शिवपुरी अस्पताल मे इमरजेंसी से बड़ा हुआ अप्रूवल, नियमो मे फस गई जिदंगी

Adhiraj Awasthi
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शिवपुरी। आयुष्मान भारत योजना, जिसे गरीबों के लिए वरदान माना गया था, अब किडनी के मरीजों के लिए मुसीबत का सबब बनती जा रही है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा डायलिसिस के नियमों में किए गए हालिया बदलाव ने इमरजेंसी शब्द को मानो कागजों से मिटा दिया है। अब मरीज की जान से ज्यादा जरूरी सरकारी अप्रूवल हो गया है।

पिछले एक महीने तक व्यवस्था यह थी कि मरीज अस्पताल पहुंचता था, पंजीयन  होता था और डायलिसिस तुरंत शुरू कर दी जाती थी। अप्रूवल की प्रक्रिया बैकएंड पर चलती रहती थी। लेकिन नए नियमों के तहत, जब तक शासन से ऑनलाइन अप्रूवल नहीं मिल जाता, तब तक मशीन चालू नहीं की जा सकती। विशेषज्ञों का मानना है कि डायलिसिस एक जीवन रक्षक प्रक्रिया है, जिसमें घंटों की देरी भी मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।

मशीनें खाली, पर मरीज कतार में
जिला अस्पताल शिवपुरी की स्थिति यह है कि यहाँ 5 मशीनें उपलब्ध हैं, लेकिन फिर भी एक सप्ताह (3 अप्रैल से 10 अप्रैल) में केवल 27 मरीजों का ही डायलिसिस हो पाया। कई बार मशीनें खाली खड़ी रहती हैं, लेकिन मरीज बाहर बैठकर मोबाइल पर 'अप्रूवल' का मैसेज आने का इंतजार करता रहता है। रात के समय स्लॉट न मिलने या सर्वर की दिक्कतों के कारण मरीजों को अगली सुबह तक तड़पना पड़ता है।

आर्थिक बोझ और मजबूरी
यदि कोई मरीज इस प्रक्रिया की देरी से बचने के लिए निजी अस्पताल जाता है, तो उसे एक बार के डायलिसिस के लिए 4,000 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। वहीं जिला अस्पताल में बिना कार्ड के 500 रुपए की रसीद कटती है। गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले मरीजों के लिए यह राशि चुकाना मुमकिन नहीं है, जिससे वे नियमों के जाल में फंसकर अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं।

डॉ. बी.एल. यादव, सिविल सर्जन, जिला अस्पताल शिवपुरी

नियमों के कारण मरीजों को हो रही असुविधा हमारे संज्ञान में है। शासन स्तर के निर्णयों पर हम कुछ नहीं कह सकते, लेकिन स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों को निर्देश देकर समस्या का समाधान करने का प्रयास करेंगे।