राखी रह गई भाई चला गयाः लापरवाही किसकी, भाई की जेके हॉस्पिटल की - Khula Khat

शिवपुरी। राखी रह गई भाई चला गया,लापरवाही किसकी,भाई की जिसने हेलमेट नही पहना या उस ग्वालियर के जेके हॉस्पिटल की जिसने सांसो की डोर टूटने के बाद भी उसका इलाज जारी रखा। यह सवाल उस बहन के मन में चल रहे है जिसका सावन में भाई इस दुनिया को अलविदा कह गया। 18 वर्षीय आशीष का एक्सीडेंट हुआ ब्रेन में चोट आई।

एक्सीडेंट के बाद वह होश में नही आया। शिवपुरी में निवास करने वाली बहन काजल सिकरवार ने इस हादसे के बाद सभी बहनो से इस पोस्ट के माध्यम से अपील की हैं बहने इस राखी पर भाई की कलाई पर राखी बांधते समय अपनी सुरक्षा के साथ भाई की सुरक्षा का वचन ले,कि वह बिना हेलमेट पहने बाइक नही चलाऐगे। शायद हेलमेट आशीष ने पहना होता तो उसकी जान बच जाती है।

शासन ने भी नियम बनाया है कि हेलमेट अवश्य पहने लेकिन युवा नहीं मानते। इस लापरवाही का परिणाम एक परिवार को भुगतना पड़ रहा है। यह एफबी पर पोस्ट साक्षात दर्शन करा रही है कि आप पुलिस से लड़ सकते हैं पर यमराज से नही। यह पोस्ट ग्वालियर के जेके हॉस्पिटल के लूटने की क्षमता को भी उजागर करती हैं,कि सांसों की डोर टूटने के बाद भी आशीष को वेंटी पर रखकर बिल बनाया गया। अंतिम समय में इस परिवार से एंबुलेंस तक में 1 हजार रूपए का कमीशन तक खाया गया।

जेएच में सक्रिय दलालो की भूमिका भी इस पोस्ट को उजागर करती हैं। जेएच प्रशासन ने बडे सूचना पत्र भी लगा रखे है कि किसी भी अपरचित व्यक्ति की सलाह पर प्राइवेट हॉस्पिटल में मरीज को न ले जाए। यह परिवार सबसे पहले आशीष को जेएच हॉस्पिटल ही ले गया था,लेकिन परिवार उच्च गुणवत्ता के इलाज के झांसे में आकर एक दलाल की बातो में फस गया और 3 दिन में सवा लाख रूपए खर्च करने के बाद भी उसे कुछ नहीं मिला।

पढ़िए आप यह खुला खत जो ईलाज के नाम पर लूट और हेलमेट न पहनने का परिणाम एक बहन एक परिवार को जीवन भर के लिए दर्द दे गया,एक 18 साल का इकलौता युवा जो इंदौर में प्राइवेट जॉब कर अपने माता पिता का सहारा था,अपनी बहनों की आस था लेकिन अब यह आस टूट चुकी है। भाइ की लापरवाही और लूटेरा जेके हॉस्पिटल जंग जीत गया। इस खत को हम पाठकों के लिए सशब्द प्रकाशित कर रहे है।

एक संघर्ष कौन जीताः मेरा भाई आशीष या जेके हॉस्पिटल अंतिम समय तक लूटने का प्रयास,या उसकी लापरवाही जो उसने हेलमेट नहीं पहना

मेरे भाई तुम अगर हेलमेट लगाए होते तो शायद आज मेरे पास होते,भाई को बचाने के लिए 3 दिन का संघर्ष कुछ सवाल जो मेरे मन को परेशान कर रहे है। भाई आशीष का बाइक एक्सीडेंट के कारण मौत से संघर्ष,हमारा एक एक रूपया इकठ्ठा कर जेके हॉस्पिटल को देने का संघर्ष, ओर जन कल्याणी ट्रामा एंड रिसर्च सेंटर ग्वालियर हॉस्पिटल का हमें गुमराह कर हमसे ज्यादा से ज्यादा पैसा लेने का संघर्ष समझ नहीं आता कौन जीता।

जेके हॉस्पिटल ने भाई सांस टूट जाने के बाद भी 24 घंटे का इलाज जारी रखा। भाई आशीष वेंटी पर था हमे सिर्फ सिर्फ दूर से दिखाया जाता और बातो में डराया जाता मेडिकल की भाषा बोलकर,वेस्ट इलाज बोलकर थैला भर के सुबह शाम दवा मंगाई जाती, लगाई जाती की नही हमे नही पता पर हॉस्पिटल प्रबंधन यह करता था। सोमवार की दोपहर हमसे मना कर दिया गया कि आप अपने मरीज को कही ओर ले जाओ,अब हमारे बस की नहीं है।

जब हम भाई आशीष को जेएच हॉस्पिटल ले जा रहे थे वेंटिलेटर वाली एंबुलेंस चाहिए थी हॉस्पिटल प्रबंधन ने कहा कि हम मंगा देते है,हमने कहा मंगा दो उस एंबुलेंस के 2500 रूपए चार्ज पहले जमा करा लिए गए। जब हम जेएच पहुंचे और ऐसी ही वेंटी वाली एंबुलेंस से बात की तो उसने बताया कि उसका चार्ज 1500 रूपए हैं मतलब अंतिम समय में भी जे के हॉस्पिटल 1 हजार रूपए कमीशन खा गया।

जेएच सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों ने हमसे क्लीयर कहा कि यह तो नहीं हैं अब इसका कैसे इलाज होगा यह तो जा चुका हैं,हमने हाथ पैर जोडे,फिर ईसीजी की,एक डोर सांसों की भी फिर भी चल रही थी डॉक्टरों ने फिर कहा अब कुछ नही है।

आपको लग रहा हैं वेंटी के कारण यह जिंदा है,फिर भी 1 प्रतिशत का चांस लेकर इसका इलाज जारी रखते है,यह डोर भी एकाध घंटे में टूट जाऐगी। ऐसा ही हुआ फिर डेढ घंटे में भाई आशीष की यह डोर भी टूट गई। यह समझ मेंरी नहीं आया कि जीता कौन और हरा कौन,भाई की लापरवाही जंग जीत गई उसने हेलमेट नहीं लगाया।

जेके हॉस्पिटल का संघर्ष जीत गया जिसने अंतिम प्रयास तक हमे लूटने का क्रम जारी रखा। भाई आशीष मौत से लड रहा था वह हार गया की मैं हार गई काफी प्रयास करने के बाद उसे बचा नहीं सकी,यां वह मेरी राखी हार गई जो उसके लिए मैने बांधने के लिए रखी थी,इस हार जीत के संघर्ष में मेरा भाई चला गया,लेकिन मेरी जैसी सभी बहने भाइयों से कहे कि इस राखी पर उपहार में हमारी सुरक्षा के साथ अपनी सुरक्षा का भी बचन देना बाइक पर हेलमेट लगाना नही तो मेरी जैसी बहन अपने भाई का हर राखी पर इंतजार करती रहेगी।