मुनिश्री दर्शितसागर जी महाराज का दीक्षा दिवस, गुरु उपकार दिवस के रूप में मनेगा- Shivpuri News

शिवपुरी। जिन्होंने हमेशा आदर्श जीवन की परिकल्पना को साकार किया हो, जो सदैव दूसरों के जीवन में बदलाव लाकर उनके जीवन को नई दिशा दिखाने को कार्य करें, एक आदर्श व्यक्तित्व की पहचान और उसे जन-जन तक पहुचाने का कार्य अपने आदर्श कार्यों से करें, ऐसे आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज ही थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में सदैव दूसरों के परोपकार के लिए कार्य किए और वह सदैव सभी की चिर-स्मृतियों में समाहित है, ऐसे महान आचार्य श्री शांति सागर जी महाराज के जीवन से हम भी अपने जीवन में सुधार लाऐं इसका प्रयास करना चाहिए।

आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन वृतान्त संस्मरण कराने के बाद जीवन में बदलाव लाने का यह मार्ग प्रशस्त किया प.पू.मुनिश्री सुप्रभसागर जी महाराज ने जो स्थानीय श्री दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित चार्तुमास के दौरान मनाए जा रहे आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज के व्यक्तित्व परिचर्चा कार्यक्रम के माध्यम से उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित कर रहे थे।

वक्ताओं ने आचार्यश्री शंतिसागर जी महाराज के जीवन पर दिया व्यक्तित्व परिचय

कार्यक्रम में आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज के जीवन पर आधारित व्यक्तित्व परिचर्चा को लेकर वक्ताओं ने अपने विचारों के माध्यम से आचार्यश्री का स्मरण किया जिसमें आचार्य श्रीजी के गृहस्थ जीवन पर वक्ता श्रीमती सीमा प्रमोद जैन के द्वारा प्रकाश डालते हुए बताया कि 9 वर्ष की आयु में आचार्यश्री के वैवाहिक जीवन की शुरूआत गृहस्थ आश्रम के रूप में हुई, आचार्यश्री का व्यक्तित्व परिचय था कि उनके साथ रहने वाला उनका मित्र भी इतना प्रभावित हुआ कि उन्होंने भी छानकर पानी पीने और एक समय भोजन का संकल्प लिया, आचार्यश्री कपड़े का व्यापार करते थे और खेती भी थी सदैव दयाभाव रखते थे उनका गृहस्थ जीवन अल्पसमय ही चला।

वंश परंपरा एवं माता-पिता एवं परिजन पर वक्तव्य दिया कु स्वाति जैन ने जिन्होंने बताया कि आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज 1929 में जन्मे और शांतिसागर के रूप में विख्यात हुए, वह क्षत्रिय वंशी थे बाबजूद इसके संत बनने के बाद उन्होंने जैन समाज को गौरान्वित किया, कभी भी जीवन में उन्होंने बेईमानो को स्थान नही दिया, एक समय ऐसा भी आया जब एक बार किसी को दंड दिया तो उदारता का परिचय देते हुए दंड की राशि भी स्वयं की ओर से दी गई, आचार्यश्री सामर्थयवान थे उन्होंने तीर्थो की वंदना की, आचाार्यश्री के माता-पिता और परिजन भी उनके व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सदैव अपना सहयोग प्रदान किया और उनके आगे बढ़ते जीवन को कभी रोका नहीं।

क्षुलल्क, ऐलक, मुनि दीक्षा पर श्रीमती मीरा पुरूषोत्तम जैन ने वक्तव्य देते हुए कहा कि आचार्यश्री शांतिसागर जी महाराज दीक्षा को यूं समझिए कि जब दी जाती है तब आध्यत्म रूप से मानव का कल्याण होता है और वह भगवान की शरणागत में जाता है, जीवो का कल्याण हो वही दीक्षा है, श्रावक को परखकर ही दीक्षा मिलती है, परिवार से अनुमति लेना जरूरी है यह सभी गुण आचार्यश्री में विद्यमान थे और यही वजह है कि वह क्षुल्लक, ऐलक, मुनिदीक्षा के साथ मोक्ष के मार्ग के मार्गदर्शक बने और अनेकों शिष्य उनके अनुयायी रहे।

आगम परंपरा पर इंदौर से आए सुरेश मारौरा के द्वारा वक्तव्य दिया गया उन्होंने बताया कि आज से 98 वर्ष पूर्व आगम परंपरा की शुरूआत हुई, आचार्य श्री शांतिसागर महाराज ने ही मुनि परंपरा को जीवित किया और वही इसके संवाहक भी बने।

मुनिश्री दर्शितसागर जी महाराज का दीक्षा दिवस आज, गुरु उपकार दिवस के रूप में मनेगा

चारित्र चक्रवर्ती प्रथमाचार्य श्री 108 शांतिसागर जी महाराज के व्यक्तित्व परिचर्चा कार्यक्रम में आज 7 अक्टूबर शुक्रवार को श्री दिगम्बर जैन छत्री मंदिर परिसर में चार्तुमास कर रहे मुनिश्री दर्शितसागर जी महाराज का दीक्षा दिवस श्री दिगम्बर जैन समाज के द्वारा गुरू उपकार दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

इसके साथ ही प्रात: 8:10 बजे मुनिश्री दर्शितसागर जी के 7 वें गुरू उपकार दिवस पर पू.पू.आ.श्री वर्धमान सागर जी का संगीतमय महापूजन होगा तत्पश्चात मुनिद्वय के पादप्रक्षाल, शास्त्रदान एवं परिचर्चा का प्रारंभ किया जाएगा। व्यक्तित्व परिचर्चा कार्यक्रम में आचार्य श्री शांतिसागर महाराज के जीवन पर आचार्य श्री जी का उत्तर भारत में विहार, चार्तुमास की विशेषताएं, आचार्य श्री जी द्वारा प्रदत्त मुनि आर्यिका क्षुल्लक एवं क्षुल्लिका दीक्षा का वर्णन, आचार्य श्री जी की पट्टी परम्परा एवं वर्तमान में प्रमुख संघ व अंत में मुनिद्वय के प्रवचन होंगें।