इरादे इतने मजबूत कि निर्णय लेकर उसे सफल बनाना, समय से आगे की सोच के धनी थे: श्री प्रेम नारायण पाराशर- Shivpuri News

शिवपुरी। समय से आगे की सोच और दूरदर्शिता और अपने जीवन में लगातार एक्सपेरिमेंट करना और लाईफ के साथ रिस्क लेने की अदभुत गुण थे श्री प्रेम नारायण पाराशर में, अपने इन सभी गुणों का सदुपयोग कर अपने जीवन को सार्थक किया वही जिले को एक भव्य शिक्षण संस्थान के रूप में आकार दिया। शासकीय नौकरी को छोड साइकिल पर सामान रख कर गांव जाकर बेचना,आप सोच भी नही सकते।

कोलारस विधानसभा में आने वाले डेहरवाडा गांव में रहने वाले एक पंडित ओकारलाल पराशर और ग्यासोदेवी के यहां इकलौते पुत्र के रूप में 5 सितबंर 1945 को बालक का जन्म हुआ इस बालक का नाम प्रेमनाराण रखा गया,यह परिवार खेती पर ही निर्भर था। बालक प्रेमनारायण ने वैघविसारत का 3 वर्ष अध्ययन किया और आयुर्वेद उस समय ये ग्रेजुएट की डिग्री हुआ करती थी। अपने गांव देहरवाड़ा आ गये और गांव में अपने पिता के साथ खेती का काम शुरू कर दी गांव में इनके पास 100 बीघा खेती थीं उसमें भी खेती में रूचि ले रहे थे।

सेसई मे सुसराल: दो शासकीय नौकरी

15 वर्ष की आयु में सेसई के एक ब्राह्मण परिवार में श्रीमती गीता देवी शर्मा उम्र 12 साल से इनका विवाह संपन्न हुआ, गीता देवी ने अपने घर का संभालते हुए परिवार की पूरी जिम्मेदारी पूर्ण की। प्रेम नारायण सबसे पहले इनको शासकीय सेवा करने का मौका मिला ये मेडिकल ऑफिसर के पद पर श्योपुर में पदस्थ हुए 3 वर्ष कार्य करने के बाद ये अपने गांव में वापस आ गये यही रहकर खेती करने लगे इसके बाद इन्होंने ने कॉपरेटिव बैंक समरानियां राजस्थान में सेक्रेटरी का पद रह कर कार्य किया बच्चों का पालन पोषण भी करना था। तो यह बैंक की नौकरी के साथ डाॅक्टरी भी करते थे।

नौकरी का त्यागपत्र दिया: जीवन का टर्निंग पाइंट

प्रेम नारायण पाराशर के मन में नौकरी छोड व्यापार में कुछ करने का प्लान मन में चल रहा था, इधर बच्चे भी बडे हो रहे थे, उनकी पढ़ाई की चिंता भी होने लगी थी अतः जीवन का हाई रिस्क फैसला लिया गया नौकरी के त्याग करने का। अपनी 18 साल की नौकरी का त्यागपत्र देकर शिवपुरी मुख्यालय आने का फैसला लिया गया।

शिवपुरी में झांसी तिराहे पर किराए के मकान लिया गया और यहां बच्चों की शिक्षा के साथ रोजगार का मन बनाया। कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता इस सिद्धांत पर सबसे पहले हनुमान चौराहे पर चाट का ठेला लगाया, ग्रामीण मेलो और हाठ में पानी की दुकान और गांव में जाकर खेती भी कराते थे, लेकिन इससे मन नहीं भर रहा था, एक साइकिल ली गई और उस पर समान रख गांव गांव जाकर सामान बेचने का कार्य शुरू किया गया। व्यापार में सफलता मिलती चली गई अब शिवपुरी में झांसी तिराहे पर स्वयं का मकान हो गया।

दुकान के नीचे खेती करने के यंत्रों का काम शुरू किया गया जो जिले में नहीं बल्कि आसपास के जिलों में प्रसिद्ध हुआ। खेती के यंत्र बनाने की इस फैक्ट्री में एटेक्टर की ट्राॅलीएसत्ताएहैरो व अन्य उपकरण बनते है आज भी यह शर्मा एग्रो एजेंसी के नाम से प्रसिद्ध हैं। व्यापार में मिली सफलता के बाद, प्रॉपर्टी का काम शुरू हुआ जिसमें अपार सफलता मिली।

दयालुता के अनेक उदाहरण है आदर्श जीवन में

इस व्यापारिक मन में दया के भाव थे, एक बार गाय गुम हो गई, प्रेम नारायण जी अपनी गाय को तलाश करते करते एक घर पहुंची जहां गाय बंधी थी, जिस घर में गाय बंधी थी उसके घर से गौर से देखा तो आकलन निकाला गया कि उस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति खराब थी, मन में भाव आया कि इस गौ माता की मेरे से अधिक इस व्यक्ति को अधिक आवश्यकता है। प्रेम नारायण जी उस गाय को वहीं छोड़ आए।

समाज के लोग व्यापारिक सलाह लेने आते थे, प्रत्येक व्यक्ति को वह उसके हिसाब शहर में व्यापार करने की सलाह देते थे आज तक कोई भी सलाह फैल नही हुई, कुल मिलाकर शहर के फिजा के हिसाब से व्यापार करने की एक अद्भुत कला थी।

केदारनाथ के भक्त, मात्र 15 मिनिट में तैयार

प्रेम नारायण जी जीवन में समय की कीमत करना उनका मूल मंत्र था। 5 मिनट में नहाना 5, मिनट में पूजा और 5 मिनिट में खाना टोटल 15 मिनट में रेडी होकर अपने काम के निकलने का क्रम जीवन भर चला। केदारनाथ के भक्त प्रेम नारायण जी के मन में एक शिक्षण संस्थान खोलने का सपना था और यह सपना पूरा हुआ सन 2004 में गीता पब्लिक स्कूल के रूप में, यह स्कूल का शिवपुरी का ब्रांड स्कूल हैं।

यह हमेशा कहते थे

साधारण जीवन और सकारात्मक विचारो से ओतप्रोत प्रेम नारायण जी हमेशा कहते थे कि अपने से हमेशा नीचे वाले को देखकर चले, और ईश्वर को धन्यवाद हमेशा दे कि प्रभु आपने ही शून्य से शिखर तक पहुंचाया हैं।

रिस्क लेने का साहस

श्री प्रेम नारायण पाराशर की जीवन पर नजर डाली जाए तो रिस्क लेने की अदभुत कला आपको देखने की मिलेगी,जिस शासकीय नौकरी आज भविषय माना जाता हैं। उसे दो बार त्यागपत्र देना,हायर रिस्क ही कहलाऐगा। युवाओं को इस व्यक्तित्व से सीखना चाहिए कि 100 बीघा का मालिक एक साइकिल से गांव गांव जाकर समान बेचता है,इतनी नही चाट का ठेला भी लगाया हैं। कहने का सीधा सा अर्थ है काम में शर्म कैसी रगडें नहीं तो चमकेंगे कैसे यह मूल मंत्र था जीवन में श्री पाराशर जी का,जीवन में जो भी निर्णय लिया उसे सफल बनाया।

उनका चरित्र इतना मजबूत था कि उनकी मौजूदगी लोगों को प्रेरित करने के लिए काफी थी। उन्हें सामाजिक कार्य करने में बहुत खुशी और गर्व महसूस होता था और वे दूसरे लोगों को भी एक जिम्मेदार नागरिक बनने के लिए प्रेरित किया करते थे।

5 अक्टूबर 2010 को वे अपने परमधाम चले गए। उन्होंने जीवन के हर हिस्से को जीया, जिंदगी के प्रत्येक उतार चढ़ाव और अनुभवों का आनंद लिया, जैसा कि उपनिषद में परिलक्षित होता है।

यह है परिवार
इनके पांच बेटे और दो बेटियां थी। बड़ी बेटी श्रीमती रूकमणी बिरथरे पति नरेन्द्र बिरथरे दूसरे बेटे भगवान स्वरूप शर्मा पत्नी अनीता शर्मा लोहे का सारा काम देखते है। तीसरी बेटी श्रीमती नीलम शर्मा पति विनोद शर्मा चौथे बेटे रामस्वरूप शर्मा पत्नी रश्मि शर्मा शिशुकुंज इंटरनेशनल स्कूल गुना के संचालक है। श्री बृजेश कुमार शर्मा पत्नी सीमा शर्मा गीता पब्लिक गुप श्री पवन कुमार शर्मा पत्नी कृष्णा शर्मा डायरेक्टर गीता पब्लिक स्कूल, गिर्राज शर्मा पत्नी रिचा शर्मा डारेक्टर गीता पब्लिक स्कूल।