शिवपुरी। ग्वालियर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत शिवपुरी जिले की पोहरी विधानसभा क्षेत्र अपने विचित्र राजनैतिक चरित्र के कारण जाना जाता है। इस विधानसभा क्षेत्र के मतदाता जागरूक माने जाते हैं और सिर्फ प्रहलाद भारती को छोड़कर इस विधानसभा क्षेत्र से आज तक किसी को लगातार दूसरी बार विधायक बनने की मौका नहीं मिला।
विधानसभा क्षेत्र में मुख्य रूप से धाकड़ और ब्राह्मण जाति का बाहूल्य है तथा इन दोनों जातियों के अलावा आज तक इस विधानसभा क्षेत्र में किसी अन्य जाति के प्रत्याशी को जीतने का अफसर नहीं मिला है। इस विधानसभा क्षेत्र में मुख्य रूप से कांग्रेस और भाजपा का ही प्रभाव है।
लेकिन इसके बावजूद भी एक-एक बार इस विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस और भाजपा प्रत्याशियों की जमानत जप्त हो चुकी है। 2003 के विधानसभा चुनाव में तो समानता दल का प्रत्याशी इस विधानसभा क्षेत्र से विजयी हुआ था। उस समय भाजपा प्रत्याशअी को जमानत से हाथ धोना पड़ा था और 2008 के चुनाव में भाजपा ने इसका बदला चुकाया और कांग्रेस प्रत्याशी को जमानत से हाथ धोना पड़ा।
लेकिन इसके तत्काल बाद हुए लोकसभा चुनाव में केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को इस विधानसभा क्षेत्र से 16 हजार से अधिक मतों से पीछे रहना पड़ा था। इस विधानसभा क्षेत्र से जीते गए अधिकांश विधायक बाहरी रहे हैं और जो इक्का दुक्का जीते भी हैं, वह नाम मात्र के पोहरी विधानसभा क्षेत्र के नागरिक हैं। जबकि वह रहते शिवपुरी में हैं।
यहीं कारण है कि जीते गए जनप्रतिनिधियों को इस विधानसभा क्षेत्र के विकास में भावनात्मक रूप से कोई रूचि नहीं है। जिसके परिणाम स्वरूप इस क्षेत्र में अभी तक नगर पंचायत का निर्माण नहीं हो पाया और सड़क, बिजली और पानी की मूलभूत समस्याओं से ही यह क्षेत्र अभी तक मुक्त नहीं हो पाया है।
1977 से अब तक इस विधानसभा क्षेत्र में हुए 10 चुनावों में सबसे अधिक पांच बार भाजपा, चार बार कांग्रेस और एक बार समानता दल के प्रत्याशी को जीतने का अवसर मिला। कांग्रेस ने इस विधानसभा क्षेत्र में लगातार दो बार 1980 और 1985 में विजय प्राप्त की। 1980 में कांग्रेस प्रत्याशी हरिवल्लभ शुक्ला और 1985 में स्व. हिमांशु शर्मा विजयी हुई।
जबकि 1990 में भाजपा के जगदीश वर्मा चुनाव जीते। 1993 में कांग्रेस प्रत्याशी बैजंती वर्मा चुनाव जीती। उनकी जीत इस मायने में उल्लेखनीय रही कि कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों के प्रत्याशी धाकड़ समुदाय से थे। अपेक्षा के विपरीत कांग्रेस ने यह प्रयोग किया था और यह प्रयोग सफल रहा।
1998 में भाजपा प्रत्याशी नरेंद्र बिरथरे, 2003 में समानता दल प्रत्याशी हरिवल्लभ शुक्ला विजयी रहे। जबकि 2008 और 2013 के लगातार चुनाव भाजपा प्रत्याशी प्रहलाद भारती जीते। 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 1993 के चुनाव की तरह प्रयोग किया और उन्होंने भाजपा के धाकड़ उम्मीदवार के मुकाबले अपना भी धाकड़ उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारा।
गैर धाकड़ मतों के धु्रवीकरण के लिए बसपा ने कैलाश कुशवाह पर दाव लगाया और उनका यह दाव पूरी तरफ सफल तो नहीं हुआ लेकिन श्री कुशवाह ने मुकाबले को रौचक बनाकर भाजपा प्रत्याशी को तीसरे स्थान पर धकेल दिया। लेकिन जीते कांग्रेस प्रत्याशी सुरेश राठखेड़ा।
धाकड़ वर्सेज धाकड़ प्रत्याशी का गणित कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हुआ। यहीं कारण है कि शीघ्र ही होने जा रहे पोहरी विधानसभा के उपचुनाव में कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग इसी गणित को आगे बढ़ाने पर जोर दे रहा है। भाजपा उपचुनाव में धाकड़ उम्मीदवार के भरोसे है।
पिछले चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में जीते सुरेश राठखेड़ा का टिकट पक्का माना जा रहा है और कांग्रेस में भी धाकड़ समुदाय से अनेक नाम उछल रहे हैं। धाकड़ समुदाय से जिनकी उम्मीदवारी की प्रबल संभावना है उनमें एक नाम युवा विनोद धाकड़ एडवोकेट का है, जो कांग्रेस के ब्लॉक अध्यक्ष रह चुके हैं और हिम्मतगढ़ के निवासी हैं। श्री धाकड़ पिछले दो-तीन चुनावों से टिकट के लिए काफी जोर लगा रहे हैं।
लेकिन गॉड फादर के अभाव में वह हर बार टिकट से वंचित हो जाते हैं। इस बार उनके नाम की पैरवी पूर्व मंत्री लाखन सिंह कर रहे हैं। लाखन सिंह भी धाकड़ हैं और भितरवार से विधायक हैं। जिला कांग्रेस के पूर्व कार्यवाहक अध्यक्ष लक्ष्मीनारायण धाकड़ भी टिकट के लिए इच्छुक हैं। वह भी पोहरी विधानसभा क्षेत्र के निवासी हैं। उनके अलावा जनपद अध्यक्ष प्रधुम्र वर्मा भी टिकट के दावेदार हैं। यदि कांग्रेस ने धाकड़ उम्मीदवार को टिकट देने का मन बनाया तो इन चारों में से ही किसी एक को टिकट मिलेगा।
पोहरी में धाकड़ मतदाताओं का है बाहूल्य
पोहरी विधानसभा क्षेत्र में लगभग 2 लाख 30 हजार से अधिक मतदाता हैं। लेकिन सर्वाधिक मतदाता धाकड़ जाति के हैं। धाकड़ जाति के विधानसभा क्षेत्र में लगभग 50 हजार मतदाता हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि पोहरी में धाकड़ मतदाताओं का धु्रवीकरण अपनी जाति के उम्मीदवार के पक्ष में होता है।
जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में हर चुनाव में धाकड़ वर्सेज अन्य जातियों को धु्रवीकरण भी हो जाता है। जिसके कारण अन्य जाति के मतदाता गैर धाकड़ उम्मीदवार को मत देने की मानसिकता बनाते हैं। धाकड़ विरोध में इस विधानसभा क्षेत्र में अधिकांशत: ब्राह्मण उम्मीदवार मैदान में उतरता है।
इस विधानसभा क्षेत्र में 5 बार ब्राह्मण उम्मीदवार अभी तक चुनाव जीत चुका है। 1977 में जनता पार्टी के दामोदर शर्मा, 1980 में कांग्रेस के हरिवल्लभ, 1985 में कांग्रेस के स्व. हिमांशु शर्मा, 1998 में भाजपा के नरेंद्र बिरथरे और 2003 में समानता दल के हरिवल्लभ विजयी रहे हैं।
क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या लगभग 15 हजार है। इनके अलावा 15-15 हजार रावत और यादव मतदाता क्षेत्र में हैं। वैश्य मतदाताओं की संख्या लगभग 10 हजार है। बघेल मतदाताओं की संख्या भी लगभग 10 से 12 हजार है। जबकि दलित मतदाता 20 से 25 हजार के मध्य हैं।

