सरकार ने शिवपुरी में 50 रूपए के हिसाब से 73 टाइगरो का करवाया था शिकार, पढिए चर्चित टाइगर तारा और पेटू की लवस्टोरी, प्यार में लूटा दी जान

शिवपुरी। शिवपुरी जिले के पर्यटक के क्षेत्र के लिए गुड न्यूज है कि माधव नेशनल पार्क शिवपुरी में टाइगर के पुर्नवास के लिए टाइगर सफारी प्रोजेक्ट बनाकर भारत सरकार को भेज दिया गया है। करीब 16 करोड़ की लागत वाले प्रोजेक्ट को केंद्र सरकार से मंजूरी मिलते ही टाइगर के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके लिए 375 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले नेशनल पार्क में अन्य फाॅरेस्ट एरिया मिलाकर इसे 1200 किलोमीटर किया जाएगा।

यह जानकारी है रोचक:भारत नही विश्व में ऐसा नही हुआ होगा

प्रस्तावित टाइगर सफारी प्रोजेक्ट तैयार करते समय पुराने रिकाॅर्ड से खुलासा हुआ है कि माधव नेशनल पार्क में 1956 से 1970 तक यानी 14 वर्ष में 73 टाइगर का शिकार किया गया था। शिकार कराने का कारण टाइगर की संख्या बढ़ना था, इससे आसपास के लोगों को जान का खतरा था।

यह शिकार 50 रु. प्रति टाइगर के हिसाब से सरकार ने ही कराए थे। इससे वन्य प्राणी अधिनियम 1972 आने से पहले ही 14 साल के अंदर नेशनल पार्क शिवपुरी के टाइगर तेजी से खत्म हो गए। पार्क प्रबंधन ने केंद्र सरकार को भेजे प्रोजेक्ट में यह जानकारी भी भेजी है।

25 साल बाद फिर से दहाड़ गूंजेगी

साल 1990 में माधव नेशनल पार्क में टाइगर सफारी बनी, जिसमें 10-15 टाइगर थे। अनदेखी के कारण धीरे धीरे यह सफारी बंद हो गई। पार्क से टाइगर दूसरी जगह विस्थापित कर दिए गए। माधव नेशनल पार्क शिवपुरी में साल 1996 तक एक टाइगर था। उसके बाद से टाइगर नजर नहीं आए। अब 25 साल बाद फिर से टाइगर की दहाड़ गूंजेगी।


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साल तो सही याद नही हैं लेकिन लगभग 20 से अधिक साल पहले जब माधव नेशनल पार्क में शेर भी हुआ करते थे। इन्ही एक शेर और शेरनी के जोडे का नाम था तारा और पेटू। बताया जाता हैं कि शायद विश्व के इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि इस जोडे की नसबंदी प्रशासन को करानी पडी थी। कारण था इनकी प्रजनन क्षमता अधिक थी, इस जोडे के कई बच्चे हुए।

प्रजनन क्षमता के कारण माधव नेशनल पार्क ने इस जोडे अलग करने का प्लान बनाया। शेरनी तारा के रहने के लिए एक वाडा बनाया गया। जिसके चारो ओर गहरे गडडे खोदे गए उसमें आरसीसी के पिलर बनाए गए और चारो ओर से लोहे का मजबूत जाल से उसे कवर किया गया उसे में शेरनी को बंद कर दिया गया।

वही पेटू ज्यादा ही आक्रमक था उसके रहने के लिए जमीन को खोदा गया लगभग 20 फुट गहरी खाई बनाई गई और इस खाई के उपर मजबूत लोहे के तारो का जाल बनाया गया,गहरी खोदी गई खाई की जमीन से तारो के जाल की उंचाई लगभग 40 फुट होगी।

तारा और पेटू की प्रेम कहानी में माधव नेशनल पार्क प्रबधन जब विलेन बन गया तो अपने प्रेमी से जुदा हुई तारा ने खाना छोड दिया और उधर पेटू उदास न होकर हिसंक होने लगा किसी भी तरह वह अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने के लिए तारो के जाल का पार करने का प्रयास करता रहता था। वन्य प्राणी विशेषज्ञ हैं उनके अनुसार कि एक शेर कभी भी 30 फुट से अधिक उंची छलांग नही लगा सकता हैं इस कारण ही पेटू को जिस जगह रखा गया उसको पार करने के लिए उसे 40 फुट उंचाई क्रॉश करनी थी।

बताया जाता रहा हैं कि एक सुबह पार्क प्रबंधन को सूचना मिली कि पेटू तारा के बाडे में आ गया। यह खबर मीडिया की सुर्खिया बनी। लोग अपने अपने व्यू दे रहे थे कि पेटू ने अपना वाडा ऐसे पार किया होगा,लेकिन यह संभव भी नही था कि कोई भी शेर 40 फुट उंची छलाग लगा ले। प्रबंधन आज भी क्लीयर नही कर सका हैं कि पेटू ने 40 फुट उंची छलांग कैसे लगाई होगी और वह किस तरह से अपनी प्रेमिका के पास पहुंचा।

इसके बाद पार्क प्रबंधन फिर पेटू को तारा से अलग करते हुए उसे पुन:वापस उसकी वाडे में भेज दिया। तारा ने अपने प्रेमी के विछोह में खाने का त्याग कर दिया। किसी भी स्थिती में वह कुछ भी खाने को तैयार नही थी,उधर पेटू ने गुस्से में आकर वाडे में लगे लोहे के पिलरो को पूरा का पूरा हिलाकर रख दिया और तोड फोड करने लगा।

प्रबंधन ने सोचा कि तारा भूखी न मर जाए और पेटू हिसंक होकर अपने आप को नुकासन न पहुंचाए तो पुन:दोनो को एक साथ कर दिया। यह प्रेमी कहानी उस समय मीडिया का सबसे पसंदीदा सब्जेक्ट था। बताया जाता है कि पेटू बीमार रहने लगा उचित ईलाज के लिए पेटू का ट्रांसफर जबलपुर के चिडियाघर मे कर दिया गया। फिर इस विछोह में तारा ने खाने का त्याग कर दिया और पेटू भी उदास रहने लगा और उसने जबलपुर चिडिया घर मे अपनी तारा की याद में प्राण त्याग दिए।