Shivpuri News- प्रशासन अशोक विहार कॉलोनी में मकान तोड़ने चला था उसके कागजात नहीं बता सका: हाईकोर्ट से राहत

शिवपुरी।
तहसील और नगर पालिका से नोटिस मिलने से हड़कम्प में आए अशोक विहार कॉलोनी के 28 परिवारों को हाई कोर्ट ने स्थगन आदेश देकर राहत दी है। हाईकोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए राजस्व और नगर पालिका सहित शासन से पूछा है कि जिस जमीन पर लोगों के मकान बने हैं। यह जमीन सरकारी है। इसके क्या दस्तावेज हैं और उन्हें किस आधार पर नोटिस जारी किए गए हैं।

जिसका जवाब प्रशासन नहीं दे सका और न ही कोई दस्तावेज प्रस्तुत किए गए। जिस पर न्यायालय ने स्थगन आदेश जारी कर दिया है। यह याचिका अशोक विहार कॉलोनी में रहने वाले 8 लोगों ने अपने अधिवक्तागण सुनील जैन, संजीव बिलगैया और अक्षत जैन के माध्यम से दायर की थी। मामले में अगली सुनवाई 6 जनवरी 2023 को की जाएगी।

ज्ञात हो कि तहसील कार्यालय से अशोक विहार कॉलोनी में रहने वाले 28 परिवारों को नोटिस जारी हुए थे। नोटिस में बताया गया था कि उन्होंने शासकीय जमीन पर भवन निर्माण किए हैं। जबकि मकान मालिकों का कहना था कि उन्होंने विधिवत रूप से रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से यहां प्लॉट खरीदे थे और तहसील से नामांतरण होने के साथ.साथ डायवर्सन और नगर पालिका से भवन निर्माण की अनुमति सहित अन्य अनुमतियां विधिवत ली गई थीं।

जिस पर नगर पालिका ने भी इन मकान मालिकों को नोटिस जारी कर अल्टीमेटम दिया था कि उन पर जो दस्तावेज हैं उन्हें तीन दिवस के अंदर प्रस्तुत करें अन्यथा की स्थिति में उनके अतिक्रमण को हटा दिया जाएगा। नगर पालिका के इस नोटिस के बाद वह परिवार संकट में आ गए और उनमें से 8 नोटिस धारी राजेश पाठक, दुर्गा देवी पाराशर, मालती योगी कराए, हरिओम गौतम, नीलेश दुबे, प्रियंका शाक्य, गीता शर्मा और शकुंतला यादव ने अपने अभिभाषक सुनील जैन संजीव बिलगैंया और अक्षत जैन के माध्यम से हाईकोर्ट में एक याचिका प्रस्तुत की और जमीन से संबंधित सभी वैध दस्तावेज प्रस्तुत किए।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अभिभाषकों ने न्यायालय को बताया कि याचिका कर्ताओं ने सभी शासकीय अनुमतियां प्राप्त की हैं और रजिस्टर्ड विक्रय पत्र से भवन व प्लॉट क्रय किए हैं। शासकीय अनुमतियों के आधार पर ही याचिकाकर्ताओं को बैंकों के माध्यम से भवन निर्माण हेतु ऋण प्राप्त हुए हैं। लेकिन इसके बाद भी तहसील कार्यालय और नगर पालिका कार्यालय से उन्हें नोटिस प्राप्त हुए हैं।

अभिभाषकों द्वारा बताए गए इन बिंदुओं पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ के जस्टिस जी एस अहलूवालिया ने शासन से नोटिस भेजने का आधार मांगा और दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए तलब किया। लेकिन शासन की ओर से न कोई दस्तावेज प्रस्तुत किया गया और न ही कोई जबाव। जिस पर जस्टिस जी एस अहलूवालिया ने भवन मालिकों को स्थगन आदेश जारी कर दिए।

नामांतरण और निर्माण अनुमति दी गई, वह जमीन शासकीय कैसे: अभिभाषक बिलगैया

अशोक विहार कॉलोनी में रहने वाले भवन मालिकों की याचिका ग्वालियर हाई कोर्ट में दायर करने वाले अभिभाषक संजीव बिलगैया ने नगर पालिका और तहसील पर कई सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि तहसील कार्यालय और नगर पालिका कार्यालय से 28 भवन मालिकों को नोटिस जारी किए गए हैं। जिसमें बताया गया कि जो भवन जिस भूमि पर बनाए गए हैं, वह शासकीय है।

जबकि उन भवनों का विधिवत रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से क्रय किया गया है। उस समय शासकीय जमीन होने की कोई जानकारी नहीं दी गई। बाद में तहसील कार्यालय मेें नामांतरण होने के साथ.साथ एसडीएम कार्यालय से उन प्लेट के डायवर्सन भी कर दिए गए। उस समय भी जमीन के शासकीय होने की जानकारी प्रशासन को नहीं लगी। बाद में नगर पालिका ने भी विकास शुल्क प्राप्त कर उन भवन मालिकों के नामांतरण कर दिए और कई भवनों को भवन निर्माण की अनुमति जारी कर दी।

उस कॉलोनी में पानी की पाइप लाइन, सीवर लाइन, बिजली कनेक्शन जैसी सुविधाएं बिना किसी असुविधा के प्राप्त हो गईं और उन्हें शासकीय अनुमतियों के माध्यम से बैंकों ने होम लोन दे दिया। लेकिन वर्षों बाद प्रशासन और राजस्व विभाग इस जमीन को शासकीय किस आधार पर मान रहा है। इसका जवाब हाईकोर्ट में भी प्रशासन नहीं दे सका। इसलिए प्रशासन की नियत पर सवाल खड़े हो रहे हैं।