शिवपुरी। अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर आज हम शिवपुरी की उन संघर्षशील महिलाओं की दास्तान बखान कर रहे हैं जो अकेले अपने दम पर न केवल गृहस्थी की गाडी को सफलतापूर्वक खींच रही हैं। बल्कि संसार की प्रतिकूलताओं से बिना किसी गोड फादर और बिना रूतबे के जूझ रही हैं। इसके बाद भी वह न केवल अपना और अपने बच्चों का पेट पाल रही हैं।
बल्कि देखा जाए तो कम पैसों में गरीबों को रोटी खिलाकर एक तरह से समाजसेवा भी कर रही हैं। ये महिलाएं अग्रसेन चौराहे पर चार पहिए के ठेले में सुबह से लेकर देर रात तक रोटी और सब्जी बनाने में व्यस्त रहती हैं और अस्पताल आने वाले लोगों तथ गरीबों के लिए सस्ता और अच्छा भोजन देने में जुटी हुई हैं। ऐसी ही तीन बुजुर्ग महिलाओं की कहानी हम आपकों बताते हैं।
कठिन जिंदगी को संघर्षो के माध्यम से बनाया आसान और सम्मानपूर्ण
रोटी बनाकर अपना परिवार पालने वाली 70 वर्षीय रेखा यादव जिन्होंने अपने जीवन के 70 साल पूर्ण कर लिए हैं। लेकिन आज भी इस वृद्धावस्था में उनका हौंसला और आत्मविश्वास जवानी के 20 वर्ष जैसा दिखाई देता है। उनके पति विवाह के समय से ही बेरोजगार हैं। उनका शरीर अब जबाव दे गया है और वह खटिया पर हैं। उनके दो बेटे जो अब उन्हें सहारा नहीं दे रहे।
लेकिन फिर भी वह अपने पति का हर संभव इलाज कराने और दो वक्त की रोटी के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही हैं। फुटपाथ ही उनका आसरा है, जहां एक ठेले में चूल्हा रखकर वह गरीबों को कम दाम में भरपेट भोजन कराने का काम कर रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्जवला योजना के तहत सिलेंडर वितरित किए। लेकिन रेखा के पास सिलेंडर भरवाने के रूपए न होने के कारण वह चूल्हे पर ही पूरा दिन रोटी बनाती हैं। उन्हें इतना आत्मविश्वास है कि जब तक वह जीवित रहेंगी, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगी। उनका घर नहीं है। लेकिन उन्होंने अपने उस ठेले को ही अपना और अपने पति का आश्रय बना रखा है और वह दोनों पति पत्नी हर मौसम की मार झेलते और फुटपाथ पर ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
नहीं टूटा दो बहनों का संघर्षों से नाता, लेकिन बनी हुई है अभी भी हिम्मत
अग्रसेन चौराहे पर रोटी बनाने का कार्य करने वाली दूसरी महिला मुन्नी बाई पत्नी स्व. हल्के सिंह यादव हैं। जिनके पति का विवाह के 10 साल बाद ही देहांत हो गया। ससुरालीजनों ने पति की मौत के बाद उन्हें घर से भगा दिया। दो बच्चे गोद में लेकर वह अपने गांव से निकलकर शिवपुरी आ गई और उन्होंने 1982 में मेहनत मजदूरी करके एक ठेला खरीदा और उस पर अपना रोजगार शुरू किया। अस्पताल के सामने ठेला रखकर उस पर रोटी और सब्जी बनानी शुरू की।
उनकी सोच थी कि अस्पताल में आने वाले मरीजों के साथ उनके परिवार के लोग आते हैं। जिन्हें खाना खाने के लिए होटलों और ढ़ाबों पर ज्यादा पैसा देना होता है। लेकिन बहुत से लोग इतने सक्षम नहीं होते, इनके लिए कम दाम में स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराना उनका एक मात्र ध्येय था। इस दौरान उन्होंने अपने चार बच्चों को पाला और जिनमें से लडक़ी भी थी, जिसका विवाह भी उन्होंने अपने संघर्ष भरे जीवन के दौरान किया और तीन लडक़ों को भी पाला।
लेकिन शादी के बाद बहुएं आ जाने से वह उनसे झगडऩे लगी और उन्हें घर से निकाल दिया। बहुओं की बदौलत वह फुटपाथ पर आ गईं। लेकिन इसक बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस ठेले को ही उन्होंने अपना आशियाना बना लिया जो लंबे समय से सभी मौसमों की मार झेलते हुए अपना कार्य कर रही हैं। उनकी एक बहन कांताबाई भी हैं।
वह भी अपने बेटों की उपेक्षा का शिकार हुई। पति की मौत के बाद उन्होंने भी संघर्ष से अपना नाता रखा। लोगों की रोटियां बनाकर उन्होंने घर चलाया। लेकिन बेटे बड़े हुए तो उन्हें घर से निकाल दिया। अब वह अपनी बहन मुन्नीबाई के भरोसे है और अब वह दोनों बहने मिलकर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।
एक बहन ठेले पर रोटी बनाती है तो दूसरी बहन शादी ब्याह में जाकर पुडी बेलती है। टमाटर के सीजन के दौरान टमाटर का काम भी कर लेती हैं और जब कोई सीजन नहीं होता तो बहन को आराम करने की कहकर वह स्वयं ही ठेले पर रोटी बनाकर अपना व्यापार कर रही हैं।
बल्कि देखा जाए तो कम पैसों में गरीबों को रोटी खिलाकर एक तरह से समाजसेवा भी कर रही हैं। ये महिलाएं अग्रसेन चौराहे पर चार पहिए के ठेले में सुबह से लेकर देर रात तक रोटी और सब्जी बनाने में व्यस्त रहती हैं और अस्पताल आने वाले लोगों तथ गरीबों के लिए सस्ता और अच्छा भोजन देने में जुटी हुई हैं। ऐसी ही तीन बुजुर्ग महिलाओं की कहानी हम आपकों बताते हैं।
कठिन जिंदगी को संघर्षो के माध्यम से बनाया आसान और सम्मानपूर्ण
रोटी बनाकर अपना परिवार पालने वाली 70 वर्षीय रेखा यादव जिन्होंने अपने जीवन के 70 साल पूर्ण कर लिए हैं। लेकिन आज भी इस वृद्धावस्था में उनका हौंसला और आत्मविश्वास जवानी के 20 वर्ष जैसा दिखाई देता है। उनके पति विवाह के समय से ही बेरोजगार हैं। उनका शरीर अब जबाव दे गया है और वह खटिया पर हैं। उनके दो बेटे जो अब उन्हें सहारा नहीं दे रहे।
लेकिन फिर भी वह अपने पति का हर संभव इलाज कराने और दो वक्त की रोटी के लिए जी तोड़ मेहनत कर रही हैं। फुटपाथ ही उनका आसरा है, जहां एक ठेले में चूल्हा रखकर वह गरीबों को कम दाम में भरपेट भोजन कराने का काम कर रही हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उज्जवला योजना के तहत सिलेंडर वितरित किए। लेकिन रेखा के पास सिलेंडर भरवाने के रूपए न होने के कारण वह चूल्हे पर ही पूरा दिन रोटी बनाती हैं। उन्हें इतना आत्मविश्वास है कि जब तक वह जीवित रहेंगी, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगी। उनका घर नहीं है। लेकिन उन्होंने अपने उस ठेले को ही अपना और अपने पति का आश्रय बना रखा है और वह दोनों पति पत्नी हर मौसम की मार झेलते और फुटपाथ पर ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
नहीं टूटा दो बहनों का संघर्षों से नाता, लेकिन बनी हुई है अभी भी हिम्मत
अग्रसेन चौराहे पर रोटी बनाने का कार्य करने वाली दूसरी महिला मुन्नी बाई पत्नी स्व. हल्के सिंह यादव हैं। जिनके पति का विवाह के 10 साल बाद ही देहांत हो गया। ससुरालीजनों ने पति की मौत के बाद उन्हें घर से भगा दिया। दो बच्चे गोद में लेकर वह अपने गांव से निकलकर शिवपुरी आ गई और उन्होंने 1982 में मेहनत मजदूरी करके एक ठेला खरीदा और उस पर अपना रोजगार शुरू किया। अस्पताल के सामने ठेला रखकर उस पर रोटी और सब्जी बनानी शुरू की।
उनकी सोच थी कि अस्पताल में आने वाले मरीजों के साथ उनके परिवार के लोग आते हैं। जिन्हें खाना खाने के लिए होटलों और ढ़ाबों पर ज्यादा पैसा देना होता है। लेकिन बहुत से लोग इतने सक्षम नहीं होते, इनके लिए कम दाम में स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराना उनका एक मात्र ध्येय था। इस दौरान उन्होंने अपने चार बच्चों को पाला और जिनमें से लडक़ी भी थी, जिसका विवाह भी उन्होंने अपने संघर्ष भरे जीवन के दौरान किया और तीन लडक़ों को भी पाला।
लेकिन शादी के बाद बहुएं आ जाने से वह उनसे झगडऩे लगी और उन्हें घर से निकाल दिया। बहुओं की बदौलत वह फुटपाथ पर आ गईं। लेकिन इसक बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और उस ठेले को ही उन्होंने अपना आशियाना बना लिया जो लंबे समय से सभी मौसमों की मार झेलते हुए अपना कार्य कर रही हैं। उनकी एक बहन कांताबाई भी हैं।
वह भी अपने बेटों की उपेक्षा का शिकार हुई। पति की मौत के बाद उन्होंने भी संघर्ष से अपना नाता रखा। लोगों की रोटियां बनाकर उन्होंने घर चलाया। लेकिन बेटे बड़े हुए तो उन्हें घर से निकाल दिया। अब वह अपनी बहन मुन्नीबाई के भरोसे है और अब वह दोनों बहने मिलकर अपना जीवन व्यतीत कर रही हैं।
एक बहन ठेले पर रोटी बनाती है तो दूसरी बहन शादी ब्याह में जाकर पुडी बेलती है। टमाटर के सीजन के दौरान टमाटर का काम भी कर लेती हैं और जब कोई सीजन नहीं होता तो बहन को आराम करने की कहकर वह स्वयं ही ठेले पर रोटी बनाकर अपना व्यापार कर रही हैं।

