Shivpuri News- आचार्य श्री कुलचंद्र सूरि जी महाराज ने बताए जीवन को तनाव मुक्त बनाने के उपाय

शिवपुरी। सांसारिक प्राणी भी एक संत के समान अपने जीवन को आनंदपूर्ण बना सकते हैं। जीवन को आनंदित बनाने के लिए मन के कषायों और विचारों से मुक्ति आवश्यक है। इससे मुक्ति के लिए जरूरी है कि व्यक्ति अपना आत्मनिरीक्षण करें और अपनी गलतियों पर दृष्टिपात कर उन्हें दूर करे।

उक्त उदगार आराधना भवन में आचार्य श्री कुलचंद्र सूरि जी महाराज के शिष्य रत्न पंन्यास प्रवर श्री कुलदर्शन श्रीजी महाराज साहब ने एक विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्म सभा में उन्होंने बताया कि सांसारिक प्राणी अपने जीवन को किस तरह से आनंदित बना सकते हैं। धर्मसभा में आचार्य श्री के अलावा मुनि श्री कुल रक्षित श्रीजी, नवोदित मुनि श्री कुलधर्म श्रीजी और साध्वी रत्न श्री शासन रत्ना श्रीजी ठाणा 6 महासतियां भी उपस्थित थीं।

धर्मसभा में संत कुलदर्शन श्रीजी ने प्रसिद्ध जैनाचार्य मान विजय जी महाराज द्वारा लिखित ग्रंथ धर्म संघ के हवाले से बताया कि संसार में रहते हुए भी गृहस्थ को जीवन जीने की कला आनी चाहिए। वह धर्म का उपार्जन तो करे लेकिन नीति पूर्वक। धर्म की राह पर चलने के लिए उसे सबसे पहले अपना आत्मनिरीक्षण करना चाहिए।

अपने आप को तौलना चाहिए। अपनी संगत पर दृष्टिपात करना चाहिए। अच्छे लोगों का सत्संग करना चाहिए। अपने स्वभाव को तटस्थ भाव से देखना चाहिए। इससे उसे अपने मन का पता चलेगा। वहीं जीवन में सदभाव है या नहीं इस पर भी उसे दृष्टि डालनी चाहिए। इससे वह अपने हृदय के बारे में जान सकता है।

आत्मनिरीक्षण से उसे ज्ञात हो जाएगा कि उसके अंतर में कितनी गंदगी है या नहीं। इससे उसे अपने मन के विकारों, कषायों, दोषों और कमी का पता चलेगा। फिर उसे अपने इन दुुर्गुणों की सफाई करनी होगी। अंतस जब स्वच्छ होगा तो भीतर ज्ञान का प्रकाश फैलेगा। ज्ञान न होने से ही जीवन में परेशानी और तनाव है। ज्ञान के आने के बाद जीवन आनंदपूर्ण बन जाएगा। पंन्यास प्रवर जी ने कहा कि लेकिन हमें यहीं नहीं रूकना है।

बल्कि अपने उत्साह को लगातार बनाना है। फिर उस उत्साह में गति पैदा करना है। संत कुलदर्शन श्री जी ने कहा कि अच्छे काम करने के लिए समय को टालना नहीं चाहिए। अच्छे समय में अच्छा काम करना चाहिए। इससे जीवन में उन्नति और विकास होगा और हम अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर होंगे।

संत ने बताया भोगी और योगी का अंतर
जैन संत कुलदर्शन सूरि जी ने बताया कि जिसकी इच्छाएं खत्म नहीं हुई लेकिन सांसे खत्म हो गईं, वह भोगी है। जबकि जिसकी इच्छाएं खत्म हो गई लेकिन सांसे बांकी है वह योगी है। महाराज श्री ने कहा कि सांसे खत्म होने से पहले इच्छाएं खत्म होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जिस इंसान के जीवन में इच्छाएं ज्यादा होंगी, उसका जीवन मुश्किल होगा और जिसके जीवन में इच्छाएं न्यून होंगी उसका जीवन आनंदपूर्ण होगा।

श्वांस और समय को संभालना आवश्यक

संत कुलदर्शन श्रीजी ने कहा कि इंसान को श्वांस और समय सीमित मात्रा में मिला है। जीवन की सार्थकता के लिए श्वांस और समय दोनों को संभालना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि जीवन वर्षों, महीनों, घंटों और सैकंडों के आधार पर नहीं चलता। बल्कि श्वांस के आधार पर चलता है। प्रत्येक व्यक्ति को निश्चित श्वासं मिली हुई हैं।

उन्होंने कहा कि इसीलिए योगी अपनी श्वांस की गति को कम कर जीवन की अवधि बढ़ा लेते हैं और सवा सौ तथा 150 साल तक जीते हैं। उन्होंने समय को भी संभालने को कहा। संत ने बताया कि समय की कुछ कमजोरियां हैं, उन्हें हमें ध्यान रखना चाहिए। एक तो समय रूकता नहीं है दूसरा गया हुआ समय वापिस नहीं लौटता और समय सुनता भी नहीं है।