भगवान शिव ने माता पार्वती को मनाने किया था यह व्रतः रविवार को हैं संकष्टी चतुर्थी, पढिए पूरी व्रत कथा

शिवपुरी। भगवान शिव ने माता पार्वती को मनाने के लिए यह संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया था। हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार यह व्रत मानव के संकट को दूर करता हैं। 31 जनवरी को साल की दूसरी संकष्टी चतुर्थी हैं।

संकष्टी चतुर्थी हिन्दू धर्म का एक प्रसिद्ध त्यौहार है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की जाती है। भगवान गणेश को अन्य सभी देवी.देवतों में प्रथम पूजनीय माना गया है। इन्हें बुद्धिए बल और विवेक का देवता का दर्जा प्राप्त है।

भगवान गणेश अपने भक्तों की सभी परेशानियों और विघ्नों को हर लेते हैं इसीलिए इन्हें विघ्नहर्ता और संकटमोचन भी कहा जाता है। वैसे तो हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए ढेरों व्रत-उपवास आदि किए जाते हैंए लेकिन भगवान गणेश के लिए किए जाने वाला संकष्टी चतुर्थी व्रत काफी प्रचलित है। आईये जानते हैं संकष्टी चतुर्थी के बारे में विस्तार से

क्या है संकष्टी चतुर्थी
संकष्टी चतुर्थी का मतलब होता है संकट को हरने वाली चतुर्थी। संकष्टी संस्कृत भाषा से लिया गया एक शब्द है, जिसका अर्थ होता हैं कठिन समय से मुक्ति पाना।

इस दिन व्यक्ति अपने दुःखों से छुटकारा पाने के लिए गणपति की अराधना करता है। पुराणों के अनुसार चतुर्थी के दिन गौरी पुत्र गणेश की पूजा करना बहुत फलदायी होता है। इस दिन लोग सूर्योदय के समय से लेकर चन्द्रमा उदय होने के समय तक उपवास रखते हैं। संकष्टी चतुर्थी को पूरे विधि-विधान से गणपति की पूजा.पाठ की जाती है।

कब है संकष्टी चतुर्थी
संकष्टी चतुर्थी कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के चैथे दिन मनाई जाती है। हिन्दू पंचांग के अनुसार चतुर्थी हर महीने में दो बार आती है जिसे लोग बहुत श्रद्धा से मनाते हैं। पूर्णिमा के बाद आने वाली चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी कहते हैं। अब 31 जनवरी रविवार के दिन यह तिथि आ रही हैं,इस दिन लोग बडी ही श्रद्धा पूर्वक इस व्रत को करेंगें।

वहीं अमावस्या के बाद आने वाली चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। संकष्टी चतुर्थी को भगवान गणेश की आराधना करने के लिए विशेष दिन माना गया है। शास्त्रों के अनुसार माघ माह में पड़ने वाली पूर्णिमा के बाद की चतुर्थी बहुत शुभ होती है। यह दिन भारत के उत्तरी और दक्षिणी राज्यों में ज्यादा धूम.धाम से मनाया जाता है।

संकष्टी चतुर्थी के अलग.अलग नाम
भगवान गणेश को समर्पित इस त्यौहार में श्रद्धालु अपने जीवन की कठिनाईओं और बुरे समय से मुक्ति पाने के लिए उनकी पूजा.अर्चना और उपवास करते हैं। संकष्टी चतुर्थी को कई अलग.अलग नामों से भी जाना जाता है।

कई जगहों पर इसे संकट हारा कहते हैं तो कहीं.कहीं सकट चैथ भी। यदि किसी महीने में यह पर्व मंगलवार के दिन पड़ता है तो इसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है। अंगारकी चतुर्थी 6 महीनों में एक बार आती है और इस दिन व्रत करने से जातक को पूरे संकष्टी का लाभ मिल जाता है।

दक्षिण भारत में लोग इस दिन को बहुत उत्साह और उल्लास से मनाते हैं। कहा जाता है कि इस दिन भगवान गणेश का सच्चे मन से ध्यान करने से व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं और जातक को विशेष लाभ की प्राप्ति होती है।

संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
गणपति में आस्था रखने वाले लोग इस दिन उपवास रखकर उन्हें प्रसन्न कर अपने मनचाहे फल की कामना करते हैं।
● इस दिन आप प्रातः काल सूर्योदय से पहले उठ जाएँ।
● व्रत करने वाले लोग सबसे पहले स्नान कर साफ और धुले हुए कपड़े पहन लें। इस दिन लाल रंग का वस्त्र धारण करना बेहद शुभ माना जाता है और साथ में यह भी कहा जाता है कि ऐसा करने से व्रत सफल होता है।
● स्नान के बाद वे गणपति की पूजा की शुरुआत करें। गणपति की पूजा करते समय जातक को अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखना चाहिए।
● सबसे पहले आप गणपति की मूर्ति को फूलों से अच्छी तरह से सजा लें।
● पूजा में आप तिल, गुड़, लड्डू, फूल ताम्बे के कलश में पानी , धुप, चन्दन, प्रसाद के तौर पर केला या नारियल रख लें।
● ध्यान रहे कि पूजा के समय आप देवी दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति भी अपने पास रखें। ऐसा करना बेहद शुभ माना जाता है।
● गणपति को रोली लगाएं, फूल और जल अर्पित करें।
● संकष्टी को भगवान् गणपति को तिल के लड्डू और मोदक का भोग लगाएं।
● गणपति के सामने धूप.दीप जला कर निम्लिखित मन्त्र का जाप करें।

गजाननं भूत गणादि सेवितं कपित्थ जम्बू फल चारू भक्षणम्।
उमासुतं शोक विनाशकारकम् नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्।।

● पूजा के बाद आप फल, मूंगफली, खीरए दूध या साबूदाने को छोड़कर कुछ भी न खाएँ। बहुत से लोग व्रत वाले दिन सेंधा नमक का इस्तेमाल करते हैं लेकिन आप सेंधा नमक नजरअंदाज करने की कोशिश करें।

● शाम के समय चांद के निकलने से पहले आप गणपति की पूजा करें और संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें।

● पूजा समाप्त होने के बाद प्रसाद बाटें। रात को चाँद देखने के बाद व्रत खोला जाता है और इस प्रकार संकष्टी चतुर्थी का व्रत पूर्ण होता है।

संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
संकष्टी चतुर्थी मनाने के पीछे ढेरों पौराणिक कथाएं हैं लेकिन उन सबमें जो सबसे ज्यादा प्रचलित है, हम आपको वह कथा बताने जा रहे हैं।

एक बार माता पार्वती और भगवान शिव नदी के पास बैठे हुए थे तभी अचानक माता पार्वती ने चैपड़ खेलने की अपनी इच्छा जाहिर की। लेकिन समस्या की बात यह थी कि वहां उन दोनों के अलावा तीसरा कोई नहीं था जो खेल में निर्णायक की भूमिका निभाए।

इस समस्या का समाधान निकालते हुए शिव और पार्वती ने मिलकर एक मिट्टी की मूर्ति बनाई और उसमें जान डाल दी। मिट्टी से बने बालक को दोनों ने यह आदेश दिया कि तुम खेल को अच्छी तरह से देखना और यह फैसला लेना कि कौन जीता और कौन हारा। खेल शुरू हुआ जिसमें माता पार्वती बार.बार भगवान शिव को मात दे कर विजयी हो रही थीं।

खेल चलते रहा लेकिन एक बार गलती से बालक ने माता पार्वती को हारा हुआ घोषित कर दिया। बालक की इस गलती ने माता पार्वती को बहुत क्रोधित कर दिया जिसकी वजह से गुस्से में आकर बालक को श्राप दे दिया और वह लंगड़ा हो गया।

बालक ने अपनी भूल के लिए माता से बहुत क्षमा मांगे और उसे माफ कर देने को कहा। बालक के बार.बार निवेदन को देखते हुए माता ने कहा कि अब श्राप वापस तो नहीं हो सकता लेकिन वह एक उपाय बता सकती हैं जिससे वह श्राप से मुक्ति पा सकेगा। माता ने कहा कि संकष्टी वाले दिन पूजा करने इस जगह पर कुछ कन्याएं आती हैं, तुम उनसे व्रत की विधि पूछना और उस व्रत को सच्चे मन से करना।

बालक ने व्रत की विधि को जान कर पूरी श्रद्धापूर्वक और विधि अनुसार उसे किया। उसकी सच्ची आराधना से भगवान गणेश प्रसन्न हुए और उसकी इच्छा पूछी। बालक ने माता पार्वती और भगवान शिव के पास जाने की अपनी इच्छा को जाहिर किया।

गणेश ने उस बालक की मांग को पूरा कर दिया और उसे शिवलोक पंहुचा दिया, लेकिन जब वह पहुंचा तो वहां उसे केवल भगवान शिव ही मिले। माता पार्वती भगवान शिव से नाराज होकर कैलाश छोड़कर चली गयी होती हैं।

जब शिव ने उस बच्चे को पूछा की तुम यहाँ कैसे आए तो उसने उन्हें बताया कि गणेश की पूजा से उसे यह वरदान प्राप्त हुआ है। यह जानने के बाद भगवान शिव ने भी पार्वती को मनाने के लिए उस व्रत को किया जिसके बाद माता पार्वती भगवान शिव से प्रसन्न हो कर वापस कैलाश लौट आती हैं।

इस कथा के अनुसार संकष्टी के दिन भगवान गणेश का व्रत करने से व्यक्ति की हर मनोकामना पूरी होती है।