शिवपुरी। आज के कल्चर में 'पासिंग द पार्सल' (Passing the Parcel) एक लोकप्रिय पार्टी गेम है, खासकर बच्चों के जन्मदिन पर, जहां संगीत बजने के दौरान एक लिपटा हुआ पार्सल (उपहार) घेरे में बैठे लोग एक-दूसरे को देते हैं; संगीत बंद होने पर पार्सल जिसके पास होता है,उसको अन्य गेम खेलने वाले लोगों के हिसाब से मनोरंजन जैसा कुछ करना होता है। इस गेम में सबसे मजेदार यह होता है कि पार्सल की एक एक परत भी खोलनी होती है और अंत मे जिसके पास यह पहुंचता है उसका विजेता माना जाता है और उसमें रखी हुई वस्तु उसे इनाम स्वरूप मिल जाती है।
शिवपुरी के शिक्षा विभाग में शिक्षकों को पासिंग द पार्सल बनाया जा रहा है,शिक्षकों को पार्सल बनाने के एवज में अधिकारियों को हर माह गिफ्ट मिल रही है। शिक्षकों के (अटैचमेंट) इस पासिंग द पार्सल के खेल में बच्चों का भविष्य चौपट हो रहा है। यह खेल शिवपुरी जिले के शिक्षा विभाग में सबसे अधिक खेला जा रहा है। इस खेल के कारण स्कूलों में अपने अधिकार से पढ़ने आते बच्चे शिक्षा से दूर हो रहे है।
एक शिक्षक बीमार, दूसरे का अता-पता नहीं
कोलारस ब्लॉक के खरई संकुल स्थित रामनगर प्राथमिक विद्यालय की स्थिति इस व्यवस्था रूपी अटैचमेंट का जीता-जागता उदाहरण बच्चो के भविष्य पर कैसे प्रश्न चिन्ह लगा रही है यहा मिलता है। यहाँ पदस्थ एक शिक्षक गंभीर रूप से पैरालेसिस (लकवा) से पीड़ित हैं, जिसके कारण वे शिक्षण कार्य में असमर्थ हैं। वहीं, स्कूल की दूसरी शिक्षिका को रामनगर से हटाकर बदरवास ब्लॉक के बुढ़ाडोंगर स्कूल में अटैच कर दिया गया है। नतीजा यह है कि रामनगर के बच्चे शिक्षकों के अभाव में भटक रहे हैं।
हैरानी की बात यह है कि उक्त शिक्षिका पिछले तीन साल से बुढ़ाडोंगर में अटैच है, लेकिन यह आदेश किसने दिया, इसका जवाब किसी अधिकारी के पास नहीं है। स्थानीय शिक्षिकाओं को छोड़कर 50 किलोमीटर दूर से आई शिक्षिका को कस्तूरबा गांधी बालिका छात्रावास का वार्डन बना दिया गया, जो नियमों पर सवाल खड़े करता है।
सिर्फ हस्ताक्षर करने आते हैं शिक्षक
सूत्रों के मुताबिक, अटैचमेंट पर चल रहे कई शिक्षक अपनी मूल संस्था में महीने में केवल 10 से 15 दिन हस्ताक्षर करने पहुंचते हैं और वापस अपनी मनचाही जगह चले जाते हैं। यह खेल जिले के सभी आठों ब्लॉकों में चल रहा है। अधिकारियों को इसकी जानकारी होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। डीपीसी दफेदार सिंह तोमर और डीईओ विवेक श्रीवास्तव का कहना है कि उन्होंने ब्लॉक शिक्षा अधिकारी (BEO) अंगद सिंह तोमर से पत्र की जानकारी मांगी है, लेकिन पत्र मिला नहीं। दूसरी ओर, बीईओ रामनिवास जाटव का दावा है कि उनके यहां कोई शिक्षक अटैच ही नहीं है।अब बड़ा सवाल यह है कि जब बीईओ मना कर रहे हैं और डीईओ को पता नहीं है, तो शिक्षिका 3 साल से दूसरे स्कूल में नौकरी कैसे कर रही है?
'सुविधा शुल्क' और मिलीभगत का आरोप
दावा किया गया है कि कस्तूरबा गांधी छात्रावास हो या आदिम जाति कल्याण विभाग के छात्रावास, यहाँ बिना वरिष्ठ अधिकारियों की सहमति और कथित 'सुविधा शुल्क' के बिना किसी की नियुक्ति या अटैचमेंट संभव नहीं है। अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से बचते नजर आ रहे हैं, जबकि फर्जी अटैचमेंट के आधार पर मूल संस्थाओं से शिक्षक नदारद हैं।
जिम्मेदार का बयान
मामले की गंभीरता से जांच कर शिक्षिका को जल्द उनकी मूल संस्था पर भेजा जाएगा।"
दफेदार सिंह तोमर, डीपीसी (जिला परियोजना समन्वयक)
