खाडेंवाव रासो: राजा नरवर के किले से निर्वार्सित होकर पुरानी शिवपुरी स्थित हवेलीनुमा किले से अपना राजकाज चला रहे थे

Lalit mudgal@shivpuri। बालक खाडेराव इस राजपुरूष के साथ चलने लगा कि आज बाबा इस अतिथि से मिकलकर बहुत प्रसन्न होगें,लेकिन खाडेराव यह नही जनता था कि उसके साथ नरवर के राजा अनुपसिंह उसके साथ चल रहे थे। राजा अनूप सिह नरवर के कछवाहा वंश के राजा थे कछवाहा वंश के शोर्य की गाथाओ से भारत का इतिहास भरा हुआ हैंं।

इस वंश के राजाओ ने आधे भारत में राज्य किया था ओर अनेको भव्य ईमारतो का निर्माण इस वंश के राजाओ ने कराया था। इसमे कनकमण का रथमंदिर प्रमुख निर्माण हैं,लेकिन इस समय नरवर के राजा अनुप सिंह मुगल बादशाह औरंगजेब की अधीनता में राजकाज चलाते थे,लेकिन नरवर के दुर्ग पर उनका अधिपत्य नही था।

मुगलो का एक फौजदार नरवर के विशाल दुर्ग पर काबिज था। नरवर का किला कितना पुराना हैं,किसी के पास कोई भी ठोस अभिलेख नही हैं,लेकिन नरवर का किला अपने इतिहास में अनेंक किदवंतियो को समेटे है। वर्तमान मुख्यालय जिला शिवपुरी से 40 किमी दूर स्थित एक उंचे पठार पर बना हुआ बहुत विशाल हैं। इसकी विशालता की कहानी इसकी सीमाए कहती हैं।

इस दुर्ग की पौरिणिक प्रसिद्धि् भी कम नही है। राजा नल की लोक कथाए,रानी दमयंती का सौदंर्य ओर राजस्थान की प्रसिद्ध् ढोला—मारू की अमर प्रेम कथा इस दुर्ग से आकर जुड जाती है,नटनी का सूत के धागे पर चलना ऐसी कई कथाए इस नरवर के दुर्ग का आंचल अपने में समेटे हुए है।राजा नल के शासन को लेकर यह दुर्ग गुढ रहस्यो का भंडार है,यादि राजा नल के अस्तिव को ईसा से 1500 वर्ष का माना जाए,तो नरवर दुर्ग कम से कम 3500 वर्ष पुराना हैं।

बालक खाडेराय व राजा अनूपसिंह के मिलने के समय यह दुर्ग मुगल सत्ता के अधीन था। इस पर मुगल सत्ता के फौजदार नियुक्ति था। राजा अनुप सिंह शिवुपरी में रह रहे थे। वे पुरानी शिवपुरी में स्थित एक हवेली नुमा किले में रहते थे और अपना राजकाज चलाते थे। यह हवेली आपने भी देखी होगी। शासन ने पिछले 10 वर्ष पूर्व जमीदौज कर दिया था। शिवुपरी और पुरानी शिवपुरी के लोग इसे पुरानी तहसील के नाम से जानते थे।

जैसे ही बालक खाडेराय राजा अनूपसिंह को लेकर ग्राम भटनावर की सीमा में पहुंचे,साथ में चल रहे बालको ने दौड कर ग्रामवासियो का यह समाचार दिया कि एक राजजी पुरूष जिसके पास एक विशाल अश्व हैं ओर वह अस्त्र—शस्त्रो से सुशोभित हैं वह आज हमारे मित्र खाडेराव का अतिथि  बनकर आया हैं। कौतुहल वश ग्रामीण उसे देखने आ गए।

राजा अपने घोडे की लगाम हाथ में थामे बालक खाडेराव के पीछे चल रहा था और उसे बालक के पीछे चलते हुए बडा ही संतोष हो रहा था। ग्रामीणो ने राजा को किसी ने नही पहचाना,किन्तु राजा का मुखमण्डल की भव्यता,उसकी शरीर की बनाबट,हथियार और चलने का राजशाही अंदाज यह चीख—चीख कर कह रहा था कि यह व्यक्ति कोई साधारण नही हैं। सब ग्रामीण उसे झुक—झुक कर प्रणाम कर रहे थे,राजा भी बडी ही शालीनता से उनके प्रणाम का उत्तर दे रहे थे।

बालक खाडेराव का घर भटनावर ग्राम की उत्तर दिशा में मौजूद था। 3 झोपडियो का एक साधारण सा घर,घर के बहार गायो को बांधने के बाडे थे। और घर के बहार छोटे—छोटे चबूतर बने हुए थे। बालक खाडेराव के साथ राजा उसके घर पहुंचे थे,जैसे ही बालक दौडकर अंदर गया और बोला देखो आज हमारे घर कौन आया हैं,वे बहार आए और देखा की एक विशाल अश्व के साथ हथियारो से सोभित एक पुरूष खडा है।

उसके चेहरे पर तेज हैं।छाती चौडी और लंबी भुजाए हैं। चेहरे पर नुकिले मुछे,लम्बे केश है। बालक के पिता जैसे ही घर से बहार आए तो अश्वारोही ने चरणो में झुककर प्रणाम किया। पंडित जी ने दोनो भुजाओ को पकड चिरंजीवी कहते उसे झोपडी के द्धवार तक ले आए इतने में बालक खाडेराय ने एक बिछोना घर के आंगन के बने चबूतरे पर बिछा दिया। पंडित जी ने उसे आसन पर बैठने का निवेदन किया। और स्वंय भी अतिथि के पास बैठ गए। बालक खाडेराव अश्व की लगाम पकडकर बाडे में ले आए और उसे एक खूंटे पर बांध दिया।

पंडित जी एक तेजस्वी और भव्य पुरूष के आचानक घर आगमन से अचंभित थे। पंडित जी ने चुप्पी को तोडते हुए कहा कि मेरा नाम पंडित वृंदावन उपमन्यु हैं,ओर यह मेरा पुत्र खाडेराव है और यह बडा ही चंचल हैं। आपसे इसने कोई अविनय तो नही किया। राजा ने कहा कि नही पंडित जी अपका यह पुरूष तो बडा ही होनहार हैं,आप धन्य है कि ऐसा तेजस्वी और गुणवान पुत्र आपको मिला। अनूपसिंह ने कहा।

राजा ने अपना परिचय छुपा लिया कि अचानक से अपना परिचय दुंगा तो पंडित जी मेरा अत्थिय को लेकर मुशिकल में पड सकते है। एक समान्यता में ही आज इनके घर का मेहमान ही बना रहना ठीक हैं। ग्राम भटनावर में सांझ हो चुकी थी गाय भी अपने घर लौट चुकी थी,गाय लौटकर अपने बछडेा को दुलार रही थी।


पंडित जी की भी चार गाय थी वे भी अपने घर को लौट आर्ई थी। राजा अनूपसिंह को जलपात्र  दिया गया। उन्होन अपने हाथ पैर धोए व शरबत पिया। राजा ओर पंडित जी भटनावर गांव की आर्थिक और भूगौलिक स्थिती पर चर्चा करने लगे। खाडेराव और उसकी मां गायो को दोहने मे लग गई। राजा पंडित जी से बाते तो कर रहे थे लेकिन उनकी नजर खाडेराव पर ही थी।

उन्होने देखा कि एक गाय का बछडा दूसरी गाय के थानो से दूध पीने का प्रयास किया तो गाय ने क्रोधबश उसे मारने के लिए अपने नुकिलो सींगो से उस पर बार किया तो खांडेराव ने बडी ही चपलता से उसके सींग को पकडकर उसका मुख दुसरी और कर दिया और दुसरे हाथ से बछडे की गले में बंधी रस्सी को पकडकर उसे हटा लिया यह घटना केवल राजा ने देखी कि एक ही समय में बालक के दोनो हाथ अपने लक्ष्य की ओर चले,और स्थिती को संभाल लिया। राजा ने देखा बालक सर्वगुण सम्पन्न है और बलशाली है,अगर मौका लगा तो इनके माता—पिता की सहमति से इसे में अपने साथ लेकर चलूंगा।

बातो ही बातो में राजा ने पंडित जी से पूछा कि खाडेराव की शिक्षा की क्या व्यवस्था है तो उन्होने कहा कि यहा कोई व्यवस्था नही है मै ही उसे थोडा बहुत ज्ञान करा रहा हू,रात हुई राजा को पंडित जी ने अपने समर्थ अनुसार भोजन व्यवस्था की। सुबह जब भोर हुई तो सुर्य रात्रि विश्राम कर पुन: जग को प्रकाशमान करने अपने काम पर लग गए।  


राजा सुबह नहाधोकर पूजा अर्चना जलपान कर अपने अश्व की काठी बांधकर पंडित जी से जाने की विदा मांगी। पंडित जी ने कहा कि श्रीमान आपने अपना परिचय नही दिया। राजा ने कहा कि मै नरवर का राजा अनुपसिंह हॅू,यह सून पंडित जी जड हो गए उन्है अपने कानो पर विश्वास नही हुआ कि धन्य भाग्य हमारे कि हमारे राजा ने मेरे गरीब ब्रहाम्ण का अतिथ्यि स्वीकार किया। मेरा घर आज पवित्र हो गया।

पंडित जी अपने विचारो में मग्न थे। तभी राजा ने कहा कि पंडित जी में तो आपके आर्शीवाद का आकांक्षी हूं। किन्तु मौखिक आर्शीवाद नही चाहता। पंडित जी कहा कि राजा प्रजा तुल्य होता है आप मुझे आर्शीवाद दिजिए कि मुझे क्या करना हैं। राजा अनुपसिंह हसे और बोले की मै तुम्हारे पुत्र को आर्शीवाद स्वरूप मांग रहा हू।यह इतना होनहार और दिव्य है अगर इसकी शिक्षा और शस्त्र शिक्षा की व्यवस्था नही कर सका तो मुझे लगेगा कि मेरा राजा होना व्यर्थ हैंं।