कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की चाणक्य जोड़ी का शिकार हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया | SHIVPURI NEWS

शिवपुरी। राजनीति भी अजब उलटबांसी का खेल है। किस तरह से ऊपर चढ़ाकर मात दी जा सकती है यह सिर्फ राजनीति में ही संभव है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांगे्रस आलाकमान ने दिसम्बर में होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमेन नियुक्त किया है।

यह नियुक्ति काफी अहम  मानी जाती है, लेकिन इस नियुक्ति के सहारे पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़़ से बाहर कर दिया गया है। हालांकि प्रदेश सरकार में कमलनाथ खेमे के मंत्री सुखदेव पांसे का कहना है कि महराष्ट्र चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमेन बनने से सिंधिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ से बाहर नहीं माने जा सकते, लेकिन जानकारों का कहना है कि स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमेन बनने के बाद सिंधिया तीन माह तक प्रदेश की राजनीति से दूर रहेंगे।

ऐसे में प्रदेश कांग्रेस संगठन का कामकाज प्रभावित होना स्वाभाविक है। इसलिए यह तय है कि सिंधिया अब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनेंगे। जिस दिन सिंधिया को महाराष्ट्र चुनाव के लिए स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमेन बनाया गया। उस दिन मुख्यमंत्री कमलनाथ भी भोपाल में थे और यह माना जा रहा है कि इस बार भी सिंधिया कमलनाथ और दिग्विजय सिंह की चाणक्य जोड़ी का शिकार बने हैं। सिंधिया समर्थक सिंधिया को स्क्रीनिंग कमेटी का चेयरमेन बनाए जाने के फैसले से नाखुश हैं।

प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री कमलनाथ, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया बड़े नेताओं  में माने जाते हैं।  लेकिन प्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के बाद सिंधिया कांग्रेस में लगातार हांशिए पर है। प्रदेश में 15 साल बाद कांग्रेस की सरकार बनाने में ज्योतिरादित्य सिंधिया की अहम भूमिका रही।

चुनाव अभियान समिति के चेयरमेन के रूप में उन्होंने प्रदेश में कांग्रेस सरकार को जिताने के लिए जीतोड़ मेहनत की। आशा थी कि सत्ता में आने के बाद सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा, क्योंकि  अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी कमलनाथ संभाले हुए थे। चुनाव में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत से बालिश्त भर पीछे रह गई।

कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ने सपा, बसपा और कुछ निर्दलीय विधायकों को जोड़कर किसी तरह बहुमत प्राप्त कर लिया। मुख्यमंत्री पद चुनने की नौबत आई तो स्पष्ट रूप से कमलनाथ और सिंधिया दो दावेदार थे और दोनों दावेदारों की राहुल दरबार में पेशी हुई। जहां तय किया गया कि न केवल मुख्यमंत्री कमलनाथ रहेंगे बल्कि लोकसभा चुनाव नजदीक हैं इसलिए प्रदेशाध्यक्ष की जिम्मेदारी भी उन पर पूर्व की तरह बनी रहेगी।

सिंधिया को  भरोसा दिलाया गया कि केंद्र में सत्ता आने पर उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी। कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्दू ने तो बयान दिया था कि केंद्र में राहुल गांधी के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया नम्बर 2 रहेंगे, लेकिन लोकसभा चुनाव में न केवल कांंग्रेस  बुरी तरह पराजित हुई बल्कि सिंधिया स्वयं चुनाव हार गए।

इसके बाद ही कांग्रेस राजनीति में उनके विरोधियों के हौंसले बुलंद हो गए। शासन और प्रशासन पर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह का दबदबा लगातार बढ़ता गया। सिंधिया की इच्छा के विपरीत प्रदेश में नियुक्तियां की गईं। राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद कांग्रेस में सिंधिया और अधिक कमजोर हो गए।

इसके बाद सिंधिया ने धारा 370 के मुद्दे पर पार्टी लाइन के विपरीत बयान देकर नरेंद्र मोदी का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया। इससे भी उनकी स्थिति कमजोर हुई। पार्टी अध्यक्ष पद चुनने के बाद जब चली तो पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और महाराष्ट्र कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने युवा कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की मांग की।

मिलिंद देवड़ा ने तो स्पष्ट रूप से कहा कि सिंधिया या सचिन पायलट को यह अहम जिम्मेदारी दी जाए। त्रिपुरा कांग्रेस कमेटी ने तो एआईसीसी की बैठक में सिंधिया को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा, लेकिन प्रदेश कांग्रेस के किसी भी नेता ने सिंधिया के नाम की पैरवी नहीं की। राजनैतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एक सोची समझी रणनीति के तहत सिंधिया के कद का लगातार अवमूल्यन करने का प्रयास चल रहा है।

प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ और दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवद्र्धन सिंह युवा है तथा जब भी किसी युवा को जिम्मेदारी मिलने की बात होगी तो सिंधिया के मुकाबले दोनों कमतर माने जाएंगे। इसलिए ङ्क्षसंधिया को प्रदेश की राजनीति से बाहर करने का एक तरह से पार्टी के भीतर ही सुनिश्चित रूप से षडय़ंत्र चल रहा है। इस समय प्रदेश में कांग्रेस अध्यक्ष पद नियुक्ति की प्रक्रिया चल रही है।

प्रदेश कांग्रेस प्रभारी दीपक बावरिया पार्टी कार्यकर्ताओं विधायकों और मंत्रियों आदि से चर्चा कर चुके हैं तथा उन्होंने बयान भी दिया है कि प्रदेशाध्यक्ष पद की दौड़ में पहले 10-12 नाम थे, लेकिन अब महज 3 या 4 नाम रह गए हैं इनमें सिंधिया का नाम भी है, लेकिन इसके बाद अचानक सिंधिया को महाराष्ट्र चुनाव के लिए स्क्र्रीनिंग कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त  कर दिया गया और यह माना जा रहा है कि यह नियुक्ति उन्हें प्रदेशाध्यक्ष पद की ताजपोशी से रोकने के लिए है। इसलिए सिंधिया समर्थक इस नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं।