भोपाल। शिवपुरी-श्योपुर जिले की सीमा पर स्थित कूनो नेशनल पार्क अब चीतो के रहने का ठिकाना नहीं रहा बल्कि एक विश्व स्तर पर जीन लैब की प्रयोगशाला बन चुका है। कूनो में मेक इन इंडिया अर्थात सुपर चीता की धूम है। कूनो में चल रहे प्रोजेक्ट चीता के तहत नामीबिया, दक्षिण अफ्रीका और जल्द ही बोत्सवाना के चीतों के मिलन से कुल 6 अलग-अलग जीन पुल तैयार किए जा रहे हैं। वर्तमान में कूनो के खुले जंगलों में खेल रहे 9 शावक इसी सफल प्रयोग की पहली सीढ़ी हैं, जो नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका की ब्लडलाइन के मिश्रण से जन्मे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों वाले इन देशों के जीन मिलने से भारतीय मूल के चीते भविष्य में अधिक मजबूत, रोग-प्रतिरोधी और स्थानीय माहौल में रचने-बसने वाले होंगे। कूनो के मुख्य वन संरक्षक (CCF) उत्तम कुमार शर्मा के अनुसार, बिना मानवीय हस्तक्षेप के खुले जंगल में हो रहा प्राकृतिक प्रजनन इस प्रोजेक्ट की ऐतिहासिक सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
फिलहाल कूनो में जो 9 भारतीय मूल के चीते हैं, वे नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका की ब्लडलाइन के मिश्रण से बने पहले सफल जीन पुल का हिस्सा माने जा रहे हैं। यह तीसरी पीढ़ी है, जो भारत में जन्मी और स्थानीय परिस्थितियों में पनप रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, तीन अलग-अलग देशों के चीतों के बीच जब प्रजनन होता है, तो उससे कई तरह के जीन कॉम्बिनेशन बनते हैं।
कूनो में भी जहां नामीबिया +दक्षिण अफ्रीका, नामीबिया+ बोत्सवाना, दक्षिण अफ्रीका +बोत्सवाना और इनका मल्टी-लेयर मिश्रण मिलकर कुल 6 संभावित जीन पुल तैयार करेंगे। अभी जो जीन पुल जमीन पर दिख रहा है, वह नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के चीतों के मेल से बना है। बोत्सवाना के जीन के जुड़ने के बाद बाकी जीन पुल भी विकसित होंगे, जिससे भारतीय चीता आबादी और ज्यादा विविध व मजबूत बनेगी।
कूनो में आए चीतों की भौगोलिक पृष्ठभूमि भी अलग-अलग है नामीबिया के शुष्क क्षेत्र, दक्षिण अफ्रीका के घास के मैदान और बोत्सवाना का विविध पारिस्थितिकी तंत्र। इन सभी के जीन के मिश्रण से तैयार हो रही नई पीढ़ी में बेहतर अनुकूलन क्षमता, रोग प्रतिरोधकता और जीवित रहने की संभावना बढ़ रही है। में भी यही प्रक्रिया शुरू हो चुकी है,
खुले जंगल में शाक्कों का जन्म, जीन पुल की बढ़ी सफलता
अधिकारियों अधिकारियों के मुताबिक, खुले जंगल में हो रहा प्राकृतिक प्रजनन इस प्रक्रिया को और मजबूती दे रहा है। KGP-2 जैसी मादाओं द्वारा बिना मानवीय हस्तक्षेप के शावकों को जन्म देना इस बात का संकेत है कि जीन पुल अब व्यवहारिक रूप से स्थापित हो रहा है। वर्तमान में कुनो में 54 चीते हैं, जबकि देश में इनकी संख्या 57 तक पहुंच चुकी है। इनमें भारतीय मूल के चीतों की बढ़ती संख्या यह दर्शाती है कि प्रोजेक्ट अब आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। सबसे अहम बात यह है कि यदि यह मॉडल सफल रहता है, तो भविष्य में भारत न सिर्फ चीतों का संरक्षण केंद्र रहेगा, बल्कि एक संभावित जीन सोर्स बनकर अन्य देशों को भी चीते उपलब्ध करा सकता है।
प्रोजेक्ट सफलः चीता प्रोजेक्ट कुनो में पूरी तरह से सफल है। इससे बेहतर सफलता नहीं हो सकती कि, भारत में सबसे कम उम्र में मादा चीता न सिर्फ गर्भधारण कर रही है, बल्कि सफल प्रजनन भी कर रही है, वह भी खुले जंगल में, यह नए जीन पुल की बढ़ी सफलता है, जो पूरी तरह से भारतीय हैं। -
उत्तम कुमार शर्मा, सीसीएफ कूनो नेशनल पार्क
क्या होता है जीन पुल
जब अलग-अलग क्षेत्रों या देशों के जीव आपस में प्रजनन करते हैं, तो उनकी अगली पीढ़ी में जीन का मिश्रण होता है। इससे जेनेटिक विविधता बढ़ती है, जो प्रजाति को ज्यादा मजबूत, अनुकूल और रोग प्रतिरोधी बनाती है।
इसलिए खास है कूनो मॉडल
ओपन जंगल में प्राकृतिक प्रजनन।
तीन देशों के जीन का संगम।
तेजी से बढ़ती स्वदेशी आबादी।