शिवपुरी के जंगलों में चातुर्मास कर चुके जंगल वाले बाबा समाधि मरण की ओर,अपनी जन्म भूमि पर करेंगें संथारा | Shivpuri News

शिवपुरी। मृत्यु को कैसे महोत्सव मनाया जाता है, इसे साकार रूप शिवपुरी में चातुर्मास कर चुके जंगल वाले बाबा प्रदान कर रहे हैं। अपनी जन्मस्थली जुगुल जो कि कर्नाटक के बेलगांव जिले में स्थित है वहीं वह इन दिनों समाधि मरण की ओर अग्रसर हैं। समाधि मरण का अर्थ है स्वेच्छा से होशपूर्वक मृत्यु का वरण।

19 सितम्बर 2019 से आहार का त्याग कर चुके जंगल वाले बाबा कहते हैं कि यह उनकी शरीर की अंतिम यात्रा नहीं है बल्कि  संसार की अंतिम यात्रा है। जंगल वाले बाबा ने पिछले पांच दिन से जल का भी त्याग कर दिया है और पुस्तकों को भी छोड़ दिया है।

जंगल वाले बाबा, जिन्हें संत चिन्मय सागर जी महाराज के नाम से भी जाना जाता है, उनके दर्शनों हेतु देश भर से श्रृद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ रहा है। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री ने जुगुल पहुंचकर महाराज श्री के दर्शन कर उनसे आशीर्वाद लिया और घोषणा की कि कर्नाटक सरकार जुगुल ग्राम में महाराज श्री की समाधि बनवाएगी।

जंगल वाले बाबा उर्फ चिन्मय सागर जी महाराज ने वर्ष 2010 में शिवपुरी में झांसी रोड़ पर स्थित घनघोर जंगल में चातुर्मास किया था। उन्होंने भगवान महावीर को मंदिरों से निकालकर जन जन से जोड़ा था और शिवपुरी में महाराज श्री की प्रेरणा से हजारों लोगों ने व्यसन मुक्ति से तौबा की थी।

जंगल में महाराज श्री जहां तपस्या करते थे वहां जंगली जानवर बिना किसी  भय के विचरण करते थे। उनकी तपस्थली पर शिवपुरी में अक्सर उनके नजदीक एक हिरण देखा जाता था। गंभीर रूप से बीमार होने के बाद भी जंगल वाले बाबा हजारों मील का पद विहार कर चातुर्मास करते थे।

जंगल वाले बाबा ने आचार्य विद्यासागर जी से दीक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने दीक्षा 1988 में सोनागिर जैन तीर्थ में ली थी और समाधि मरण जुगुल में कर रहे हैं। जंगल वाले बाबा को कलियुग का महावीर स्वामी भी कहा जाता है।