ब्लैक राईस की पैदावर कर किसान ने किया कमाल, 250 से 500 रूपए किलो की है कीमत: बिस्किट बनाने के आते है काम

शिवपुरी। देश का पेट भरने वाले किसानो की अर्थिक स्थिती किसी से छुपी नही है खेती का लाभा का धंधा बनाने के लिए सरकारो ने नारा भी दिया हैं,लेकिन काम इसके बिल्कुल उलट हैं समय पर किसानो का खाद भी नही मिल रहा हैं। किसानो को अगर खेती लाभ का धंधा बनाना है तो स्वयं ही कुछ करना होगा और ऐसा ही कुछ उदारहण हमारे सामने आया हैं एक किसान ने 250 से 500 रूपए किलो की कीमत का चावल अपने खेत में पैदा कर दिया हैं।

ग्राम कोटा के एक किसान भारत सिंह ने काले चावल की खेती की है। काले चावल उगाने वाले जिले के पहले किसान हैं। हालांकि प्रदेश में चावल की इस किस्म की खेती कुछ जिलों में हुई है। नई प्रजाति की खेती कर किसान अब खेती को उन्नात व्यापार की श्रेणी में लाने का प्रयास कर रहे हैं।

किसान भारत सिंह का यह प्रयास काफी हद तक सफल होता भी दिख रहा है क्योंकि काले चावल की फसल होने के साथ ही गुरुग्राम की एक कंपनी ने उन्हें एप्रोच किया है। सामान्य चावल के मुकाबले इसकी कीमत भी तीन से चार गुना अधिक मिल रही है। खेती के इस नवाचार के काले चावल के रूप में किसानों के सामने एक सुनहरा भविष्य है।

फिलहाल भारत सिंह ने 4 बीघा में यह फसल की है। किसान का कहना है कि इसमें मुनाफा अच्छा है क्योंकि इस फसल से आमदनी 3 गुना अधिक होती है। इसके अलावा काले चावल स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होते हैं। खास बात यह है कि पूरी फसल जैविक खेती की पद्दति को अपनाकर पैदा की गई है।

कीमत पांच गुना तक अधिक, गुरुग्राम की कंपनी ने दिखाई दिलचस्पी

भारत सिंह ने बताया कि अभी चार बीघा में खेती की है। फसल निकलने के बाद से ही गुरुग्राम की एक कंपनी ने संपर्क किया है और उनसे बात चल रही है। वे 220 रुपये प्रतिकिलो के भाव से चावल खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। धान भी हमें डिलीवर नहीं करना होगा, बल्कि वे खुद इसे लेकर जाएंगे।

भारत सिंह ने बताया कि इसके पहले तक वे जो चावल उगाते थे उसका भाव 50 से 80 रुपये किलो ही होता था जबकि यह 200 से 500 रुपये तक में बिकता है। स्थानीय स्तर पर इसकी मांग नहीं है क्योंकि इसकी खेती ही यहां पहली बार हुई है, लेकिन बाहर इसकी काफी मांग है। इसका उपयोग बिस्किट बनाने में भी किया जाता है।

कीटनाशक व उर्वरक की जगह किया गो मूत्र व गोबर का उपयोग

किसान ने बताया कि इसकी खेती पूरी तरह से जैविक की गई है। काले चावल की फसल 10 दिन की देरी से होती है। इसमें किसी तरह की बीमारी नहीं लगती है। बासमती की सुगंधा किस्म हो या फिर 11-21 नंबर चावल इसमें डीएपी और यूरिया बहुत ज्याादा डलती है। जबकि काले चावल में कोई जरूरत नहीं पड़ी। सिर्फ गोबर और गो मूत्र का इस्तेमाल किया गया इसलिए यह पूरी तरह से जैविक है। भारत सिंह ने बताया कि अभी उन्हें कम बीज मिला था, लेकिन अब अगली बार इसकी बड़े पैमाने पर खेती करेंगे। यदि कोई और किसान इसकी खेती करना चाहता है तो उसे भी बीज उपलब्ध कराएंगे।

छत्तीसगढ़ में उगता है काला चावल, विदेशों तक है मांग

छत्तीसगढ़ में काले चावल की खेती बड़ी मात्रा में हो रही है। यहां ब्लैक राइस को छत्तीसगढ़ में करियाझिनी के नाम भी जाना जाता है। यह प्रजाति काफी पुराना है। इसे लेकर यहां कई किवदंतियां भी हैं। इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और अन्य फायदों के कारण विदेशों में इसकी काफी डिमांड है। छत्तसीगढ़ से इंडोनेशिया में काले चावल की सप्लाई होती है। यह खून पतला करता है और दिल के लिए काफी फायदेमंद होता है।

इनका कहना है
एक ही तरह की प्रजाति की लगातार खेती करने से गुणवत्ता कम होती जाती है। यदि किसान नई प्रजाति की पैदावार करता है तो उसकी गुणवत्ता बेहतर होती है। काले चावल के कई फायदे हैं। कोटा में जिस किसान ने काले चावल उगाए हैं उसका अध्ययन करेंगे और अच्छे परिणाम आने पर अन्य किसानों को इसके फायदे बताने के साथ इसकी खेती के लिए प्रेरित करेंगे।
डॉ.एमके भार्गव, वरिष्ठ वैज्ञानिक, कृषि केंद्र