शिवपुरी। 24 फरवरी को जब अचानक रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया और पूरे देश में भय का वातावरण व्याप्त हो गया। आसमान में फाईटर प्लेन गडग़ड़ाने लगे। कई नगर मिसाइल की गिरफ्त में आ गए और टेंकर जमीन की छाती भेदने लगे, उस समय ऐसा लग रहा था कि शायद यूक्रेन से जीवित बचकर बाहर निकलना मुश्किल होगा। 13 दिन के लंबे संघर्ष में कई बार ऐसा लगा कि मौत बिल्कुल नजदीक है।
लेकिन हिम्मत नहीं हारी और जीवन बचाने के लिए जो भी हर संभव प्रयास करना जरूरी थे, वह हमने किए। जिसका परिणाम यह हुआ कि आज सकुशल मैं अपने शहर शिवपुरी वापिस आ गया। उक्त उदगार यूक्रेन के खारकीव शहर में मेडिकल की पढ़ाई कर रहे 22 वर्षीय छात्र हिमांशु मौर्य ने इस संवाददाता से चर्चा करते हुए व्यक्त किए।
उनके चेहरे पर अभी भी कभी-कभी भय की छाया दृष्टिगोचर होने लगती है और अब यूक्रेन जाने की आशंका से वह कांपने लगते हैं। शिवपुरी पहुंचने पर हिमांशु का उनके परिवारजनों, निकट संबंधियों और गणमान्य नागरिकों ने फूल मालाओं से स्वागत किया। श्री मौर्य बताते हैं कि इस दौरान उन्होंने कई-कई दिन भूखा रहने पड़ा और कभी-कभी तो ब्रेड का एक सूखा टुकड़ा खाकर उन्हें रात गुजारनी पडी।
हिमांशु मौर्य वर्तमान में श्योपुर जिले मेंं पदस्थ जेलर विजय सिंह मौर्य के पुत्र हैं और शिवपुरी के निवासी हैं। पिछले साल उनका एडमिशन यूक्रेन की खारकीव नेशनल मेडिकल यूनिवर्सिटी में मेडिकल के प्रथम वर्ष के छात्र के रूप में हुआ। खारकीव यूक्रेन की राजधानी से 500 किमी दूर है और यहां तीन मेडिकल कॉलेज हैं। उन्होंने बताया कि यूक्रेन में दो बड़े शहर राजधानी कीव और खारकीव हैं। कीव में जहां मुंबई की छवि है, वहीं खारकीव में दिल्ली की आभा झलकती है।
उन्होंने बताया कि दिसंबर 2021 में जब वह खारकीव पहुंचे तो उस समय माहौल शांत था। वहां बहुत ठंड पड़ती है। अचानक वर्फ गिरने लगती है। लेकिन फरवरी में यूक्रेन और रूस के बीच तनाव शुरू हो गया और जल्द युद्ध छिड़ने की आशंकाएं बलवती हो गईं। अमेरिका के राष्ट्रपति बाइडेन लगातार कह रहे थे कि रूस कभी भी यूक्रेन पर हमला कर सकता है।
उस समय घबरा के मैंने भारत जाने का निश्चय किया। लेकिन फ्लाइट बंद थी और भारत सरकार तथा एंबेसी ने वहां फंसे छात्रों को बाहर निकालने में कोई रूचि नहीं दिखाई। 24 फरवरी को अचानक रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया और पूरे देश में कर्फ्यू लागू कर दिया गया। यहीं से दिक्कतें शुरू हुई। टीव्ही पर युद्ध का मंजर देखकर घबराहट होती थी। अचानक शहर में सायरन बजने लगते थे, जिससे घबराहट और बढ़ जाती थी।
आसमान में फाइटर प्लेन की गड़गड़ाहट से रक्तचाप बढ़ जाता था। खाने-पीने की समस्याएं भी उत्पन्न होने लगी थीं। पूरा बाजार बंद था। जिस हॉस्टल में हम रहते थे, वहां हमें खाने को कुछ नहीं मिलता था। ज्यादा मांगने पर ब्रेड का सूखा टुकड़ा पकड़ा दिया जाता था, जिसे पानी में भिगोकर हम खाते थे। कई बार तो पीने का पानी भी हमें नहीं मिलता था। भारतीय दूतावास को फोन लगाया लेकिन किसी ने फोन अटेंड नहीं किया और कभी अटेंड भी किया तो समाधानकारक जवाब नहीं मिला।
स्टेशन पहुंचे लेकिन ट्रेन में नहीं बैठने दिया गया
खारकीव में रूस के आक्रमण का खतरा बढ़ता जा रहा था। वहां की सरकार ने एडवाइजरी जारी की कि 18 से 60 वर्ष की उम्र के पुरुष खारकीव छोड़कर नहीं जाएंगे। बच्चे, वृद्ध और महिलाएं खारकीव छोड़कर चले जाएं। खारकीव से लबीव जाने के लिए ट्रेन है, जो कि बॉर्डर के नजदीक है। जहां से दूसरे देश में जाया जा सकता है। यह एडवाइजरी जारी होते ही 1 हजार से अधिक लोग पैदल मार्च करते हुए स्टेशन की ओर चल दिए।
जैसे तैसे स्टेशन पहुंचे। लबीव जाने के लिए ट्रेन खड़ी थी। लेकिन नो इंडियन, नो इंडियन कहते हुए हमें वहां की पुलिस और सेना ने ट्रेन में नहीं चढ़ने दिया। इसी बीच मिसाइल अटैक शुरू हो गए। हम रेलवे स्टेशन के नीचे स्थित मेट्रो स्टेशन पर पहुंचे और बंकर में रात गुजारी। उस समय ऐसा लग रहा था कि कभी भी कोई मिसाइल आकर हमारी जीवनलीला समाप्त कर सकती है।
अब सचेत हुआ भारतीय दूतावास, की फ्लाइट की व्यवस्था
2 या 3 मार्च के बाद भारतीय दूतावास सचेत हुआ और हमें एडवाइजरी जारी की गई कि किसी तरह से 11 किमी पैदल चलकर पायरीन पहुंचो। जहां से रोमानिया के लिए फ्लाइट मिलेगी। इस पर हम पैदल-पैदल चल दिए। रास्ते में अनेक स्थानों पर विनाश के मंजर दिखाई दिए।
बडी-बडी बिल्डिंगों का मलवा सड़क पर खड़ा हुआ था और जहां देखो वहां मौत के चिन्ह दृष्टिगोचर हो रहे थे। बताया गया था कि पायरोकीन 11 किमी है। लेकिन असल दूरी 30 किमी थी। पायरीन पहुंचकर हमें दिल्ली के लिए फ्लाइट मिली और फ्लाइट में चढ़ते ही मैंने राहत की सांस ली।
भारत सरकार हमें यहां दिलाए मेडिकल में एडमिशन
हिमांशु मौर्य ने भारत सरकार से मांग की है कि उनकी मेडिकल की पढ़ाई की व्यवस्था भारत में ही कराई जाए। क्योंकि यूक्रेन जाना अब संभव नहीं लग रहा। सरकार को मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए यूक्रेन के भारतीय मेडिकल छात्रों को देश के मेडीकल कॉलेज में एडमिशन देना चाहिए।