माफी मांगना रिश्ते निभाने की काबलियत को दर्शाता है: साध्वी रमणिक कुंवर जी महाराज

शिवपुरी। माफी मांगने से कभी यह साबित नहीं होता कि हम गलत हैं और वह सही है। बल्कि इससे यह सिद्ध होता है कि रिश्ते निभाने की काबलियत हममें ज्यादा है। क्षमा गुण धारण करने वाला व्यक्ति व्यक्तित्व की महानता का परिचायक होता है।

उक्त उदगार प्रसिद्ध जैन साध्वी निमाड सौरभ श्री रमणिक कुंवर जी महाराज साहब ने क्षमावाणी पर्व पर प्रतिक्रमण से पूर्व हजारों जैन श्रृद्धालुओं को ऑनलाईन संबोधित करते हुए व्यक्त किए। इसके बाद क्षमावाणी पर्व पर साध्वी श्री रमणिक कुंवर जी महाराज के सानिध्य में संबत्सरी प्रतिक्रमण संघ के वरिष्ठ स्वाध्यायी श्री जिनेश्वर जैन द्वारा करवाया गया। प्रतिक्रमण में जैन धर्माबलंबी संसार के सभी जीवों से अपने पापों का प्रायश्चित करते हैं और पापों से दूर रहने का संकल्प लेते हैं।

साध्वी रमणिक कुंवर जी ने क्षमा की महिमा पर विशेष रूप से प्रकाश डालते हुए कहा कि क्षमा जैन धर्म की आत्मा है। मन में क्षमा धारण करने से अहंकार का नाश होता है और जीवन मेें विनम्रता आती है। भगवान महावीर स्वामी ने भी फरमाया है कि क्षमा मांगने व देने से जीव को प्रहलाद भाव की प्राप्ति होती है।

प्रहलाद भाव से जीव में मैत्री भाव उत्पन्न होता है। मैत्री भाव से जीव विशुद्धी करके निर्भय होता है। क्षमा एक महायज्ञ है। जब आप किसी को माफ करते हैं तब आप भूत को ही नहीं बदलते बल्कि भविष्य को भी बदल देते हैं। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक जगत में तीन शक्तिशाली संसाधनों को कभी नहीं भूलना चाहिए। यह हैं- प्रेम, प्रार्थना और क्षमा।

साध्वी जी ने कहा कि घृणा करना शैतान का काम है और क्षमा करना मनुष्य का कर्म और प्राकृति है। उससे भी ऊपर प्रेम करना देवत्व है। इंदौर महालक्ष्मी नगर श्री संघ में विराजित निमाड़ सौरभ गुरूवर्या श्री रमणिक कुंवर जी महाराज साहब ने संवत्सरी प्रतिक्रमण करने के पश्चात 84 लाख जीव योनियों से क्षमा याचना करते हुए मनवाणी व्यवहार के द्वारा किसी को भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष से दिल और मन में लगे आघात के लिए क्षमा याचना की।

उन्होंने संदेश देते हुए कहा कि आप भी उदार हृदयी बनकर जैसे हमें माफ करेंगे। वैसे ही उनको भी माफ करें। जिन्होंने आपका आहित किया है, गलत शब्द कहे हैं। मन में उनके प्रति यदि द्वेष और क्रोध की अग्रि जल रही है तो उन्हें माफ कर गुरू वचनों को सार्थक करें। जिससे आप महान बने और आपके कर्म क्षय होकर मोक्ष गति की ओर अग्रसर हो, यही जीवन का चरम लक्ष्य है।