कर्म योग बना ईश्वर की उपासना,असहाय को देव मानकर की सेवा,आचरण और विचारो की यूनिवर्सिटी थे वैद्य बाबूलाल जी- Shivpuri News

शिवपुरी।
योगेश्वर श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म योग मार्ग से ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग बताया हैं। ऐसे की निष्काम कर्मयोग पथ की उपासना कर,अपने कर्म में असहाय को देव मान सेवा करने वाले स्वः बाबूलाल बैदय थे। उनके आचरण और विचार आज की युवाओं के लिए सफलता के मंत्र की यूनिवर्सिटी से कम नहीं है। एक महाविद्यालय में जितने विषय होते है उससे अधिक बाबूलाल जी के विचार,आचरण और सत्कर्म थे। उनको आत्मसात कर आज के युवा अपना जीवन सफल बना सकते हैं।

आज उनका परिवार उनके इन ही कर्मयोग मार्ग चला और तीसरी पीढ़ी बीमार और निसहाय की सेवा करने का संकल्प लेकर जुटी है। बाबूलाल जी कर्म पथ मार्ग की साधना के कारण ही कोरोना जैसी महामारी में लोगों की 24 घंटे सेवा की और अपने आप को सुरक्षित रखा और जो कोरोना से पीड़ित थे उन्है अपने इलाज से सुरक्षित किया।

आजादी से 27 साल पूर्व शिवपुरी के पास पिपरसमा गांव मे 20 अक्टूबर 1920 को पंडित गोपी लाल जी त्रिवेदी जी के यहां एक बालक का जन्म हुआ, जिसका नाम बाबूलाल रखा गया। पंडित गोपी लाल गांव में पण्डिताई करते है। वे गांव लोगों का इलाज आयुर्वेदिक पद्धति से करते थे। उसके लिए वे जंगल से जाते और जड़ीबूटी लेकर आते फिर लोगों का इलाज करते थे।

बालक बाबूलाल ने बचपन से ही अपने पिता को मरीजों की सेवा करते देखा था, सेवा का यही भाव बालक बाबूलाल को अपने पिता से उत्पन्न हुआ था। बालक बाबूलाल भी अपने पिता के साथ जंगल जाते ओर जड़ी बूटी लेकर आते थे, और पिता के साथ ही जड़ी बूटी से दवा बनाते थे, बालक बाबूलाल ने अपने ही गांव में आठवीं क्लास पास की तो उनकी सरकारी नौकरी पटवारी के रूप में लगी, लेकिन पिता का आदेश था कि नौकरी नहीं करनी बल्कि मानव सेवा पथ पर चलना हैं।

प्रारम्भिक शिक्षा ने दिया आदर्श जीवन

प्रारम्भिक शिक्षा गुरुकुल आश्रम से शिक्षा हासिल की जो शिवपुरी के राजश्री गांव में हुआ करता था। कक्षा 1 से 8वीं तक गुरुकुल में रहकर शिक्षा ली। गुरूकुल आश्रमों में पहले शिक्षा का अलग ही प्रचलन था। अपना काम स्वंय करना खाना बनाना,कपड़े धोना, गुरू की आदेश का पालन करना गुरूजनों की सेवा करना गुरूकुल में शिक्षा के साथ वेदएशास्त्रों की शिक्षा दी जाती थी। बैध जी शास्त्रों की विधा में पारंगत थे। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद अलीगढ़ मुस्लिम महाविघालय से वैधविसात के साथ साहित्यरत्न किया जो पहले के समय में ग्रेजुएशन की डिग्री होती थी।

यहां से बालक बाबूलाल वैद्य जी हो गए

1950 में वे अपने गांव पिपरसमा वापस लौट आये जब इनकी उम्र 20 वर्ष होगी, यहां से बालक बाबूलाल वैदजी हो गए। वैद्य जी ने अपने गांव के लोगों का इलाज करना शुरू कर दिया था। अपने गांव के लोगों का इलाज निःशुल्क करते थे। उनका लोगों के लिए उदारता का भाव सदैव रखते थे। अपने मरीजों के लिए घर से खाना बना कर ले जाते थे।

उनको खाना खिलाते थे। वैध जी का विवाह 20 वर्ष का उम्र में कौशल्या देवी से हो गया जो राजा की मुढैरी की थी। जब कौशल्या देवी का विवाह हुआ उनकी उम्र 17 वर्ष थी। पढ़ी लिखी नहीं थी बावजूद उनका सभा शास्त्रों का ज्ञान था। अपने पति के साथ लोगों सेवा करती थी।

लोगों के इलाज करने की अलग पद्धति थी

वैध बाबूलाल त्रिवेदी लोगों का इलाज आयुर्वेदिक पद्धति से करते थे। इसमें प्रसूति रोग एवं टीबी रोग के मरीजों का रामबाण इलाज करते थे। इनके इलाज करने के तरीके से लोग इतना प्रभावित होते थे। मरीजों की नवज पकड़कर बता देते थे। कि तुमने क्या खाया था। किस वजह से तुम बीमार हुए हो बीमारी का कारण तक बता दिया करते थे।

मरीज भी बडे हैरान हो जाते थे। की वैध जी को कैसे पता चल जाता है। कि हमने क्या खाया था जिससे हम बीमार हुए है। उनकी लोगों के प्रति सहानुभूति प्रेम ही लोगों में उनकी प्रसिद्धि का कारण बनी इलाज के लिए आगरा राजस्थान कोटा बारा समरानिया दूर दूर से लोग पिपरसमा आते थे।

पंडिताई में वैध जी की वाणी फलती थी।

वैध जी पण्डिताई भी करते थे उनकी मधुर वाणी लोगों के लिए फलदायी होती थी। जब भी कोई व्यक्ति अपनी परेशानी लेकर आता था। उसकी समस्या का समाधान निकाल देते थे। और उसके यह भी बोल देते थे। कि तेरे काम कब होगा और कैसे होगा जब किसी का कार्य हो जाता था। तो लोग उनके मिलने आते थे। महाराज अपने जैसे बोला बैसे ही हमारा कार्य हुआ है।

वैध जी के जीवन के मूल्य मंत्र

वैद्य जी पूरे जीवन में सादगी थी,उनका कहना था कि जैसे दवा कोई छोटी और बड़ी नहीं होती जरूरत के समय वह रामबाण होती है ऐसे ही कोई भी व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं होता हैं। उसमें जो गुण है वह महान हैं। वैदजी का जीवन का मूल मंत्र कर्म था वह जीवन भर कर्मयोग पर पथ पर चले,उनके कर्म हमेशा सत्विक होते थे,मानव सेवा को ही देव सेवा माना। दूसरो के लिए कुछ करने की चाह और किसी भी कठिन परिस्थिति में शांत और प्रसन्न चित्त रहना उनको महान बनाता था।

वैदजी कहते थे कि समय से बडा बलवान कोई नही होता है आज बुरा है तो कल अच्छा आएगा हमे हमारा पथ नही छोडना चाहिए। कठिन से कठिन परिस्थिति में भी वैद्य जी ने अपना कर्म नही छोडा,प्रतिदिन पूजा पाठ कर अपने मरीजो को देखना यह उनकी दिनचर्या थी।

वैदजी में एक गुण जो उनकी लोकप्रियता का कारण बना वह किसी की बुराई नही करते थे और न ही किसी की बुराई सुनते थे वह कहते थे जो जैसा करेगा वह वैसा भरेगा,इसलिए आप उसमें अपना समय खर्च न करे। आप मानव धर्म अपनाते रहे। सभी समाज के लोगों का सम्मान करते थे। कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया हर वर्ग के लोगों से वे सहज ही मिलते थे और उनका इलाज भी करते थे। पैसे होते तो ले लिया करते थे। नहीं तो यही बोलते थे कोई बात नहीं जब हो जाए तब दे देना नहीं तो मत देना यही सकारात्मकता उनके जीवन का मूल मंत्र बन गए।

वैद जी ने अपने अंतिम समय तक लोगों की सेवा की 95 साल की उम्र में उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया,उस जीवन की पूरी पूंजी और सत्कर्म उनके परिवार और उनके मिलने वालो ने देखे कि वैदजी की अंतिम यात्रा में 10 हजार से अधिक लोग थे। पिपरसमा और उसके आस पास के 20 गांव में चूल्हा तक नहीं जला। यह भाव यह श्रद्धा और यह सम्मान हर किसी को नसीब नहीं होता हैं। मानव तो क्या पशु पक्षी भी करुण रूदन कर रहा होगा जब वैदजी के सम्मान में 20 गांव के लोगों ने उस दिन अपने चूल्हे से अग्नि का त्याग कर दिया होगा।

वैदजी के यहां चार संताने है। 2 बेटे और 2 बेटियां सबसे बड़ी बेटी रवेती शर्मा पत्नि रामस्वरूप शर्मा दूसरे बेटा बृजकिशोर गौतम खेती का कार्य करते है। इनकी पत्नी मुन्नी गौतम जनपद अध्यक्ष शिवपुरी सन 1999 से 2004 तक रही तीसरी बेटी मनोरमा सडैया शिक्षक हैं और सबसे छोटे बेटे सुखदेव गौतम, डाॅ सुखदेव गौतम शिवपुरी के प्रसिद्ध चिकित्सक के रूप में नाम दर्ज है। अब तीसरी पीढ़ी के रूप में डाॅ दीपक गौतम ओर डाॅ यशदेव गौतम के रूप में अपने दादाजी के कर्म पथ पर मानव सेवा की ओर अग्रसर हैं।

कोरोना काल में जब शहर की सभी डॉक्टरों ने अपने दरवाजे बंद कर लिए थे। इस विपरीत समय में गौतम परिवार ने सुखदेव हॉस्पिटल के दरवाजे खोल रखे थे। अपने आप को बचाते हुए लोगो का बचाने का संकल्प लेकर यह परिवार जुटा रहा। पूर्वजों की आर्शीवाद से स्वयं भी सुरक्षित रहे और लोगों को भी अपने इलाज से कोरोना से जैसे संक्रमण से लागो को भी सुरक्षित किया। अब तीसरी पीढ़ी डाॅ दीपक और डाॅ यशदेव के रूप में अपने पूर्वजों की विरासत मानव सेवा के संकल्प पर चल रही हैं।