उपचुनाव:बसपा की चाल तय करेंगी ग्वालियर के महाराजा सिंधिया का भविष्य - MY OPINION

ग्वालियर चंबल संभाग की जिन 16 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। वह सभी सीटें सिंधिया के प्रभाव क्षेत्र की हैं और राज्यसभा सदस्य ज्योतिरादित्य सिंधिया की मेहनत के बलबूते कांग्रेस ने संभाग की 32 सीटों में से 26 सीटों पर विजयश्री प्राप्त की थी। इनमें उपचुनाव वाली सभी 16 सीटें शामिल हैं।

इन 16 सीटों में जौरा सीट को छोड़कर सभी सीटों से जीते विधायक कांग्रेस छोड़कर भाजपा मेंं शामिल हुए और उन्होंने अपनी विधायकी भी छोड़ दी थी। अब ये सभी पूर्व विधायक अपने-अपने विधानसभा क्षेत्रों से कांग्रेस के स्थान पर भाजपा टिकट पर चुनाव लड़ेंगे और सिंधिया के लिए इन सीटों पर विजय प्राप्त करना प्रतिष्ठा का सवाल है। यदि सभी 16 सीटें वह भाजपा की झोली में डालने में सफल रहे तो देश और प्रदेश की राजनीति में उनका कद बढ़ेगा। लेकिन यदि परिणाम प्रतिकूल हुए तो इसका असर उनके राजनैतिक भविष्य पर भी पड़ेगा।

ग्वालियर चंबल संभाग की जिन 16 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं उनका राजनैतिक चरित्र बिल्कुल अलग है। आमतौर पर यह माना जाता है कि जहां-जहां बहुजन समाजपार्टी मजबूत होती है, तो उसका खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ता है। लेकिन ग्वालियर चंबल संभाग की इन 16 सीटों पर उक्त धारणा सत्य साबित नहीं हो रही।

16 सीटों में से कम से कम 10 सीटों पर बहुजन समाजपार्टी मजबूत स्थिति में हैं। इन 10 सीटों में से 5 सीटें तो मुरैना जिले की अंबाह, दिमनी, मुरैना, सुमावली और जौरा है। इन विधानसभा सीटों पर 1998 से अब तक कभी न कभी बसपा प्रत्याशी की विजय होती रही है। शिवपुरी जिले की करैरा और पोहरी विधानसभा सीटों पर भी बसपा मजबूत है। करैरा में तो 2003 के विधानसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी लाखन सिंह बघेल विजयी भी रहे थे।

2018 के विधानसभा चुनाव में पोहरी में बसपा प्रत्याशी कैलाश कुशवाह दूसरे स्थान पर रहे थे और उन्होंने निवर्तमान भाजपा विधायक प्रहलाद भारती को तीसरे स्थान पर धकेल दिया था। करैरा में भी बसपा प्रत्याशी प्रागीलाल जाटव को लगभग 40 हजार मत प्राप्त हुए थे। अशोकनगर में भी बसपा प्रत्याशी चुनाव जीत चुका है। लेकिन बसपा की मजबूती के बाद भी 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उपचुनाव वाली सभी सीटों पर भारी मतों से विजय हांसिल की थी और इस जीत का श्रेय सिंधिया को दिया गया था।

जिन्होंंने बसपा के मजबूत शिकंजे को तोड़कर कांग्रेस प्रत्याशियों को जिताने में सफलता हांसिल की थी। उपचुनाव में भी बसपा सभी सीटों पर अपेक्षा के विपरीत चुनाव लड़ रही है। आमतौर पर बहुजन समाजपार्टी उपचुनावों से दूर रहती है। लेकिन इस बार उसने प्रदेश की 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव में शामिल होने का निर्णय लिया है और अपने प्रत्याशियों की घोषणा भी कर दी है।

देखना यह है कि बहुजन समाज पार्टी की उपस्थिति कांग्रेस के लिए फायदेमंद होती है या अपेक्षा के अनुसार भाजपा के लिए। संभाग में भाजपा के कई प्रांतीय और राष्ट्रीय नेताओं की उपस्थिति है। केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से लेकर ज्योतिरादित्य ङ्क्षसंधिया, गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा और खेल एवं युवक कल्याण मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया भी संभाग की राजनीति में सक्रिय हैं और इन सभी का उपचुनाव वाली विधानसभा सीटों पर कहीं न कहीं मजबूत प्रभाव है।

जबकि कांग्रेस के लिए दिक्कत यह है कि उसके पास संभाग में ऐसा काई नेता नहीं है, जिसकी छवि मतदाता को आकर्षित कर सके। ऐसी स्थिति में संभाग में प्रचार का भार अकेले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ को उठाना पड़ेगा। उपचुनाव में यदि भाजपा जीती तो जहां सिंधिया की प्रतिष्ठा बढ़ेगी। वहीं कांग्रेस ने बढ़त हांसिल की तो इसका श्रेय कमलनाथ के खाते में जाएगा।


जहां तक भाजपा प्रत्याशियों का सवाल है, उन्हें उपचुनाव मेें कुछ परेशानियों का सामना अवश्य करना पड़ रहा है। जनता के बीच हालांकि वह दलील दे रहे हैं कि जनहितों के लिए उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और भाजपा में शामिल हुए। लेकिन इसका ज्यादा असर मतदाताओं पर हो रहा है, इसे लेकर संदेह है। कांग्रेस गद्दार बनाम खुद्दार का मुद्दा भी उपचुनाव में उछाल रही है।

जिसका जबाव देना पूर्व विधायकों को भारी पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में सिंधिया पर सिर्फ अपने बलबूते भाजपा उम्मीदवारों को जिताने का दायित्व है। कुल मिलाकर संभाग की सभी 16 विधानसभा सीटों पर जोरदार मुकाबले के आसार बन रहे हैं। ऐसी स्थिति में पल्लड़ा किसका भारी रहेगा अथवा जीत किसके खाते में जाएगी शायद समय ही इस सवाल का सही जबाव देगा।
लेखक:अशोक कोचेटा सांध्य तरूण सत्ता के संपादक हैं।
MY OPINION श्रेणी के तहत शहर के बुद्धिजीवियों के स्वतंत्र विचार प्रकाशित किए जाते हैं।