति, त्याग, साहस और  अदम्य संकल्प को स्मरण करने का सशक्त माध्यम है।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महानायक थे, जिन्होंने न केवल स्वतंत्रता का स्वप्न देखा, बल्कि उसे साकार करने का साहस भी दिखाया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि जब लक्ष्य राष्ट्र हो, तो कठिनाइयाँ मार्ग नहीं रोक सकतीं।

नेताजी का वह ओजस्वी उद्घोष, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा
आज भी हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम की ज्वाला प्रज्वलित कर देता है।
उन्होंने आज़ाद हिन्द फ़ौज का गठन कर यह सिद्ध कर दिया कि भारत की स्वतंत्रता केवल याचना से नहीं, बल्कि संगठन, अनुशासन और बलिदान से प्राप्त होगी।

उनका नारा--जय हिन्द
आज भी हमारी सेनाओं, हमारे समारोहों और हमारे मन-मस्तिष्क में गूंजता है। नेताजी केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, वे दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता भी थे। उनका विश्वास था कि स्वतंत्र भारत का भविष्य युवा शक्ति के हाथों में है। वे युवाओं को साहसी, चरित्रवान और राष्ट्र के प्रति समर्पित देखना चाहते थे।

आज की यह व्याख्यानमाला हमें आत्मचिंतन का अवसर देती है
क्या हम नेताजी के विचारों को अपने जीवन में उतार पा रहे हैं?
क्या हमारा परिश्रम राष्ट्रहित में समर्पित है?
क्या हम "पहले राष्ट्र" की भावना के साथ कार्य कर रहे हैं?
नेताजी का जीवन संदेश देता है कि संघर्ष चाहे कितना ही कठिन क्यों न हो, यदि उद्देश्य पवित्र हो तो विजय निश्चित होती है।

आइए, इस अवसर पर हम सभी संकल्प लें कि,
हम राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे
अनुशासन, त्याग और साहस को अपना आभूषण बनाएँगे
और नेताजी के सपनों का सशक्त, आत्मनिर्भर और गौरवशाली भारत निर्माण करेंगे।

इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री लोकेंद्र सिंह मेवाडा ने कहा कि आज हम सभी यहाँ भारतीय सनातन संस्कृति के एक अत्यंत पावन पर्व बसंत पंचमी के अवसर पर एकत्रित हुए हैं। यह दिन केवल ऋतुओं के परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि ज्ञान, विद्या, विवेक और संस्कार के आराध्य स्वरूप मां सरस्वती के प्रकट उत्सव का दिव्य अवसर है।

मां सरस्वती को श्वेत वस्त्रों में, वीणा धारण किए हुए दर्शाया गया है। उनका श्वेत रंग हमें पवित्रता, शांति और सात्विकता का संदेश देता है, और उनकी वीणा यह बताती है कि ज्ञान केवल शब्दों में नहीं, बल्कि जीवन के सुरों में भी समाहित होना चाहिए।

बसंत पंचमी का यह पावन दिन विद्यारंभ संस्कार के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। भारतीय सनातन परंपरा में 16 संस्कार बताए गए हैं, जिनमें विद्यारंभ संस्कार का विशेष महत्व है। यह वह क्षण होता है जब बालक औपचारिक रूप से ज्ञान के पथ पर प्रथम कदम रखता है। यह संस्कार केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त शिक्षा की नींव रखता है।

हमारी संस्कृति कहती है
सा विद्या या विमुक्तये
अर्थात वही विद्या सच्ची है, जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और अधर्म से मुक्त करे। आज के समय में शिक्षा केवल रोजगार का साधन बनकर न रह जाए, बल्कि वह चरित्र निर्माण, राष्ट्र निर्माण और मानव निर्माण का माध्यम बने-यही विद्यारंभ संस्कार का मूल उद्देश्य है।

बसंत ऋतु स्वयं हमें सिखाती है कि जैसे प्रकृति में नवीनता, हरियाली और उल्लास आता है, वैसे ही विद्या से जीवन में विवेक, संवेदनशीलता और सदाचार का विकास होता है। कार्यक्रम का सफल संचालन एवं आभार विद्यालय के वरिष्ठ आचार्य श्री पुरुषोत्तम शर्मा ने किया।