लीजिए, विकास के मसीहा, न्याय प्रिय, प्रजापालक, समर्थकों के हितरक्षक श्रीमंत! महाराजा! ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने वो आदमी आकर खड़ा हो गया जो कल तक दीवारों पर 'अबकी बार-सिंधिया सरकार' लिखवा रहा था। केपी यादव, यह भाजपा के प्रत्याशी का नाम नहीं है बल्कि 'श्रीमंत' की शिकस्त का नाम है। ऐसे कई उदाहरण और भी हैं परंतु केपी यादव बिल्कुल ताजा है। धुंआ निकल रहा है।
कौन है केपी यादव
भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता जिस व्यक्ति को गर्व के साथ 'डॉक्टर केपी यादव' पुकार रहे हैं, असल में यह वो व्यक्ति है जो पॉवर की चाह में ज्योतिरादित्य सिंधिया की चाटुकारिता का कीर्तिमान स्थापित करता था। विधानसभा चुनाव से पहले मुंगावली विधानसभा के गांव गांव की दीवारों पर 'अबकी बार-सिंधिया सरकार' लिखवा देने वाले व्यक्ति का नाम भी केपी यादव ही है। हालात यह थे कि खुद को सिंधिया का सबसे बफादार साबित करने के लिए केपी यादव ने हर वो जतन किए जो दूसरे नहीं कर पाए और जब विधानसभा चुनाव के लिए टिकट नहीं मिला तो यादव साहब बागी हो गए। भाजपा में शामिल हो गए और आज भाजपा से टिकट लाकर उस व्यक्ति के सामने आकर खड़े हो गए हैं, कल तक जिन्हे ये अपना भगवान बताया करते थे।
'श्रीमंत' की शिकस्त कैसे
केपी यादव भाजपा के प्रत्याशी का नाम नहीं है बल्कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की शिकस्त का नाम है।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया में व्यक्ति को परखने की क्षमता ही नहीं है।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को चाटुकारिता प्रिय है।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया लालची लोगों को प्रोत्साहित करते हैं।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी टीम पर भी नियंत्रण नहीं रख पाते।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया में आकर्षण नहीं है, लोग टूट रहे हैं।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के आसपास स्वार्थी तत्वों का मकड़जाल है।
यह प्रमाण है इस बात का कि ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद को इस तरह के लोगों से बचा नहीं पाते।
क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए वह क्षण पराजय से भी अधिक पीड़ादायक नहीं होगा जब केपी यादव उनके समकक्ष, उनके सामने, उनके विरुद्ध चुनाव मैदान में है। भले ही वो चुनाव हार जाए, परंतु उसने टिकट मांगा और स्वीकार किया। यही अपने आप में काफी है। यह कोई पहला उदाहरण नहीं है और 250 साल का अनुभव कहते है कि यह अंतिम भी नहीं है।
बात यह नहीं है कि केपी यादव विश्वासघाती है या अहसान फरामोश है, प्रश्न यह है कि मुंगावली के नेता को डॉक्टर केपी यादव बनाया किसने। क्यों ना यह विश्वास कर लिया जाए कि ज्योतिरादित्य सिंधिया एक ऐसे बिफल नेता हैं जो अपने प्रिय समर्थकों का चयन भी करने की क्षमता नहीं रखते। एक ऐसा अयोग्य नेता जिसके पास योग्य साथियों का भारी आभाव है। जो इतने सालों में अपने साथ योग्य समर्थकों का लश्कर तैयार नहीं कर पाए। और जो नेता अपनी टीम का चुनाव ही ठीक प्रकार से ना कर पाए, उससे क्या उम्मीद की जाए कि वो दूसरे विषयों में सही निर्णय ले पाएगा।

