Shivpuri News- जब भगवान महावीर ने गर्भ में कर दिया हिलना-ढुलना कर दिया था बंद,पढ़िए क्यों

शिवपुरी। पयूर्षण पर्व के पांचवे दिन श्वेताम्बर जैन समाज ने धूमधाम, उत्साह और उमंग तथा हर्षोल्लास के साथ भगवान महावीर के जन्म के अवसर पर खुशियां मनाईं। इस अवसर पर जैन धर्मावलंबियों ने एक दूसरे को भगवान के जन्म की मिठाई खिलाई और उन्हें बधाईयां दीं। नाच गाकर जन्मोत्सव की खुशियां मनाई गईं।

कमला भवन और आराधना भवन में भगवान के जन्म का वाचन पृथक-पृथक रूप से पंन्यास प्रवर कुलदर्शन विजय जी ने किया जिन्होंने कल्पसूत्र का वाचन करते हुए भगवान जब गर्भ में थे तब त्रिशला माता को आए सपनों का वर्णन किया वहीं भगवान के गर्भ के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि भगवान महावीर स्वामी के लिए उनके माता-पिता तथा बड़े भाई की आज्ञा सर्वोपरि रही।

माता-पिता को उनके वियोग का दुख न पहुंचे इस कारण भगवान ने उनके जीवनकाल में दीक्षा ग्रहण नहीं की। कमला भवन में लाभार्थी परिवार ऋषभ कुमार, राजकुमार जैन श्रीमाल परिवार ने जैन संतों और साध्वियों को स्मृति चिन्ह स्वरूप भगवान की मूर्तियां अर्पित कीं।

प्रारंभ में सुबह आराधना भवन में त्रिशला माता को भगवान के गर्भ में आए 14 स्वप्रों की बोलियां लगाई गईं जिनमें सर्वाधिक बोली माँ लक्ष्मी के स्वप्न की रही जिसे लगभग डेढ़ लाख रुपए में लेने का सौभाग्य रंजीत सिंह जी, उम्मेद सिंह जी दुधेरिया परिवार ने लिया। माला पहनाने का लाभ भी लगभग 45 हजार रूपए में इसी परिवार द्वारा लिया गया। भगवान महावीर के पालने की बोली भी लगाई गई।

बोली लगाने में जैन धर्मांवलंबियों ने उत्साह के साथ लाभ लिया। इसके बाद पंन्यास प्रवर कुलदर्शन विजय जी ने भगवान महावीर के गर्भ से लेकर उनके जन्म लेने तक की कथा का बखान किया। उन्होंने बताया कि जब भी कोई तीर्थंकर आत्मा गर्भ में आती है तो माता को शुभ संकेत होते हैं और ये शुभ संकेत स्वप्र में दृष्टिगोचर होते हैं। उन्होंने बताया कि भगवान महावीर जब गर्भ में आए तो उनकी माँ त्रिशला को चौदह स्वप्र आए।

इन स्वप्रों का फल महाराज श्री ने विस्तारपूर्वक बखान किया। उन्होंने बताया कि भगवान महावीर के गर्भ में आने के बाद उनके पिता के राज्य में लगातार वृद्धि हुई। इस कारण उनका नाम वर्धमान रखने का निर्णय लिया गया। भगवान महावीर स्वामी चूंकि अगले भव में तीर्थंकर पद को प्राप्त करने वाले थे इस कारण उन्हें अवधि, श्रुति और मतिज्ञान था। गर्भ में उन्होंने सोचा कि मेरे हिलने ढुलने से माता को पीढ़ा होती है इस कारण उन्होंने अपना हलन-चलन बंद कर दिया।

माँ त्रिशला इससे आशंकित हो उठीं। उन्होंने सोचा कि बालक की गर्भ में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही है और उन्हें अनिष्ठ की आशंका होने लगी और वह विलाप करने लगीं। उन्हें विलाप करते देख उनके पिता और भाई भी विचलित हो उठे, तब भगवान महावीर ने संकल्प लिया कि जब तक मेरे माता-पिता जीवित रहेंगे वे संन्यास नहीं लेंगे, क्योंकि वह अपने माता-पिता को लेश मात्र भी दुखी नहीं करना चाहते थे।

मुनिश्री कुलदर्शन विजय जी ने बताया कि भगवान महावीर के जीवन से हम यही संदेश ग्रहण कर सकते हैं कि हमारे लिए अपने माता-पिता और बुजुर्गों की आज्ञा सर्वोपरि होनी चाहिए। इसके बाद मुनि कुलदर्शन विजय जी ने भगवान के जन्म का वाचन किया वैसे ही पूरे सभागार में हर्ष का वातावरण गूंज उठा और भगवान की जय-जयकार के नारे लगने लगे।

महिलाएं हर्षातिरेक में बधाई के गीत गाने लगीं और धर्मांवलंबी एक दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई देने लगे। इसके पश्चात भगवान का पालना नगर के प्रमुख मार्गों से गुजरा और इसके पश्चात कमला भवन में स्थानकवासी समाज द्वारा आयोजित जन्म का वाचन मुनि कुलदर्शन विजय जी ने किया।

स्थानकवासी और मंदिरमार्गी समाज की एकता की अद्भुत मिसाल
आराधना भवन में भगवान महावीर के जन्म का वाचन करने से पूर्व मुनिश्री कुलदर्शन विजय जी ने शिवपुरी में श्वेताम्बर समाज के दो धड़े मूर्तिपूजक और स्थानकवासी समाज की एकता की प्रशंसा करते हुए कहा कि यह अनुकरणीय है, काश ऐसी ही एकता अन्य महानगरों में भी देखने को मिले।

उन्होंने कहा कि यहां दोनों समाज मिलजुलकर प्रेमपूर्वक भ्रात भावना के साथ धार्मिक आयोजन में भाग लेते हैं और पता भी नहीं चलता है कौन मंदिरमार्गी है और कौन स्थानकवासी है। ऐसी ही एकता समूचे जैन समाज में होनी चाहिए। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि एकता की यह मिसाल हमेशा कायम रहे। इस अवसर पर स्थानकवासी समाज के अध्यक्ष राजेश कोचेटा, राजकुमार जैन, सुमत कोचेटा, अशोक जैन, रीतेश गूगलिया, पंकज जैन, पारस कोचेटा, भूपेन्द्र कोचेटा, नरेन्द्र कोचेटा, अशोक कोचेटा आदि ने स्थानक में महाराजश्री के आगमन में उन्हें सविधिपूर्वक वंदन किया।