शिवपुरी। गुना शिवपुरी संसदीय क्षेत्र में चार बार से जीत रहे पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की पराजय से सांसद के रूप में उनका मूल्यांकन किया जाना अनुचित होगा। 2001 से सांसद बनने के बाद वह अपने संसदीय क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहे हैं और क्षेत्र के लिए वह अनेक सौंगाते भी लाए हैं। इसलिए यह कहा जाना कि सांसद के रूप में वह अपनी जिम्मेदारी न निभाने के कारण पराजित हुए हैं, शायद उनके साथ अन्याय होगा।
उनकी ईमानदारी पर भी सवाल खड़े करना ठीक नहीं होगा। लेकिन इसके बाद भी वो पराजित हुए और उस स्थिति में जबकि उनके कट्टर से कट्टर विरोधी भी उनकी पराजय की कल्पना नहीं कर रहे थे। लोकसभा चुनाव में भले ही किसी मतदाता ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भाजपा को वोट दिया हो, लेकिन सभी के सुर एक थे कि जीतेंगे तो सिंधिया ही। यह इसलिए भी कहा जा रहा था कि सिंधिया के मुकाबले खड़े हुए भाजपा प्रत्याशी केपी सिंह संसदीय क्षेत्र के लोगों के लिए एक तरह से अजनबी थी और मुंगावली और अशोकनगर से अधिक उनकी कोई पहचान नहीं थी।
लेकिन इसके बाद भी भाग्य और मोदी लहर के सहारे भाजपा प्रत्याशी डॉ. केपी यादव की नैया पार हो गई और इस संसदीय क्षेत्र में आजादी के बाद से जो कभी नहीं हुआ था वह इस बार घटित हो गया। 14 बार गुना सीट पर कब्जा करने वाला सिंधिया परिवार पराजित हो गया। एक नए युग का सूत्रपात अवश्य हुआ, लेकिन जो एक नया दौर प्रारंभ हुआ है वह कितना आगे तक जाएगा यह एक बड़ा सवाल है।
प्रश्र यह है कि पराजय के बाद भी क्या सिंधिया का संसदीय क्षेत्र में पुनर्वास होगा यह कहना इतना आसान इसलिए भी नहीं है, क्योंकि फिलहाल सिंधिया की भी इस संसदीय क्षेत्र में रूचि नजर नहीं आ रही, लेकिन यदि वह सक्रिय भी हुए तो उनका पुनर्वास इस बात पर निर्भर करेगा कि निवार्चित सांसद केपी यादव का कार्यकाल कैसा रहा और उनकी सक्रियता को केंद्र में स्थापित भाजपा सरकार ने कितना मूल्य दिया है और वह अपने ससंदीय क्षेत्र के लिए एक सांसद के रूप में कितने उपयोगी साबित हो पाए।
गुना-शिवपुरी संसदीय क्षेत्र में सिंधिया परिवार की जड़े काफी गहरी और मजबूत रही हैं। सिंधिया परिवार के प्रति निष्ठा इतनी सघन रही है कि सांसद के रूप में उनके प्रतिनिधि का क्या परफॉर्मेंस रहा इस पर लंबे समय तक मतदाता ने विचार भी नहीें किया। राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने जहां 6 बार और उनके सुपुत्र स्व. माधवराव सिंधिया ने 4 बार विजयश्री हासिल की। राजमाता सिंधिया का संसदीय क्षेत्र के लिए क्या योगदान रहा?
वह अपने संसदीय क्षेत्र के लिए क्या उपलब्धि लेकर आईं। इसे शायद भाजपा नेता भी न बता पाएं। हालांकि उनके सुपुत्र स्व. माधवराव सिंधिया संसदीय क्षेत्र के लिए एक बड़ी सौगात लेकर आए। उनके प्रयासों से गुना-इटावा रेल लाइन का लाभ संसदीय क्षेत्र के नागरिकों को मिला और उनकी यह उपलब्धि सैंकड़ों विकास कार्यों से कहीं अधिक बढक़र रही। परंतु उनके सुपुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया में अपने संसदीय क्षेत्र के लिए विकास कार्यों को लाने की एक गहन रूचि रही।
लेकिन उनका दुर्भाग्य यह रहा कि उनकी राजनीति सक्रियता के बाद प्रदेश में कांग्रेस सत्ता में नहीं रही। इसका परिणाम यह हुआ कि वह केंद्र से जो भी उपलब्धि लेकर आए उसका क्रियान्वयन उनके संसदीय क्षेत्र में बहुत मंथर गति से हुआ। जिसके कारण जलावर्धन योजना, सीवेज प्रोजेक्ट, सडक़ों का निर्माण आदि में विलंब के लिए उन्हें दोषी ठहराया गया। जिसके कारण संसदीय क्षेत्र में उनके प्रति नाराजी बढ़ी और उनके खिलाफ एक माहौल बना।
लेकिन इस माहौल की सघनता देखने में इतनी गंभीर नहीं लग रही थी जिसकी वजह से सिंधिया को पराजित होना पड़े, लेकिन मोदी लहर से भाजपा प्रत्याशी केपी यादव चुनाव जीत गए। लेकिन अगले पांच साल में उनका कार्यकाल कैसा रहेगा यह निर्धारित करेगा कि सिंधिया की इस संसदीय क्षेत्र में वापसी होती है अथवा नहीं। फिलहाल तो सांसद यादव की सक्रियता देखने को मिल रही है उनकी संवेदनशीलता के उदाहरण भी सामने आने लगे हैं।
आम व्यक्ति से उनकी नजदीकी भी उजागर हो गई है और सांसद जैसी विशिष्टता का बोझ ढोते हुए वह नहीं लग रहे हैं। वर्तमान में जिस ढंग से उन्हें चलना चाहिए और आगे बढऩा चाहिए वह नजर आ रहा है, लेकिन समय के साथ साथ उनकी यही गति रहेगी या इसमें बदलाव आएगा और उनके इर्द-गिर्द चाटुकार और चापलूसों का जमावड़ा इकट्ठा होगा या नहीं होगा इस पर बहुत कुछ पूर्व सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का पुनर्वास निर्भर करेगा।
अशोक कोचेटा,लेखक,समाज सेवी और वरिष्ठ पत्रकार और संपादक है।

