मानवता का सेवा केन्द्र बना शिवपुरी का अपना घर आश्रम, 23 प्रभुजियों की हो रही है सेवा

शिवपुरी। आश्रयहीन और असहाय पीडि़तों की सेवा के लिए भरतपुर राजस्थान में डॉ. बीएम भारद्वाज एवं उनकी धर्मपत्नि डॉ. माधुरी भारद्वाज द्वारा स्थापित अपना घर आश्रम की शाखा अब शिवपुरी में भी स्थापित हो गई है जहां वर्तमान में 23 प्रभुजियों की सेवा की जा रही है।

ये प्रभुजी वे हैं जिन्हें सडक़ों, गांवों, दूर दराज के स्थलों आदि से लाकर यहां बसाया गया है। शिवपुरी में 30 जुलाई 2017 को स्थापित अपना घर आश्रम मानव सेवा के केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। इस आश्रम में प्रभुजियों के लिए न केवल ठहरने, खाने-पीने और चिकित्सा की निशुल्क व्यवस्था है जो जनसहयोग से संचालित है तथा समाजसेवी इसमें बढ़ चढक़र अपना योगदान दे रहे हैं।

फतेहपुर से पिपरसमां जाने वाली रोड़ पर सडक़ से लगभग 100 मीटर दूर स्थापित अपना घर आश्रम में पिछले दो साल से यहां जनसहयोग से दो हॉलो एवं दो कमरों का निर्माण किया गया है। लगभग 2200 वर्ग फीट में टीनशेड का निर्माण कर आश्रम की क्षमता 30 प्रभुजी की गई है।

पिछले दो साल के दौरान शिवपुरी के अपना घर आश्रम में 154 प्रभुजी आश्रम में लाकर भर्ती किए गए। जिनमें से कुछ स्वस्थ होने के बाद उनके परिवारजनों का पता लगने के पश्चात उनके साथ घर रवाना हुए हैं। इस आश्रम में शहर के  कुछ समाजसेवी भी आकर निरंतर सेवाएं दे रहे हैं।

यदि आप अपने जन्म दिन, विवाह और परिवार के किसी व्यक्ति के पुण्य स्मरण को यादगार बनाना चाहते हैं तो यहां आकर प्रभुजियों के स्वल्पाहार, भोजन और मिष्ठान में भी अपना योगदान दे सकते हैं। अपना घर आश्रम में एक समय के स्वल्पाहार और नाश्ता हेतु 400 रूपए, एक समय के भोजन हेतु 600 रूपए और दिन भर के संपूर्ण भोग हेतु 1600 रूपए जमा कर पुण्य अर्जित कर सकते हैं।

विशेष भोजन हेतु 1500 रूपए जमा कराकर आप लाभ उठा सकते हैं और प्रभुजियों को अपने हाथ से परोसकर भोजन करा सकते हैं। अपना घर आश्रम की मासिक, वार्षिक, आजीवन और संरक्षक सदस्यता भी ग्रहण की जा सकती है। प्रभुजियों की चिकित्सा सेवा हेतु प्रतिमाह 6 हजार रूपए जमा कर लाभ उठाया जा सकता है।

प्रभुजी का संबोधन सेवा को आनंद से भर देता है

अपना घर आश्रम में समाज के उस वर्ग के लोग हैं जो आश्रयहीन, असहाय, मानसिक बीमारी का शिकार, बीमार और अपंग स्थिति में सडक़ किनारे प्लेटफार्म, सार्वजनिक एवं धार्मिक स्थलों पर पड़े वेदनाओं के अंतिम कष्टों को झेलने के लिए मजबूर हैं।

जिनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है। सेवा और संसाधनों के अभाव में ये वेजुबान लोग असीम गंदगी में लिपटे हुए जिंदगी और मौत से संघर्ष करते हैं। ऐसे ही लोगों को अपना घर आश्रम में लाकर उनकी सेवा की जाती है और उन्हें प्रभुजी का संबोधन दिया जाता है ताकि सेवा आनंद से भर जाए।