हार्दिक गुप्ता हैप्पी कोलारस। खबर जिले के कोलारस अनुविभाग के ग्राम बारई से आ रही है। जहां ग्राम बारई में चल रही पत्थर की क्रेशरों पर जमकर नियमों की धज्जियां उडाई जा रही है। ऐसा नहीं है कि इस मामले की सूचना माईनिंग विभाग को नहीं है। अपितु माईनिंग विभाग का प्रतिमाह फिक्स है। जिसके चलते मायनिंग अधिकारीयों को इन क्रेशरों पर पहुंचकर देखने तक की फुरसत नहीं है। हालात यह है कि अवैध खनन से बारई में खुलेआम प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों की खुलेआम धज्जियां उडाई जा रही है।
जानकारी के अनुसार बारई में इन दिनों हालात ये है कि अवैध खनन बड़े-बड़े व गहरे गड्ढे बनाए जा रहे हैं। जिससे कभी भी कोई बड़ी जनहानि हो सकती है। बारई में गिट्टी क्रेसर संचालकों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम कायदों को ताक पर रखकर काले पत्थर का कारोबार किया जा रहा है। इसमें नियमानुसार परिसर में पौधरोपण तो कराना दूर अब तक इन्होंने धूल उड़ने से रोकने के लिए न तो मशीनों की स्क्रीन पर एमएस सीट लगाई है और न ही वाटर स्प्रिंकलर।
ऐसे में रोजाना बड़ी तादाद में क्रेसरों से निकलने वाली धूल हवा में घुलकर मजदूरों सहित गांव में रहने वाले लोगों की सेहत को खतरा बन रही है। फसलें ही नहीं बल्कि मवेशियों को चरने वाले चारे में भी धूल के गुबार जमें हुए हैं। इस कारण यहां के मवेशी धूल धूसरित चारा चरने को मजबूर हैं और चारे के साथ पेट में जाने वाली धूल से अकाल मृत्यु मर रहे हैं।
बारई, बामौर की लगने वाली सीमा में विचरण करने वाले जंगली जानवर भी उक्त धूल के शिकार हो रहे हैं। जानवरों के पानी पीने वाले तालाबों पोखरों में भी धूल पानी में मिलकर उनके पेट में जाती है। आसपास के गांवों के ग्रामीणों को शुद्ध वातावरण नसीब नहीं हो पा रहा है। जिसमें दिन प्रतिदिन लोग दमा, टीवी, खांसी आदि गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं। धूल के गुबार के कारण फसलों में मोटी परत जम जाती हैं। इससे फसलें नष्ट हो रही हैं। इस कारण किसान आर्थिक तौर पर कमजोर होते जा रहे हैं।
जानकारी के अनुसार बारई में इन दिनों हालात ये है कि अवैध खनन बड़े-बड़े व गहरे गड्ढे बनाए जा रहे हैं। जिससे कभी भी कोई बड़ी जनहानि हो सकती है। बारई में गिट्टी क्रेसर संचालकों द्वारा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियम कायदों को ताक पर रखकर काले पत्थर का कारोबार किया जा रहा है। इसमें नियमानुसार परिसर में पौधरोपण तो कराना दूर अब तक इन्होंने धूल उड़ने से रोकने के लिए न तो मशीनों की स्क्रीन पर एमएस सीट लगाई है और न ही वाटर स्प्रिंकलर।
ऐसे में रोजाना बड़ी तादाद में क्रेसरों से निकलने वाली धूल हवा में घुलकर मजदूरों सहित गांव में रहने वाले लोगों की सेहत को खतरा बन रही है। फसलें ही नहीं बल्कि मवेशियों को चरने वाले चारे में भी धूल के गुबार जमें हुए हैं। इस कारण यहां के मवेशी धूल धूसरित चारा चरने को मजबूर हैं और चारे के साथ पेट में जाने वाली धूल से अकाल मृत्यु मर रहे हैं।
बारई, बामौर की लगने वाली सीमा में विचरण करने वाले जंगली जानवर भी उक्त धूल के शिकार हो रहे हैं। जानवरों के पानी पीने वाले तालाबों पोखरों में भी धूल पानी में मिलकर उनके पेट में जाती है। आसपास के गांवों के ग्रामीणों को शुद्ध वातावरण नसीब नहीं हो पा रहा है। जिसमें दिन प्रतिदिन लोग दमा, टीवी, खांसी आदि गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो रहे हैं। धूल के गुबार के कारण फसलों में मोटी परत जम जाती हैं। इससे फसलें नष्ट हो रही हैं। इस कारण किसान आर्थिक तौर पर कमजोर होते जा रहे हैं।

