शिवपुरी: वन विभाग में 70 मजदूरों का पसीना सूखा, 3 महीने से नहीं मिली 10 लाख की मजदूरी

शिवपुरी। शिवपुरी कलेक्ट्रेट में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई में राहत मांगने आए मजदूरों को बारिश और दर्द दे गई। वन विभाग में पिछले 3 माह से मजदूरी कर रहे मजदूरों का वन विभाग ने पैसा दबा लिया तो वह कलेक्टर से इस मामले की शिकायत करने आए थे। 70 की संख्या में आए मजदूर अपनी गृहस्थी का सामान भी लेकर आए थे उनका कहना था जब तक पैसा नहीं मिलेगा जब तक यह से नहीं उठेंगे,लेकिन शिवपुरी में आज बादलों ने उसके इरादों पर अड़ंगा डाल दिया और पानी बरसने लगा जिस कारण उनका सामान खराब हो गया।


शहडोल जिले से आए लगभग 70 मजदूरों ने वन विभाग पर उनकी मजदूरी का भुगतान वनविभाग पर नही करने का गंभीर आरोप लगाया है। इन मजदूरों ने कलेक्टर और उच्चाधिकारियों से न्याय की गुहार लगाते हुए बताया कि कड़ाके की ठंड और विषम परिस्थितियों में काम करने के बावजूद विभाग उनके हक का पैसा दबाए बैठा है।

13 लाख से अधिक का भुगतान बकाया
मजदूरों की मुख्य ठेकेदार ममता बाई के नेतृत्व में प्रार्थी गणों ने बताया कि उन्होंने शिवपुरी की अलग-अलग तहसीलों में दीवार बनाने और गड्ढे खोदने का कठिन कार्य किया है। मजदूरों के अनुसार, कुल मजदूरी 13,34,560 रुपये बनती है, जिसमें से विभाग ने अब तक मात्र 2,55,000 रुपये का ही भुगतान किया है। शेष 10,79,560 रुपये के लिए मजदूर पिछले तीन महीनों से दफ्तरों के चक्कर काट रहे हैं।

गणेश खेड़ा से लेकर बदरवास तक किया काम
मजदूरों ने अपने शिकायती पत्र में काम का पूरा ब्यौरा देते हुए बताया कि:
कोलारस (गणेश खेड़ा): 2232 मीटर दीवार का निर्माण किया वही लुकवासा  में 820 मीटर पत्थर की दीवार बनाई। और बदरवास में 16x1.5 आकार के लगभग 30,000 गड्ढे खोदने का कार्य पूर्ण किया।

घर और बच्चों की चिंता में मजदूर बेहाल
मजदूरी न मिलने के कारण मजदूर अपने घर और बच्चों को पैसे नहीं भेज पा रहे हैं। शहडोल से रोजी-रोटी की तलाश में शिवपुरी आए ये परिवार अब पाई-पाई को मोहताज हैं। मजदूरों का कहना है कि जब वे जिम्मेदार अधिकारियों (डिप्टी रेंजर और रेंजर) से बात करते हैं, तो उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिलता।

विभाग की चुप्पी पर सवाल
मजदूरों ने सीधे तौर पर डिप्टी तुलाराम और संबंधित रेंजर पर लापरवाही का आरोप लगाया है। शिकायत में उनके मोबाइल नंबरों का उल्लेख करते हुए प्रशासन से मांग की गई है कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए। अब देखना यह है कि क्या वन विभाग इन गरीब मजदूरों के पसीने की कमाई लौटाता है या मामला फाइलों में ही दबा रह जाता है।