जैन धर्म के पंच महाव्रत का पालन करें और पाएं जीवन की 5 अनमोल वस्तुएं-मुनि कुलदर्शन

शिवपुरी। जैन धर्म के सिद्धांत वैज्ञानिकता की कसौटी पर पूरी तरह खरे हैं। भगवान महावीर के पंच महाव्रत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के पालन से सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों तरह की उपलब्धियां संभव हैं। इन सिद्धांतों के पालन से इंसान का स्वास्थ्य ठीक रहता है, उसके वचनों में और शब्दों में सिद्धी होती है। यश और प्रतिष्ठा की प्राप्ति हेाती है। चेहरे पर ओज होता है और जीवन में शांति का वास होता है। अपनी बात को जैन मुनि कुलदर्शन विजय जी ने तार्किक ढंग से बखूबी स्पष्ट भी किया।

पंच महाव्रतों में शामिल अहिंसा के सिद्धांत का जिक्र करते हुए मुनि श्री ने कहा कि जिसके जीवन में अहिंसा होती है, उसका स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक रहता है। आप चाहते हैं कि आपका स्वास्थ्य ठीक रहे तो उसके लिए आवश्यक है कि आप भगवान महावीर के सिद्धंात अहिंसा व्रत का पालन करें।

उन्होंने कहा कि जो भी व्यक्ति अपने जीवन में हिंसा को अपनाते हैंए उनका स्वास्थ्य कहीं न कहीं निश्चित तौर पर खराब होता है। उन्होंने कहा कि आज हिंसा का बाहूल्य होने के कारण ऐसी.ऐसी बीमारियां जन्म ले रही हैंए जिनका नाम भी हमने कभी नहीं सुना।

मेडीकल साईंस के पास इन रोगों का कोई इलाज नहीं है। उन्होंने कहा कि आज प्रकृति के असंतुलन का कारण हिंसा है। भगवान महावीर के दूसरे सिद्धांत सत्य की चर्चा करते हुए जैन मुनि ने कहा कि यदि आप चाहते हैं कि आपके वचनों और शब्दों में सिद्धी हो और जो आप चाहें वह सामने वाला स्वीकार करे तो उसके लिए आवश्यक है कि आपका जीवन सत्य की मिसाल हो।

महात्मा गांधी के शब्दों में इसलिए ताकत थी क्योंकि उनका जीवन सत्य का दूसरा नाम था। उन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी हैए उसका नाम है सत्य का प्रयोग और इस पुस्तक में उन्होंने अपनी तमाम बुराईयों को सहज रूप से स्वीकार किया है। अपमान के डर से वह सत्य बोलने से डरे नहीं। संत कुलदर्शन विजय जी ने जैन धर्म के तीसरे प्रमुख सिद्धांत अचौर्य की चर्चा करते हुए कहा कि जिसे अपने जीवन में सौभाग्यए प्रतिष्ठा और यश चाहिए उसे अपने जीवन में अचौर्य व्रत का आचरण करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि अचौर्य व्रत का अर्थ यह है कि दूसरे की सम्पत्ति में आपको कोई रस नहीं है। दूसरों को लूटने ठगने और चोरी करने में आपकी कोई रूचि नहीं है। जो अपने जीवन में अचौर्य व्रत का पालन करता हैए उसे निश्चित रूप से सफलता मिलती है।

उन्होंने चौथे सिद्धांत ब्रह्म्चर्य की चर्चा करते हुए कहा कि जो व्यक्ति ब्रह्चर्य व्रत का पालन करता है तथा उसके लिए अपनी धर्मपत्नी के अलावा संसार की समस्त स्त्रियां माता या बहन के समान है उस सत्व की प्राप्ति होती है। उसके चेहरे पर तेज रहता है।

मुरझाया और कुम्हलाया हुआ उसका चेहरा नहीं होता। वह ओज और उत्साह से परिपूर्ण होता है और जिसे देखकर प्रसन्नता की अनुभूति होती है। अंतिम सिद्धांत अपरिग्रह की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जीवन में यदि आप शांति चाहते हो किसी तरह की अशांति, विघ्र और असंतोष नहीं चाहते हैें तो आपको अपरिग्रह के सिद्धांत का पालन करना होगा।

जितना परिग्रह आप बढ़ाएंगे, धन संपत्ति और सांसारिक वस्तुओं को जलाएंगे उतनी ही आपके जीवन में अशांति आएगी। जिंदगी की शांति और समाधि के लिए अपरिग्रह का सिद्धांत अत्यंत आवश्यक है।