ललित मुदगल एक्सरे @शिवपुरी। शिवपुरी नगर पालिका में इन दिनों कैशबुक कांड के साथ-साथ अब एक और बड़ा प्रशासनिक विस्फोट सामने आया है। नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा और उनके पति संजय शर्मा पर अब केवल दखलअंदाजी ही नहीं, बल्कि शहर के विकास कार्यों और जरूरी शासकीय फाइलों को घर पर रोककर रखने के गंभीर आरोप भी खुलकर सामने आ गए हैं।
इस पूरे मामले में अब नगर पालिका का एक सरकारी पत्र सामने आया है, जिसने नगर पालिका के भीतर चल रहे कथित फाइल बंदी तंत्र की तस्वीर साफ कर दी है। नगर पालिका कार्यालय शिवपुरी से जारी पत्र क्रमांक न.पा.प./1706/2026, दिनांक 2 अप्रैल 2026, जो मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) इशांक धाकड़ द्वारा लिखा गया है, उसमें साफ शब्दों में उल्लेख किया गया है कि महत्वपूर्ण शासकीय नस्तियां, विकास कार्यों की फाइलें, नामांतरण प्रकरण और अनुमोदन से जुड़ी फाइलें अध्यक्ष के निवास पर पड़ी हुई हैं, और वह भी बिना किसी पावती के।
कैशबुक जबरिया ले जाने के आरोप के बाद खुला नया अध्याय
नगर पालिका में यह विवाद उस समय और भड़क गया जब प्रभारी लेखापाल रविकांत झा ने आरोप लगाया कि नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा और उनके पति संजय शर्मा कैशबुक जबरिया अपने साथ ले गए। इस मामले में लेखापाल ने सीएमओ को लिखित आवेदन देकर शिकायत की है।
यहीं से यह पूरा मामला और गंभीर हो गया, क्योंकि अब यह सवाल उठने लगा कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या मंशा थी कि नगर पालिका का वित्तीय रिकॉर्ड और सरकारी फाइलें कार्यालय के बजाय घर पर ले जाई जा रही थीं ?
हालांकि इस पूरे मामले में नगर पालिका अध्यक्ष का अपना मौखिक पक्ष सामने बताया जा रहा है, लेकिन अभी तक कोई ठोस लिखित स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। इसके उलट, अब जो सरकारी पत्र सामने आया है, वह इस पूरे घटनाक्रम को एक सिस्टमेटिक अध्यक्ष की मनमानी को अपने शब्दों में बताता है।
सरकारी पत्र ने खोली परतें, फाइलें आपके घर पर हैं
शिवपुरी समाचार तक पहुंचे नगर पालिका के आधिकारिक पत्र में CMO ने अध्यक्ष को सीधे संबोधित करते हुए कई गंभीर बातें लिखी हैं। पत्र में साफ कहा गया है कि विभिन्न नामांतरण प्रकरण और निविदाओं में प्राप्त दरों का अनुमोदन नहीं हो पाने के कारण जरूरी विकास कार्य अटके पड़े हैं।
यानी शहर में जिन सड़कों, मरम्मत कार्यों, वाहन व्यवस्था और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर काम होना था, उनकी फाइलें अनुमोदन के नाम पर अटकाई गईं, और इसका सीधा असर जनता के काम और विकास कार्यों पर पड़ा। पत्र में यह भी उल्लेख है कि ठेकेदार कार्यादेश न मिलने के कारण काम शुरू नहीं कर पा रहे, जिससे न केवल योजनाएं लटकीं, बल्कि संबंधित वार्डों के पार्षदों में भी नाराजगी बढ़ी। सीधा मतलब यह है कि शहर का विकास कागजों में मंजूर हुआ, लेकिन फाइलों की कैद में जमीन पर नहीं उतर सका।
CMO ने लिखा: 10 से ज्यादा महत्वपूर्ण नस्तियां बिना पावती अध्यक्ष के घर पर
महोदय, प्रभारी लेखापाल श्री रविकांत झा द्वारा अवगत कराया गया है कि आपके द्वारा हस्ताक्षरार्थ एवं अनुमोदनार्थ हेतु समस्त नस्तियाँ आपके निवास पर ही मंगाई जाती है और इस बाबत पावती भी नहीं दी जाती है। ऐसी स्थिति में नस्तियों के गुम हो जाने एवं रिकॉर्ड संधारण में समस्या उत्पन्न होने की संभावना निर्मित हो जाती है। वर्तमान में भी 10 से भी अधिक महत्वपूर्ण नस्तियाँ आपके निवास पर बिना पावती दिये रखी गई हैं..."
यह सिर्फ एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर सवाल है। क्योंकि यदि महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड, फाइलें और निर्णय संबंधी दस्तावेज कार्यालय के बाहर, वह भी बिना आधिकारिक रसीद या एंट्री के रखे जा रहे हैं, तो यह केवल प्रक्रियागत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा प्रहार माना जाएगा।
क्या नगर पालिका कार्यालय 'शोपीस' बन गया है?
सरकारी पत्र से जो तस्वीर सामने आती है, वह और भी चौंकाने वाली है। पत्र में CMO ने यह भी लिखा है कि अध्यक्ष के हस्ताक्षर और अनुमोदन के लिए कर्मचारियों को बार-बार उनके निवास पर बुलाया जाता है। इसका मतलब साफ है कि नगर पालिका कार्यालय में बैठकर शासकीय कार्य करने के बजाय, सरकारी प्रक्रिया को निजी परिसर से संचालित किया जा रहा था। यानी जनता के काम के लिए बनी व्यवस्था को व्यक्तिगत सुविधा और निजी नियंत्रण के दायरे में खींचा जा रहा था। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक मर्यादा पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी पूछती है कि अगर फाइलें, रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया घर से चलेगी, तो कार्यालय की भूमिका क्या रह जाएगी?
पति और पुत्र के दखल पर भी सरकारी पत्र में गंभीर टिप्पणी
मामला सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं है। CMO ने अपने पत्र में नगर पालिका अध्यक्ष के पति संजय शर्मा और पुत्र रजत शर्मा की भूमिका पर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की है। पत्र में उल्लेख है-कि आपके पति श्री संजय शर्मा एवं आपके पुत्र श्री रजत शर्मा नगर पालिका के कार्यों में न केवल दखल देते हैं बल्कि कर्मचारियों से अभद्र व्यवहार भी करते हैं। जिसकी शिकायत कई बार कर्मचारियों ने मेरे समक्ष भी की है।
शासकीय काम कार्यालय में बैठकर करें,CMO की सीधी नसीहत
नगर पालिका अध्यक्ष के तौर पर आपकी जिम्मेदारी यह भी है कि आप स्वयं अधिक से अधिक समय नगर पालिका कार्यालय में ही बैठकर शासकीय नस्तियों से संबंधित कार्य संपादित करें। यह पत्र यह दर्शाता है कि नगर पालिका के भीतर हालात इस स्तर तक पहुंच चुके थे कि CMO को अध्यक्ष को यह याद दिलाना पड़ा कि शासकीय कार्य घर से नहीं, कार्यालय से होते हैं।
तीन महीने से फंसी विकास की फाइलें, शहर भुगत रहा कीमत
सूत्रों के अनुसार, शहर के विकास, जनता की मूलभूत सुविधाओं और नामांतरण जैसे महत्वपूर्ण प्रकरणों की फाइलें पिछले करीब तीन माह से लंबित पड़ी हुई हैं। इनमें वे प्रस्ताव भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो PIC में स्वीकृत हो चुके थे, लेकिन अंतिम अनुमोदन के अभाव में जमीन पर नहीं उतर पाए। इसका सीधा असर सड़क निर्माण, वाहन मरम्मत, स्थानीय विकास कार्यों और नागरिक सेवाओं पर पड़ा है। यानी जो जनता टैक्स देती है, वही जनता अब फाइलों की देरी, अनुमोदन की राजनीति और प्रशासनिक जाम की कीमत चुका रही है।
पसंदीदा फाइलें आगे, बाकी लटकती रहीं
नगर पालिका के गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कुछ चुनिंदा फाइलों को प्राथमिकता मिलती रही, जबकि बाकी काम महीनों तक अटके रहे। हालांकि यह आरोप आधिकारिक रूप से सिद्ध नहीं हैं, लेकिन सामने आए पत्र और मौजूदा हालात ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। यदि किसी फाइल का भाग्य नियम, प्राथमिकता और आवश्यकता से नहीं, बल्कि पसंद और पहचान' से तय हो, तो यह पूरे शहर के विकास के लिए खतरा है।
5 लाख तक के भुगतान पर टकराव, कैशबुक कांड की जड़ में क्या है?
नगर पालिका सूत्रों की मानें तो इस पूरे विवाद के पीछे 5 लाख रुपए तक के भुगतान की प्रक्रिया भी एक बड़ा कारण बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि CMO को नियमानुसार 5 लाख रुपए तक के भुगतान पर हस्ताक्षर का अधिकार प्राप्त है। लेकिन चर्चा यह है कि इन भुगतानों पर भी अध्यक्षीय नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी, और इसी खींचतान ने आगे चलकर कैशबुक विवाद को जन्म दिया। यदि यह बात सही साबित होती है, तो मामला सिर्फ फाइलों के घर पर होने का नहीं, बल्कि वित्तीय नियंत्रण और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र की लड़ाई का भी हो सकता है।
इस पूरे मामले में अब नगर पालिका का एक सरकारी पत्र सामने आया है, जिसने नगर पालिका के भीतर चल रहे कथित फाइल बंदी तंत्र की तस्वीर साफ कर दी है। नगर पालिका कार्यालय शिवपुरी से जारी पत्र क्रमांक न.पा.प./1706/2026, दिनांक 2 अप्रैल 2026, जो मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO) इशांक धाकड़ द्वारा लिखा गया है, उसमें साफ शब्दों में उल्लेख किया गया है कि महत्वपूर्ण शासकीय नस्तियां, विकास कार्यों की फाइलें, नामांतरण प्रकरण और अनुमोदन से जुड़ी फाइलें अध्यक्ष के निवास पर पड़ी हुई हैं, और वह भी बिना किसी पावती के।
कैशबुक जबरिया ले जाने के आरोप के बाद खुला नया अध्याय
नगर पालिका में यह विवाद उस समय और भड़क गया जब प्रभारी लेखापाल रविकांत झा ने आरोप लगाया कि नगर पालिका अध्यक्ष गायत्री शर्मा और उनके पति संजय शर्मा कैशबुक जबरिया अपने साथ ले गए। इस मामले में लेखापाल ने सीएमओ को लिखित आवेदन देकर शिकायत की है।
यहीं से यह पूरा मामला और गंभीर हो गया, क्योंकि अब यह सवाल उठने लगा कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी या मंशा थी कि नगर पालिका का वित्तीय रिकॉर्ड और सरकारी फाइलें कार्यालय के बजाय घर पर ले जाई जा रही थीं ?
हालांकि इस पूरे मामले में नगर पालिका अध्यक्ष का अपना मौखिक पक्ष सामने बताया जा रहा है, लेकिन अभी तक कोई ठोस लिखित स्पष्टीकरण सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। इसके उलट, अब जो सरकारी पत्र सामने आया है, वह इस पूरे घटनाक्रम को एक सिस्टमेटिक अध्यक्ष की मनमानी को अपने शब्दों में बताता है।
सरकारी पत्र ने खोली परतें, फाइलें आपके घर पर हैं
शिवपुरी समाचार तक पहुंचे नगर पालिका के आधिकारिक पत्र में CMO ने अध्यक्ष को सीधे संबोधित करते हुए कई गंभीर बातें लिखी हैं। पत्र में साफ कहा गया है कि विभिन्न नामांतरण प्रकरण और निविदाओं में प्राप्त दरों का अनुमोदन नहीं हो पाने के कारण जरूरी विकास कार्य अटके पड़े हैं।
यानी शहर में जिन सड़कों, मरम्मत कार्यों, वाहन व्यवस्था और अन्य मूलभूत सुविधाओं पर काम होना था, उनकी फाइलें अनुमोदन के नाम पर अटकाई गईं, और इसका सीधा असर जनता के काम और विकास कार्यों पर पड़ा। पत्र में यह भी उल्लेख है कि ठेकेदार कार्यादेश न मिलने के कारण काम शुरू नहीं कर पा रहे, जिससे न केवल योजनाएं लटकीं, बल्कि संबंधित वार्डों के पार्षदों में भी नाराजगी बढ़ी। सीधा मतलब यह है कि शहर का विकास कागजों में मंजूर हुआ, लेकिन फाइलों की कैद में जमीन पर नहीं उतर सका।
CMO ने लिखा: 10 से ज्यादा महत्वपूर्ण नस्तियां बिना पावती अध्यक्ष के घर पर
महोदय, प्रभारी लेखापाल श्री रविकांत झा द्वारा अवगत कराया गया है कि आपके द्वारा हस्ताक्षरार्थ एवं अनुमोदनार्थ हेतु समस्त नस्तियाँ आपके निवास पर ही मंगाई जाती है और इस बाबत पावती भी नहीं दी जाती है। ऐसी स्थिति में नस्तियों के गुम हो जाने एवं रिकॉर्ड संधारण में समस्या उत्पन्न होने की संभावना निर्मित हो जाती है। वर्तमान में भी 10 से भी अधिक महत्वपूर्ण नस्तियाँ आपके निवास पर बिना पावती दिये रखी गई हैं..."
यह सिर्फ एक प्रशासनिक टिप्पणी नहीं, बल्कि नगर पालिका की कार्यप्रणाली पर बेहद गंभीर सवाल है। क्योंकि यदि महत्वपूर्ण सरकारी रिकॉर्ड, फाइलें और निर्णय संबंधी दस्तावेज कार्यालय के बाहर, वह भी बिना आधिकारिक रसीद या एंट्री के रखे जा रहे हैं, तो यह केवल प्रक्रियागत त्रुटि नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही पर सीधा प्रहार माना जाएगा।
क्या नगर पालिका कार्यालय 'शोपीस' बन गया है?
सरकारी पत्र से जो तस्वीर सामने आती है, वह और भी चौंकाने वाली है। पत्र में CMO ने यह भी लिखा है कि अध्यक्ष के हस्ताक्षर और अनुमोदन के लिए कर्मचारियों को बार-बार उनके निवास पर बुलाया जाता है। इसका मतलब साफ है कि नगर पालिका कार्यालय में बैठकर शासकीय कार्य करने के बजाय, सरकारी प्रक्रिया को निजी परिसर से संचालित किया जा रहा था। यानी जनता के काम के लिए बनी व्यवस्था को व्यक्तिगत सुविधा और निजी नियंत्रण के दायरे में खींचा जा रहा था। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक मर्यादा पर सवाल खड़े करती है, बल्कि यह भी पूछती है कि अगर फाइलें, रिकॉर्ड और भुगतान प्रक्रिया घर से चलेगी, तो कार्यालय की भूमिका क्या रह जाएगी?
पति और पुत्र के दखल पर भी सरकारी पत्र में गंभीर टिप्पणी
मामला सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं है। CMO ने अपने पत्र में नगर पालिका अध्यक्ष के पति संजय शर्मा और पुत्र रजत शर्मा की भूमिका पर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की है। पत्र में उल्लेख है-कि आपके पति श्री संजय शर्मा एवं आपके पुत्र श्री रजत शर्मा नगर पालिका के कार्यों में न केवल दखल देते हैं बल्कि कर्मचारियों से अभद्र व्यवहार भी करते हैं। जिसकी शिकायत कई बार कर्मचारियों ने मेरे समक्ष भी की है।
शासकीय काम कार्यालय में बैठकर करें,CMO की सीधी नसीहत
नगर पालिका अध्यक्ष के तौर पर आपकी जिम्मेदारी यह भी है कि आप स्वयं अधिक से अधिक समय नगर पालिका कार्यालय में ही बैठकर शासकीय नस्तियों से संबंधित कार्य संपादित करें। यह पत्र यह दर्शाता है कि नगर पालिका के भीतर हालात इस स्तर तक पहुंच चुके थे कि CMO को अध्यक्ष को यह याद दिलाना पड़ा कि शासकीय कार्य घर से नहीं, कार्यालय से होते हैं।
तीन महीने से फंसी विकास की फाइलें, शहर भुगत रहा कीमत
सूत्रों के अनुसार, शहर के विकास, जनता की मूलभूत सुविधाओं और नामांतरण जैसे महत्वपूर्ण प्रकरणों की फाइलें पिछले करीब तीन माह से लंबित पड़ी हुई हैं। इनमें वे प्रस्ताव भी शामिल बताए जा रहे हैं, जो PIC में स्वीकृत हो चुके थे, लेकिन अंतिम अनुमोदन के अभाव में जमीन पर नहीं उतर पाए। इसका सीधा असर सड़क निर्माण, वाहन मरम्मत, स्थानीय विकास कार्यों और नागरिक सेवाओं पर पड़ा है। यानी जो जनता टैक्स देती है, वही जनता अब फाइलों की देरी, अनुमोदन की राजनीति और प्रशासनिक जाम की कीमत चुका रही है।
पसंदीदा फाइलें आगे, बाकी लटकती रहीं
नगर पालिका के गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि कुछ चुनिंदा फाइलों को प्राथमिकता मिलती रही, जबकि बाकी काम महीनों तक अटके रहे। हालांकि यह आरोप आधिकारिक रूप से सिद्ध नहीं हैं, लेकिन सामने आए पत्र और मौजूदा हालात ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है। यदि किसी फाइल का भाग्य नियम, प्राथमिकता और आवश्यकता से नहीं, बल्कि पसंद और पहचान' से तय हो, तो यह पूरे शहर के विकास के लिए खतरा है।
5 लाख तक के भुगतान पर टकराव, कैशबुक कांड की जड़ में क्या है?
नगर पालिका सूत्रों की मानें तो इस पूरे विवाद के पीछे 5 लाख रुपए तक के भुगतान की प्रक्रिया भी एक बड़ा कारण बताई जा रही है। बताया जा रहा है कि CMO को नियमानुसार 5 लाख रुपए तक के भुगतान पर हस्ताक्षर का अधिकार प्राप्त है। लेकिन चर्चा यह है कि इन भुगतानों पर भी अध्यक्षीय नियंत्रण बनाए रखने की कोशिश की जा रही थी, और इसी खींचतान ने आगे चलकर कैशबुक विवाद को जन्म दिया। यदि यह बात सही साबित होती है, तो मामला सिर्फ फाइलों के घर पर होने का नहीं, बल्कि वित्तीय नियंत्रण और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र की लड़ाई का भी हो सकता है।