कोलारस। शिवपुरी जिले के कोलारस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सोमवार को मानवता को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया। यहाँ मुकुंदपुरा भड़ोता निवासी 35 वर्षीय अनीता आदिवासी को तेज बुखार और लकवे जैसे लक्षणों के कारण दोपहर 1 बजे अस्पताल लाया गया था। लेकिन अस्पताल में डॉक्टरों की अनुपस्थिति और एंबुलेंस की लेटलतीफी के कारण महिला करीब दो घंटे तक मुख्य द्वार पर ही तड़पती रही।
डॉक्टरों की कमी और रेफर का खेल
परिजनों का आरोप है कि जब वे गंभीर स्थिति में महिला को लेकर पहुँचे, तो ओपीडी कक्षों में ताले लटके थे। ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सभी डॉक्टर शिवपुरी में आयोजित एक बैठक में गए हैं। उचित इलाज के अभाव में महिला की हालत बिगड़ती देख उसे शिवपुरी जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। हालांकि, शिवपुरी में भी स्थिति न सुधरने पर महिला को अंततः ग्वालियर रेफर करना पड़ा है।
एंबुलेंस के लिए घंटों इंतजार
अनीता के पति गजराज आदिवासी ने बताया कि आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन्होंने 108 एंबुलेंस को फोन किया था। करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार करने के बाद भी जब एंबुलेंस नहीं पहुँची, तो मजबूरन कर्ज लेकर निजी वाहन की व्यवस्था करनी पड़ी।
यह स्वास्थ्य केंद्र आसपास के 40 से 50 गांवों की लाइफ लाइन है, लेकिन स्टाफ की कमी और लापरवाही यहाँ आम बात हो गई है। चार महीने पहले भी एक प्रसूता को एंबुलेंस न मिलने पर ऑटो से घर जाना पड़ा था। ग्रामीणों का कहना है कि यहां मरीजों को देखने के बजाय सीधे रेफर करने की औपचारिकता निभाई जाती है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषिश्वर ने परिजनों के आरोपों को निराधार बताते हुए दावा किया कि डॉक्टर सुनील रावत ने मरीज को देखा था। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि 108 एंबुलेंस समय पर नहीं पहुँची और इसके लिए संबंधित कर्मचारियों को नोटिस जारी करने की बात कही है।
डॉक्टरों की कमी और रेफर का खेल
परिजनों का आरोप है कि जब वे गंभीर स्थिति में महिला को लेकर पहुँचे, तो ओपीडी कक्षों में ताले लटके थे। ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सभी डॉक्टर शिवपुरी में आयोजित एक बैठक में गए हैं। उचित इलाज के अभाव में महिला की हालत बिगड़ती देख उसे शिवपुरी जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। हालांकि, शिवपुरी में भी स्थिति न सुधरने पर महिला को अंततः ग्वालियर रेफर करना पड़ा है।
एंबुलेंस के लिए घंटों इंतजार
अनीता के पति गजराज आदिवासी ने बताया कि आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण उन्होंने 108 एंबुलेंस को फोन किया था। करीब डेढ़ घंटे तक इंतजार करने के बाद भी जब एंबुलेंस नहीं पहुँची, तो मजबूरन कर्ज लेकर निजी वाहन की व्यवस्था करनी पड़ी।
यह स्वास्थ्य केंद्र आसपास के 40 से 50 गांवों की लाइफ लाइन है, लेकिन स्टाफ की कमी और लापरवाही यहाँ आम बात हो गई है। चार महीने पहले भी एक प्रसूता को एंबुलेंस न मिलने पर ऑटो से घर जाना पड़ा था। ग्रामीणों का कहना है कि यहां मरीजों को देखने के बजाय सीधे रेफर करने की औपचारिकता निभाई जाती है।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. संजय ऋषिश्वर ने परिजनों के आरोपों को निराधार बताते हुए दावा किया कि डॉक्टर सुनील रावत ने मरीज को देखा था। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि 108 एंबुलेंस समय पर नहीं पहुँची और इसके लिए संबंधित कर्मचारियों को नोटिस जारी करने की बात कही है।