शिवपुरी। विद्या भारती मध्यभारत प्रांत की योजनान्तर्गत सरस्वती शिशु मंदिर गणेश कॉलोनी (विद्यापीठ परिसर), शिवपुरी में बसंत पंचमी के पावन पर्व पर विद्यारंभ संस्कार का आयोजन पूर्ण वैदिक विधि-विधान के साथ किया गया। इस अवसर पर वेद पूजन एवं ग्यारह कुंडीय यज्ञ के माध्यम से 3 से 5 वर्ष आयु वर्ग के शिशुओं का विद्यारंभ संस्कार संपन्न कराया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि महंत श्री अरुण जी शर्मा (श्री मंशापूर्ण हनुमान जी मंदिर) रहे, जबकि मुख्य वक्ता श्री लोकेंद्र सिंह मेवाड़ा, प्राचार्य सरस्वती विद्यापीठ आवासीय विद्यालय रहे।
कार्यक्रम का श्रीगणेश अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती के पूजन, सरस्वती वंदना एवं वेद पूजन के साथ हुआ। मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित करते हुए महंत श्री अरुण जी शर्मा ने कहा कि भारतीय जीवन दर्शन में मनुष्य की जीवन यात्रा जन्म से मृत्यु तक निरंतर चलती है। इस यात्रा में जीवन को सुखमय एवं संतुलित बनाने हेतु ऋषि-मुनियों द्वारा निर्धारित विधि-विधानों को संस्कार कहा गया है। शास्त्रों में वर्णित सोलह संस्कारों में से विद्यारंभ संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि विद्यारंभ संस्कार शिशुओं में दिव्य संस्कारों का बीजारोपण करता है। यह संस्कार बालक को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का बोध कराता है। विद्यारंभ संस्कार बालक में अध्ययन के प्रति उत्साह उत्पन्न करने के साथ-साथ अभिभावकों एवं शिक्षकों को उनके पवित्र दायित्वों के प्रति भी जागरूक करता है। आधुनिक समाज में विलुप्त होती जा रही हमारी सनातन संस्कृति एवं संस्कारों को पुनः सहेजने का कार्य ऐसे आयोजनों के माध्यम से संभव है। उन्होंने कहा कि माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस पर आयोजित यह संस्कार हमारी भावी पीढ़ी को सनातन संस्कृति का वाहक बनाएगा—यही विद्या भारती का उद्देश्य है।
मुख्य वक्ता श्री लोकेंद्र सिंह मेवाड़ा ने अपने संबोधन में कहा कि बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, विद्या, विवेक और संस्कार की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के प्रकट उत्सव का दिव्य अवसर है। माँ सरस्वती का श्वेत वस्त्र धारण करना पवित्रता और सात्त्विकता का प्रतीक है तथा उनकी वीणा यह संदेश देती है कि ज्ञान जीवन के सुरों में भी समाहित होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी का दिन विद्यारंभ संस्कार के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। यह वह पावन क्षण है जब बालक औपचारिक रूप से ज्ञान के पथ पर प्रथम कदम रखता है। उन्होंने कहा—"सा विद्या या विमुक्तये" अर्थात वही विद्या सच्ची है, जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और अधर्म से मुक्त करे। शिक्षा केवल रोजगार का साधन न होकर चरित्र निर्माण, राष्ट्र निर्माण एवं मानव निर्माण का माध्यम बने-यही विद्यारंभ संस्कार का मूल उद्देश्य है।
कार्यक्रम की भूमिका एवं आभार विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमती श्वेता श्रीवास्तव ने व्यक्त किया। मंचस्थ अतिथियों का परिचय सुश्री सलोनी जादौन ने कराया, स्वागत श्री अरविन्द सविता द्वारा किया गया तथा कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती उमा दुबे ने किया। इस अवसर पर श्री मदन लाल शर्मा द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विद्यारंभ संस्कार संपन्न कराया गया। कार्यक्रम में विद्यालय परिवार, नगर के गणमान्य नागरिक एवं पत्रकार गण उपस्थित रहे।
कार्यक्रम का श्रीगणेश अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलन, माँ सरस्वती के पूजन, सरस्वती वंदना एवं वेद पूजन के साथ हुआ। मुख्य अतिथि की आसंदी से संबोधित करते हुए महंत श्री अरुण जी शर्मा ने कहा कि भारतीय जीवन दर्शन में मनुष्य की जीवन यात्रा जन्म से मृत्यु तक निरंतर चलती है। इस यात्रा में जीवन को सुखमय एवं संतुलित बनाने हेतु ऋषि-मुनियों द्वारा निर्धारित विधि-विधानों को संस्कार कहा गया है। शास्त्रों में वर्णित सोलह संस्कारों में से विद्यारंभ संस्कार अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि विद्यारंभ संस्कार शिशुओं में दिव्य संस्कारों का बीजारोपण करता है। यह संस्कार बालक को केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देता, बल्कि श्रेष्ठ जीवन मूल्यों का बोध कराता है। विद्यारंभ संस्कार बालक में अध्ययन के प्रति उत्साह उत्पन्न करने के साथ-साथ अभिभावकों एवं शिक्षकों को उनके पवित्र दायित्वों के प्रति भी जागरूक करता है। आधुनिक समाज में विलुप्त होती जा रही हमारी सनातन संस्कृति एवं संस्कारों को पुनः सहेजने का कार्य ऐसे आयोजनों के माध्यम से संभव है। उन्होंने कहा कि माँ सरस्वती के प्राकट्य दिवस पर आयोजित यह संस्कार हमारी भावी पीढ़ी को सनातन संस्कृति का वाहक बनाएगा—यही विद्या भारती का उद्देश्य है।
मुख्य वक्ता श्री लोकेंद्र सिंह मेवाड़ा ने अपने संबोधन में कहा कि बसंत पंचमी केवल ऋतु परिवर्तन का पर्व नहीं, बल्कि ज्ञान, विद्या, विवेक और संस्कार की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती के प्रकट उत्सव का दिव्य अवसर है। माँ सरस्वती का श्वेत वस्त्र धारण करना पवित्रता और सात्त्विकता का प्रतीक है तथा उनकी वीणा यह संदेश देती है कि ज्ञान जीवन के सुरों में भी समाहित होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बसंत पंचमी का दिन विद्यारंभ संस्कार के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है। यह वह पावन क्षण है जब बालक औपचारिक रूप से ज्ञान के पथ पर प्रथम कदम रखता है। उन्होंने कहा—"सा विद्या या विमुक्तये" अर्थात वही विद्या सच्ची है, जो मनुष्य को अज्ञान, अहंकार और अधर्म से मुक्त करे। शिक्षा केवल रोजगार का साधन न होकर चरित्र निर्माण, राष्ट्र निर्माण एवं मानव निर्माण का माध्यम बने-यही विद्यारंभ संस्कार का मूल उद्देश्य है।
कार्यक्रम की भूमिका एवं आभार विद्यालय की प्रधानाचार्या श्रीमती श्वेता श्रीवास्तव ने व्यक्त किया। मंचस्थ अतिथियों का परिचय सुश्री सलोनी जादौन ने कराया, स्वागत श्री अरविन्द सविता द्वारा किया गया तथा कार्यक्रम का सफल संचालन श्रीमती उमा दुबे ने किया। इस अवसर पर श्री मदन लाल शर्मा द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के साथ विद्यारंभ संस्कार संपन्न कराया गया। कार्यक्रम में विद्यालय परिवार, नगर के गणमान्य नागरिक एवं पत्रकार गण उपस्थित रहे।